उमेश चतुर्वेदी
दिसंबर 1994 को मुजफ्फरपुर में गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की पत्थर मार कर नृशंस हत्या की खबर आने के बाद बिहार और वहां की कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लग गए थे। मुजफ्फरपुर में कृष्णैया और नासिक के मालेगांव में यशवंत सोनवाणे की हत्या की घटना में एक समानता है कि दोनों जिम्मेदार अधिकारी थे। लेकिन एक की हत्या पगलाई भीड़ ने की थी, जबकि दूसरे को जिंदा जलाने वाले तेल माफिया थे। कृष्णैया की हत्या ने यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया था कि जिस राज्य में देश की सर्वोच्च और प्रतिष्ठित सेवा का अधिकारी सुरक्षित नहीं है, वहां आम जनता कितनी सुरक्षित होगी। लेकिन ठीक गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हुई इस लोमहर्षक घटना के लिए महाराष्ट्र के कानून-व्यवस्था पर सवाल नहीं उठ रहा है। वहां इसे महज एक आपराधिक घटना के तौर पर देखा जा रहा है। महाराष्ट्र की इस दुस्साहसिक घटना की जांच के बाद निश्चित रूप से यह पता चलेगा कि आला प्रशासनिक अधिकारी को जिंदा जलाने वाले कोई सामान्य अपराधी नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे कोई रसूखदार राजनीतिक ताकत जरूर है। क्योंकि बिना रसूख और पैसे की ताकत के सामान्य अपराधी किसी अधिकारी की हत्या को अंजाम नहीं दे सकता।
19 नवंबर 2005 में कुछ ऐसे ही घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले में इंडियन आयल कारपोरेशन के मार्केटिंग अधिकारी एस मंजूनाथ की हत्या कर दी गई थी। यशवंत सोनावाणे की तरह मंजूनाथ का भी कसूर यही था कि वे तेल में मिलावटखोरों के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उनके रहते मिलावटखोर और कालाबाजारी करने वाले बेईमान पेट्रोल पंप मालिकों की काली कमाई में रूकावट हो रही थी। लिहाजा उन्होंने अपनी काली कमाई जारी रखने के लिए अधिकारी को ही राह से हटाने का फैसला ले लिया। मंजूनाथ की हत्या की जांच में भी पता चला कि इसके पीछे रसूखदार राजनीतिक वरदहस्त वाले लोगों का भी हाथ था। पेट्रोल पंपों के कारोबार से जुड़े होने के चलते हत्यारे और उन्हें प्रश्रय देने वाले मालदार तो खैर थे ही। चाहे मंजूनाथ हों या फिर यशवंत सोनवाणे, राजनीति की दुनिया में व्याप्त भ्रष्टाचार उन्हें अपनी राह का रोड़ा मानने लगती है। पहले तो उन्हें पैसे देकर खरीदने की कोशिश की जाती है। अपने सेवाकाल के शुरूआती दौर में ज्यादातर अधिकारी समाज बदलने का ही माद्दा लेकर आते हैं। लेकिन जैसे-जैसे भ्रष्ट व्यवस्था से उनका पाला पड़ता है, शुरूआती हिचक पर वे काबू पाने की कोशिश में जुट जाते हैं। रही- सही कसर पूरी कर देती है भ्रष्ट व्यवस्था, व्यवस्था ही उन्हें बदलने की कोशिश करने लगती है। पहले ही दिन से उन्हें खरीदने की कोशिश की जाती है। इस कोशिश के सामने अधिकांश टूट जाते हैं और जो नहीं टूटते, उन्हें या तो मंजूनाथ बना दिया जाता है या फिर सत्येंद्र दुबे। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में काम कर रहे इंजीनियर सत्येंद्र दुबे को भी खरीदने की कम कोशिश नहीं की गई थी। लेकिन बिहार के सीवान जिले का रहने वाला वह युवा इंजीनियर अपनी असल जिम्मेदारी निभाने के लिए जुटा रहा। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने ही विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार का खुलासा करने की भी ठान ली। ऐसे में भ्रष्ट अधिकारियों, ठेकेदारों और इंजीनियरों की तिकड़ी ने उन्हें रास्ते से ही हटाने की ठान ली। 