उमेश चतुर्वेदी
संसद और राष्ट्रपति भवन से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित सरदार पटेल भवन की चारदीवारी से सटा मंच पांच अप्रैल की सुबह से ही गुलजार है। उदारीकरण के बाद की चमक-दमक भरी दुनिया में स्मार्ट पर्सनैलिटी और खूबसूरत चेहरे ही आकर्षण का केंद्र माने जा रहे हैं। इसके बावजूद राजधानी के जंतरमंतर रोड पर ठिगने कद का एक बूढ़ा आदमी हजारों लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पांच अप्रैल की सांझ को यहां अपार जनसमुदाय गांधीजी का प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिए गाने में मगन था, उस भीड़ में दो-तीन युवतियां ऐसी भी थीं, जिनके भर हाथ सजे चूड़े बता रहे थे कि उनकी हाल ही में शादी हुई है। लेकिन ठिगने कद के गांधी टोपीधारी अन्ना हजारे के सादे व्यक्तित्व का चुंबक इन युवतियों को भी जंतरमंतर पर खींच लाया है। देश के तमाम कोनों से जुटे बूढ़े-जवान, औरत-मर्द, पढ़े-लिखे, अनपढ़ हर तरह के लोग इस भीड़ में शामिल हैं। वे अन्ना के साथ हैं। अन्ना की जबान जब खुलती है तो वे धाराप्रवाह मराठी बोलते हैं। हिंदी की कुछ लाइनें मराठी में छौंक का काम करती हैं। लेकिन लोग उन्हें सुनने को ब्याकुल हैं। यह नजारा कम से कम उन भारतीयों के लिए राहत का संदेश लेकर आया है, जिन्हें लगता है कि देश में लूट-खसोट चलती रहेगी, अफसर-नेता और कारपोरेट का गठजोड़ जनता की गाढ़ी कमाई से मलाई काटता रहेगा। लेकिन जन लोकपाल बिल की अन्ना हजारे की मांग ने नजारा बदल कर रख दिया है। सूचना के अधिकार के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी, समाजवादी आर्यसमाजी स्वामी अग्निवेश, गोविंदाचार्य सभी इस महायज्ञ में आहुति देने और भ्रष्टाचार का खात्मा करने की लड़ाई में शामिल हो गए हैं।
भ्रष्टाचार पूरे देश में संस्थानिक हालात को प्राप्त कर चुका है। भ्रष्टाचार की आंच में झुलसता आम नागरिक इसे अपनी नियति मानने को मजबूर हो चुका था। लेकिन अन्ना की एक आवाज ने निराशा के इन स्वरों को बदलकर रख दिया है। दुष्यंत कुमार की गजल की वे पंक्तियां एक बार साकार होती नजर आ रही हैं – कौन कहता है आसमां में सूराख नहीं हो सकता/ एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो। अन्ना हजारे ने पत्थर उछाल दिया है, आसमां में सूराख कितना बड़ा होगा, यह तो तय होना बाकी है। लेकिन इस पत्थर की धमक कितनी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अन्ना हजारे से अपना अनशन वापस लेने की मांग की है। लेकिन अन्ना अपनी जिद्द पर अड़े हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, मुख्य सतर्कता आयुक्त पी जे थॉमस की नियुक्ति और कॉमनवेल्थ खेल घोटाले में चौतरफा घिरी सरकार पर अन्ना की मांग का दबाव कितना है, यह प्रधानमंत्री की अपील से साफ है।
यथास्थितिवाद की ओर लगातार कदम बढ़ाते जा रहे देश को लगता था कि जयप्रकाश आंदोलन सामाजिक बदलाव का आखिरी आंदोलन था। हालांकि हमें यह ध्यान रखना होगा कि जयप्रकाश नारायण के शामिल होने के पहले गुजरात विद्यापीठ के छात्रों ने गुजरात सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था। हॉस्टल में बदहाल व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन पूरे राज्य की बदहाली से जुड़ गया। देखते ही देखते इस आंदोलन में पूरे गुजरात का छात्र समुदाय जुट गया। गुजरात की हवा बिहार तक पहुंची और वहां महंगाई, भ्रष्टाचार और बदहाली से जूझ रहे छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा। लेकिन यह आंदोलन पूरी तरह नेतृत्व विहीन था। जयप्रकाश तो छात्र नेताओं की मांग पर आंदोलन की कमान थामने को तैयार हुए। हालांकि अपनी अस्वस्थता के कारण उनका मन तैयार नहीं हो पा रहा था। लेकिन एक बार उन्होंने आंदोलन की कमान क्या थामी, देश में परिवर्तन की नई बयार ही बह चली। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर उस बदलाव को रोकने और बदहाली-भ्रष्टाचार के खिलाफ उठती आवाजों को दबाने की कोशिश तो की, लेकिन जयप्रकाश लहर के सामने वे कारगर नहीं हो पाईं। 1977 में हुए चुनावों में उन्हें बुरी तरह पराजय का दंश झेलना पड़ा। लेकिन इस आंदोलन की नाकामयाबी ही कही जाएगी कि इससे निकले लालू प्रसाद यादव जैसे नेता बदलाव की बयार के प्रतीक की बजाय पुरानी भ्रष्ट व्यवस्था का ही अंग बन गए। बाद के दौर में लालू-मुलायम अपनी जातियों के नेता के तौर पर ज्यादा जाने जाने लगे। 1974 में चंद्रशेखर ने जयप्रकाश को लिखी एक चिट्ठी में अपनी चिंता जाहिर करते हुए लिखा था कि जो लोग आपके आंदोलन में शामिल हो रहे हैं, वे व्यवस्था बदलने नहीं, बल्कि सत्ता बदलने आ रहे हैं और भविष्य में अपनी जातियों के नेता साबित होंगे। जयप्रकाश आंदोलन के बाद अस्तित्व में आई जनता पार्टी की सरकार को देश ने एक सकारात्मक प्रयोग की तरह देखा, लेकिन यह प्रयोग अपने अंतर्विरोधों के ही चलते असमय ही ध्वस्त हो गया और सार्वजनिक हित के लिए शुरू हुआ आंदोलन खत्म हो गया। इस आंदोलन के पैंतीस साल बाद यह कहने में हर्ज नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस की सत्ता की राजनीति में नाकामयाब रहे नेताओं ने सत्ता हासिल करने के लिए जयप्रकाश का इस्तेमाल किया था।
आंदोलन तो 1987 में भी विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुआई में हुआ। वीपी भी जेपी बनना चाहते थे। लेकिन उनमें और जेपी में अंतर यह था कि जेपी जहां खुद सत्ता से दूर रहने के लिए मानसिक तौर पर तैयार थे, वहीं वी पी सिंह खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे और चंद्रशेखर को सत्ता से दूर रखने के लिए उन्होंने देवीलाल के साथ जो राजनीतिक चौपड़ बिछाई, उससे देश एक बार फिर बदलाव हासिल करने से वंचित रह गया। इन अर्थों में अन्ना हजारे का आंदोलन कुछ अलग है। यह जनांदोलन तो बन चुका है। सामाजिक कार्यकर्ता क्रांति प्रकाश 13 साल की उम्र में ही जयप्रकाश आंदोलन में कूद गए थे। उनके मुताबिक जनआंदोलन में पूरी दुनिया में जनता से चंदा मांगने की रवायत है। लेकिन अन्ना के इस आंदोलन में पैसे की मांग नहीं हो रही है। इस आंदोलन के जरूरी खर्च सामाजिक स्वयंसेवी संगठन उठा रहे हैं। ऐसा नहीं कि जेपी की तरह राजनेता अन्ना के साथ नहीं आ रहे हैं। अन्ना के साथ उमड़ती भीड़ का फायदा उठाने में राजनीतिक दल भी शामिल हो रहे हैं। पांच अप्रैल को धरना स्थल पर जनता दल यूनाइटेड के नेता शरद यादव की मौजूदगी कुछ ऐसे ही संकेत देती है। यही कुछ बिदु हैं, जो इस आंदोलन की सफलता के लिए संशय खड़ा करते हैं। क्योंकि इस देश में नेताओं की तरह एनजीओ की भी साख अच्छी नहीं है। लेकिन अन्ना की अपनी साख और अपना इतिहास पाकसाफ है। नि:स्वार्थ भाव और गांधीवादी तरीके से अपने गांव रालेगांव सिद्धि में जिस तरह वे बदलाव लाने में कामयाब रहे हैं, उससे उनके व्यक्तित्व में चार चांद लग गए हैं। महाराष्ट्र की विलासराव देशमुख सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ अहिंसक तरीके से उन्होंने जो आंदोलन चलाया, उसकी याद आज भी देश के जेहन में ताजा है। उसके चलते विलासराव देशमुख सरकार गिरते-गिरते बची थी। तीन मंत्रियों को उन्हें अपने मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा था। यही वजह है कि अन्ना के साथ चलने में बदहाल और लालफीताशाही से जूझते आम नागरिक को सुकून मिल रहा है। यह सुकून ही जनता को उम्मीदों की डोर से बांधे हुए है। ऐसे में यह न मानने की कोई वजह नहीं दिखती कि अन्ना का आंदोलन नाकामयाब होगा। देशभर से जुटे लोगों के समर्थन और उत्साह के सहारे भ्रष्टाचार के खात्मे की दिशा में नया इतिहास जरूर बनेगा।
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Awesome...nice
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