Friday, February 8, 2013

बयानों के तीर


उमेश चतुर्वेदी
(दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित)
भारत के सदियों के इतिहास में भारत विभाजन सबसे बड़ा त्रासद अनुभव है...विभाजन की विभीषिका झेल चुकी पीढ़ी अब खत्म होने के कगार पर है। लेकिन उसकी पीड़ा बाद की पीढ़ी के खून तक में समा चुकी है। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद के लालकृष्ण आडवाणी के बयान को सिर्फ राजनीति के चश्मे से ही नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे भारत विभाजन की उस त्रासदी से जोड़कर देखा जाना चाहिए, जिसकी कीमत आज तक सीमा पार की एक ही तरह की सभ्यताएं भुगत रही हैं। लालकृष्ण आडवाणी रहे हों या इंद्रकुमार गुजराल या फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, इन लोगों ने भारत की तरफ रूख इसलिए नहीं किया था कि उन्हें यहां सत्ता मिलेगी। भारत विभाजन के बाद हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो गहरा अविश्वासबोध फैला था, लाखों लोगों को अपनी बसी बसाई गृहस्थी, पीढ़ियों की खून पसीने की कमाई समेत अपना सबकुछ खो दिया था। इस त्रासदी को लेकर इतिहास के हजारों पन्ने रंगे जा चुके हैं। मशहूर पत्रकार कुलदीप नैय्यर की हाल ही में आई पुस्तक बियांड द लाइन्स में उन्होंने लिखा है कि जब दोनों तरफ की हताश आबादी दूसरी तरफ जा रही थी तो उनकी पीड़ा का वर्णन तक नहीं किया जा सकता था। हो सकता है कि लालकृष्ण आडवाणी को आम लोगों की तरह वैसी पीड़ा झेलते हुए भारत नहीं आना पड़ा हो। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं कि अपनी जड़ों से कटने का दर्द उन्हें नहीं हुआ होगा। इसलिए राजनीतिक तौर पर ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक तौर पर भी ऐसे बयानों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यह सच है कि पाकिस्तान की अब भी तीन फीसदी आबादी हिंदू है और उसे रोजाना तमाम तरह की दुश्वारियों को झेलना पड़ रहा है। अगर उनकी आवाज उठाना भी सवालों के घेरे में आ सकता है तो मौजूदा राजनीति पर तरस ही खाया जा सकता है। अगर पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ अनाचार हो रहा है या फिर भारत में अल्पसंख्यकों को सवालों के घेरे में रखा जा रहा है तो ये समस्याएं राजनीति के चश्मे से नहीं देखी जानी चाहिए। बल्कि इन्हें सभ्यताओं के संकट के तौर पर देखा जाना चाहिए। लेकिन हमारी राजनीति आजकल सभ्यताओं के संकट की बजाय फौरी राजनीति के नजरिए से सवालों को ना सिर्फ देखती है, बल्कि उन्हें उसी नजरिए से हल करने की कोशिश भी करती है। इस राजनीतिक नजरिए का ही असर है कि तमाम समुदायों के बीच आज भी वैसा भाईचारा स्थापित नहीं हो पाया है, जिसका सपना आजादी की लड़ाई के वक्त हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था। भारतीय संविधान ने भी 26 जनवरी 1950 को एक झटके से जाति-पांत, ऊंच-नीच की अवधारणा को खत्म कर दिया था। लेकिन सुविधापरक राजनीति ने इस अवधारणा को हकीकत में अमलीजामा पहनने ही नहीं दिया। इसका असर यह हुआ कि अब भी जाति-पांत को लेकर राजनीति हो रही है। धार्मिक आधार पर लोगों को लुभाने की कोशिश हो रही है। हो सकता है शकील अहमद ने लालकृष्ण आडवाणी पर हमला उन्हें धार्मिक आधार की राजनीति करने के के संदर्भ में ही किया हो। लेकिन ऐसा करते वक्त वे यह भूल गए कि ऐसे राजनीतिक बयानों की अपनी सीमाएं होती हैं और उनकी तीखी प्रतिक्रियाएं भी होती हैं। हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने इंद्रकुमार गुजराल और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम लेकर शकील अहमद पर सवाल जरूर उठाए। लेकिन यह भी सच है कि मामला ज्यादा तूल नहीं पकड़ पाया। इसकी भी खास वजह है। पहले अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे के आंदोलन, फिर दामिनी रेप केस के खिलाफ नौजवानों के गुस्से के उबाल ने भारतीय समाज को राजनीति के अंदरूनी पेचों और उसे समझने का नया सूत्र दे दिया है। वैसे अब राजनीति भी मानती है कि खासतौर पर नौजवानों के बीच उसकी साख गिरी है। ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में राजनीति मानती है कि उसकी विश्वसनीयता कम हो रही है। इसके लिए राजनीतिक बवंडर खड़ा करने की मौजूदा प्रवृत्ति का भी ज्यादा हाथ है। लेकिन दुर्भाग्यवश यह समझते हुए भी राजनीति अपनी इस प्रवृत्ति से बचने की कोशिश नहीं कर रही है। लेकिन इसका एक उलटा असर यह भी हो रहा है कि आम लोगों के बीच का वह तबका, जो संख्या में ज्यादा है और राजनीति के इस पेचोखम को ठीक से समझ नहीं पाता, कई बार उन्माद में आ जाता है। नतीजतन सामाजिक तनाव में बढ़ोत्तरी भी होती है और लोग भी अपने पड़ोसी को भी अविश्वास की नजर से देखने लगते हैं।
चाहे कांग्रेस के नेता हों या भारतीय जनता पार्टी के या किसी और दल के, राजनीतिक और सामाजिक मर्यादा भी उन्हें ऐसे विवादित बयान देने से बचने का सुझाव देती है। इस लिहाज से अव्वल तो होना यह चाहिए कि ऐसे बयानों से परहेज किया जाए। क्योंकि ऐसे बयान कष्ट झेल रही उस जनता के सवालों और दर्द की बजाय दूसरी तरफ फोकस कर देते हैं। इससे उनका दर्द वहीं का वहीं रह जाता, उनकी तरफ ध्यान देने वाला कोई नहीं रहता और बयानों के तीर चलने तेज हो जाते हैं। 

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