27 नवंबर, 2003 को गया में तैनात यह इंजीनियर जब अपने घर लौट रहा था, तभी उसे गोली मार दी गई। सत्येंद्र दुबे की हत्याकांड का मामला इतना तूल पकड़ा कि नीतीश सरकार को उसकी सीबीआई जांच कराने का आदेश देना पड़ा। दुबे हत्याकांड के अधिकारी पकड़ तो लिए गए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वे महज हत्यारे हैं। उनकी हत्या की साजिश रचने वाले राजनेता और अधिकारी अब भी सींखचों से बाहर हैं। हाल के दिनों में एक और हत्या ने राजनीति और भ्रष्टाचारियों के कॉकटेल और उसके जरिए होने वाले अपराधों की कलई खोलने के लिए चर्चित रहा। 24 दिसंबर, 2008 को उत्तर प्रदेश के औरेया जिले में तैनात पीडब्ल्यूडी इंजीनियर मनोज गुप्ता की भी हत्या कर दी गई। उनका कसूर सिर्फ इतना ही था कि उन्होंने सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी के स्थानीय विधायक शेखर तिवारी को चंदा देने से मना कर दिया था। दिलचस्प बात यह है कि यह चंदा पार्टी के ही नाम पर मांगा गया था। इस हत्याकांड से भ्रष्टाचार के मसले पर राजनेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत पर बहस-मुबाहिसों का दौर ही शुरू हो गया था।
बिहार में तो हालात भले ही बदलते नजर आ रहे हैं। नीतीश शासन में जिस तरह अधिकारियों को अभयदान मिला हुआ है, उससे सत्ताधारी जनता दल – यू और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में असंतोष है। विधानसभा चुनावों के पहले हुई जनता दल – यू की एक बैठक में इस मसले को जनता दल-यू नेताओं ने जिस तरह तूल दिया, उससे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी झुंझला गए थे। लेकिन नीतीश कुमार ने जिस तरह अधिकारियों की स्वायत्तता दी है, उससे अब बिहार में काम करने को लेकर अधिकारियों में कोई हीनताबोध या किसी भय का भाव नहीं है। लेकिन जी कृष्णैया की हत्या के बाद नब्बे के दशक के मध्य में अधिकारी बिहार में तैनाती को लेकर हिचक दिखाने लगे थे। कृष्णैया आंध्र प्रदेश के निवासी थे। उनकी हत्या के बाद उनके माता-पिता ने कहा था कि वे किसी भी व्यक्ति को यह सलाह नहीं देंगे कि वे अपने बच्चे को बिहार में काम करने के लिए जाने दे। निश्चित तौर पर यशवंत सोनावाने की हत्या के बाद किसी अधिकारी के परिजन अपने किसी जानकार के महाराष्ट्र में काम करने के लिए आगाह नहीं करेंगे। लेकिन कृष्णैया की हत्या दरअसल छोटन शुक्ला नाम के एक स्थानीय नेता की मौत से गु्स्साई जनता ने की थी। बिहार पीपुल्स पार्टी के नेता छोटन शुक्ला की हत्या को लेकर लोग मान रहे थे कि हत्यारों को सत्ता प्रतिष्ठान का समर्थन हासिल है। हत्यारों की भीड़ में लवली आनंद और आनंद मोहन जैसे नेता भी थे। आनंद मोहन पर हत्या से ज्यादा भीड़ को उकसाने का आरोप है और इसके चलते वे जेल में बंद भी हैं। यशवंत सोनवाणे की हत्या निश्चित तौर पर अपराधियों का कृत्य है। लेकिन यह तय है कि उन अपराधियों के पीछे कोई राजनीतिक ताकत जरूर है।
सत्येंद्र दुबे और मंजूनाथ भी अधिकारी थे। लेकिन वे प्रशासनिक अधिकारी नहीं थे। जिन पर कानून और व्यवस्था की भी जिम्मेदारी होती है। वैसे तो हत्या, हत्या ही होती है। लेकिन यशवंत सोनावाणे की हत्या निश्चित तौर पर बाकी अधिकारियों की हत्या से अलग है। क्योंकि वे मामूली अधिकारी नहीं थे। वे प्रशासनिक अधिकारी थे। उन पर कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी भी थी। फिर भी उनकी हत्या के लिए भ्रष्ट तंत्र और उसके अपराधियों को कोई भय या हिचक का बोध नहीं हुआ। इसके भी अपने कारण हैं। अंग्रेजी राज्य से लेकर सन 1971-72 तक प्रशासनिक अधिकारियों का अपना जलवा रहता था। लेकिन सत्तर के दशक के शुरूआती दिनों में शुरू हुए प्रशासनिक सुधारों के बाद प्रशासनिक अधिकारियों की ताकत कम हुई है, इसके साथ ही उनका रसूख कम हुआ है। इन सुधारों ने प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकारों में कटौती हुई और जिले में तैनात पुलिस अधीक्षकों को भी ताकत दी गई। जबकि उसके पहले तक वे जिला प्रशासनिक अधिकारियों के सहायक की भूमिका में होते थे। 