Sunday, May 13, 2018

मां पर अस्फुट विचार


प्रकाशित लेखों और कहीं बोलने-सम्मानित होने जैसी सार्वजनीन गतिविधियों को छोड़कर मैं निजी तथ्यों को सोशल मीडिया पर गोपनहीन करने से बचता हूं.. आज मातृ दिवस है..सोशल मीडिया पर देख रहा हूं..मां-बच्चे के बेहद निजी रिश्ते को भी किस तरह सार्वजनिक कर-करके हम लोग लहालोट हो रहे हैं.. मां से रिश्ता तो ऐसा है कि वह कुमाता भी हो तो वह सांसों में रचा-बसा होता है..इसीलिए हमारे शास्त्र तो मानते ही नहीं माता कुमाता हो सकती है..कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति । आधी जिंदगी गुजर चुकी है..मातृ दिवस पर याद करने बैठा हूं तो जाया माता के साथ ही कितनी माताएं याद आ रही हैं..जाया मां तो मेरे सांस के साथ ही जाएगी... उसके अस्तित्व का क्या नकार और क्या स्वीकार..आप अस्वीकार करके भी उससे दूर थोड़े ही जा सकते हैं..आपकी रक्त वाहिनियों में गुजरते रक्त के हर कण, अस्थियों का एक-एक अणु, मज्जा की हर एक बूंद तो उसकी ही है..उसे क्या याद करना और क्या भूल जाना.. आप भूलते रहिए..लेकिन आपका अस्तित्व ही उसे न भुला पाने का सर्वश्रेेष्ठ उदाहरण है... मुझे अपनी जाया मां की तरह अपनी चाचियों से भी भरपूर प्यार मिलता रहा है...बहू-बच्चों वाली हो गई हैं वे..लेकिन उनके पास साल-छह महीने में पहुंच जाता हूं..अब भी वैसे ही प्यार करती हैं, जैसे जब वे ब्याह कर आई थीं तो करती थीं ...तब अपनी उम्र पांच से लेकर बारह साल तक रही थी... एक चाची तो दूसरी मां की ही तरह है...एक चाची तो अब भी गांव जाता हूं तो मुझे अपने घर में रूकने ही नहीं देती.. बुलावा भेज देती है..बहुएं रहीं भी, तब भी खुद ही चाय-नाश्ता बनाकर खिलाती-पिलाती है..जिसके लिए आज भी अपनी मां की तरह बबुआ ही हूं... मुझे उस बूढ़ी मां का दुलार आज भी भिगो रहा है, जब अपने चौथेपन में देवरिया के किसी गांव से अपने परिवार को छोड़कर मेरे गांव आ गई थीं.. बाबू ही कहती थीं..मांग-चोंग कर ही गुजारा करती थी..लेकिन अपना पूरा प्यार मुझ पर उड़ेल देती थी.. जब तीसरी कक्षा में था तो एक रात वह इस दुनिया से कूच कर गई थी..उस दिन का सूनापन आज भी जब याद आता है..अजीब-सी हूक और खालीपन से भर देता है... मइया यानी दादी तो 14 साल की उम्र तक मेरी दूसरी मां ही रहीं...वह मेरे पिता की ही मां नहीं थीं..मेरी भी थीं..हमारी ही नहीं..मेरे चचेरे चाचाओं की भी..चाचा भी बुढ़़ापे की ओर चल पड़े हैं और आज भी उन्हें याद करते हैं..मां तो वह अपने देवर यानी मेरे छोटे बाबा की भी थीं..जब आखिरी विदाई देने के लिए उन्हें कंधे पर उठाया था..तब छोटका बाबा के मुंह से उनके लिए निकले शब्द जब भी याद आते हैं, गहरे तक भिगो जाते हैं.. काकी को कैसे भूल सकता हूं..बाबूजी की चाची..उनकी सुन हम भी उन्हें काकी ही कहते थे..जब भी मां नहीं रहती थीं..हमारी मदद को आगे आने में देर नहीं लगाती थीं.. अपनी सास को भी भूल पाना आसान नहीं हैं..सास जी से साल-छह महीने में मिलता हूं तो उनकी आंखों की चमक ही बताती है कि वे मेरे लिए क्या हैं..और उनके लिए मैं बच्चे के अलावा क्या हूं.. जाया मां का अहसान चुका पाना इस जन्म में क्या, किसी भी जन्म में संभव नहीं..लेकिन अपने जीवन पर अहसानों की फेहरिश्त की ओर देखता हूं तो ऐसी कई मांएं नजर आती हैं..किन-किन का अहसान चुका सकता हूं..

No comments:

Post a Comment

सुबह सवेरे में