1985-86 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व के दौरान पुलिस अधिकारियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की पकड़ को कम करने की मांग रखी थी। उन्हें अपनी गोपनीयता रिपोर्ट किसी आईएएस अधिकारी के हाथों लिखे जाने पर भी एतराज था। लिहाजा सरकार ने उनकी मांगे मान ली। अधिकारों के विकेंद्रीकरण के नाम पर ये तो हुआ, लेकिन जिला और स्थानीय स्तर पर सक्रिय अपराधियों और माफियाओं ने उनकी परवाह करनी कम कर दी। उन्हें पता है कि प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ में पहले जैसा चाबुक नहीं रहा। इसका ही फायदा उठाकर सत्तर और अस्सी के दशक में धनबाद में माफियाओं का उभार सामने आया था। जिसमें सूरजदेव सिंह तेजी से उभरे थे। खुलेआम हथियार लेकर चलना और प्रशासनिक अमले को हड़का देना उनके लिए बांएं हाथ का खेल था। हालांकि बाद में एक दमदार अधिकारी मदनमोहन झा ने उन पर काबू पाने की सफल कोशिश की थी। रही-सही कसर राजनेताओं ने पूरी कर दी है। उन्हें अधिकारियों पर हाथ छो़ड़ने से गुरेज नहीं रहा। उत्तर प्रदेश कांग्रेस के एक नेता बच्चा पाठक ने तो अपने गृह जिले बलिया के एडीएम को उनके चैंबर से ही खींच लिया था। नब्बे के दशक के शुरूआती दिनों में उन्होंने जब इस कृत्य को अंजाम दिया था, तब वे राज्य के मंत्री थे। उस अधिकारी का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने कांग्रेस के एक स्थानीय नेता महेंद्र शुक्ल को जमानत पर छोड़ने से मना कर दिया था। अधिकारी के साथ हुई इस बदसलूकी को बलिया में लोग बड़े चाव से बच्चा पाठक की वीरता के तौर पर सुनाते हैं। हालांकि ऑन रिकॉर्ड इस मामले को दबा दिया गया।
वैसे अधिकारियों का भी एक बड़ा तबका राजनेताओं और ठेकेदारों के भ्रष्टाचार के हाथों में खेलने में ही अपनी भलाई देखता है। ऐसे में उनकी भी वकत कम हुई है। यशवंत सोनावाणे की हत्या की घटना ने इस मकड़जाल को एक बार फिर उजागर किया है।
Friday, January 28, 2011
Tuesday, January 25, 2011
भारतीय गणतंत्र की ताकत
उमेश चतुर्वेदी
26 जनवरी 1950 को जब भारतीय संविधान को स्वीकृति मिली, तब दुर्भाग्यवश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इस अद्भुत ऐतिहासिक बदलाव को देखने के लिए हमारे बीच मौजूद नहीं थे। संविधान को लेकर बापू की परिकल्पना क्या थी, इसे जानने-समझने के लिए 1922 में दिए उनके एक बयान को देखना होगा। तब गांधी जी ने कहा था कि भारतीय संविधान भारतीयों के मुताबिक होगा और इसमें हर भारतीय की इच्छा झलकेगी। दरअसल गांधी चाहते थे कि भारतीय संविधान ना सिर्फ भारतीय आत्मा से युक्त हो, बल्कि भारतीय समाज और राजनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखने वाला हो। यही वजह है कि उनके इस ऐतिहासिक बयान के ठीक दो साल बाद पंडित मोतीलाल नेहरू ने अंग्रेज सरकार के सामने आजाद भारत का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा के गठन की मांग रखी। गांधी के सपने को कांग्रेस और उसके आलानेता समझते थे। यही वजह है कि 1946 में जब संविधान सभा का गठन हुआ तो उसमें हर समुदाय को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई। इसमें 30 से अधिक लोग अल्पसंख्यक वर्ग के थे। फ्रेंक एंथनी एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि थे। इस सभा में अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष हरेंद्र कुंवर मुखर्जी थे, जबकि गोरखा समुदाय के प्रतिनिधि अरि बहादुर गुरांग थे। अन्य अहम सदस्यों में बी.आर. अंबेडकर, कृष्णास्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी और गणेश मावलंकर थे। इतना ही नहीं, इस सभा में महिला सदस्यों को भी शामिल किया गया, जिनमें सरोजनी नायडू, हंसाबाई मेहता, दुर्गाबाई देशमुख और राजकुमारी अमृत कौर प्रमुख थीं। इस सभा के पहले सभापति बिहार के वरिष्ठ समाजवादी नेता सच्चिदानंद सिन्हा चुने गए। बाद में इस सभा के सभापति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को बनाया गया। यह संयोग ही है कि उसी संविधान के तहत भारत के पहले राष्ट्रपति का चुनाव हुआ तो कांग्रेस की पहली पसंद यही डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ही थे। संविधान सभा की पहली बैठक नौ दिसंबर 1946 को हुई थी। जबकि संविधान बनाने के लिए इस सभा ने भीम राव अंबेडकर की अध्यक्षता में बाकायदा एक प्रारूप समिति(ड्राफ्ट कमेटी) का गठन भी किया। जिसकी पहली बैठक 29 अगस्त 1947 को हुई। इस समिति में अंबेडकर के अलावा छह और सदस्य थे। इतनी मेहनत के बाद बने संविधान को बेहतर होना ही था। भारतीय संविधान में भारत को गणतांत्रिक गणराज्य कहा गया है। लेकिन हमारा गणराज्य पूर्व सोवियत संघ की तरह राज्यों का संघ नहीं है। गणतंत्र का मतलब समूह तंत्र यानी राज्यों का समूह ही होता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे यहां राज्य सोवियत संघ या स्विटजरलैंड की तरह आजाद तो नहीं हैं, लेकिन उनकी स्वायत्तता का संविधान ने खासा ध्यान रखा है। भारत में शासन तीन सूचियों के तहत होता है – संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। सबसे दिलचस्प बात यह है कि राज्य सूची के विषयों मसलन कानून और व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार राज्यों के अधिकार में दखल नहीं दे सकती। लेकिन जब कानून – व्यवस्था की यह ढिलाई देश की सेहत पर असर डालने लगती है तो केंद्र को धारा 355 और 356 के तहत कार्रवाई करने का अधिकार संविधान ने दे रखा है। केंद्र सूची पर निश्चित तौर सिर्फ और सिर्फ केंद्र का ही अधिकार है तो समवर्ती सूची पर राज्यों और केंद्र दोनों का अधिकार है। लेकिन विवाद की स्थिति में संसद की ही बात मानी जाएगी। 356 और संसद के विशेषाधिकार का प्रावधान दरअसल देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने का अधिकार देता है। किसी राज्य सरकार को केंद्र सरकार बर्खास्त तो कर सकती है। लेकिन देश का गणतांत्रिक स्वरूप बनाए रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने इसके लिए जरूरी उपबंध कर दिया है। मसलन जब तक संसद के दोनों सदन अलग-अलग केंद्र सरकार के इस फैसले पर सहमति नहीं जताते तो उसका आदेश वैध नहीं रह सकेगा। बिहार में ऐसा हो चुका है। इसी तरह कर्नाटक के पूर्व मुख्य मंत्री एस आर बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई राज्य सरकार बहुमत में है या अल्पमत में, इसका फैसला विधानसभा में ही होना चाहिए। इस एक उपबंध ने राज्य सरकारों की स्वायत्तता को बरकरार रखने और राज्यपालों के जरिए केंद्र सरकार की मनमानी पर पूरी तरह रोक लगा दी। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि राज्य अपनी मनमानी कर सकें। संविधान ने उन्हें रोकने के लिए भी केंद्र को भरपूर हथियार मुहैया कराए हैं।
सबसे पहले जानते हैं कि संघात्मक संविधान की प्रमुख विशेषताएँ क्या मानी जाती हैं। राजनीति शास्त्र के पंडितों के मुताबिक राजनयिक शक्तियों का संघीय एवं राज्य सरकारों के बीच संवैधानिक विभाजन संघात्मक संविधान की पहली शर्त है। संघीय संविधान के मुताबिक केंद्रीय प्रभुसत्ता से न तो संघीय और न ही राज्य सरकारें अलग हो सकती हैं। इसके साथ ही संघात्मक संविधान केंद्र और राज्य दोनों के लिए समान तौर पर सर्वोच्च होता है। चूंकि संघ एवं राज्य सरकारों के बीच अधिकारों का साफ विभाजन होता है, लिहाजा संघात्मक सविधान का लिखित होना सबसे ज्यादा जरूरी है। संघात्मक संविधान संघीय एवं राज्यों के समझौते को आखिरी तौर पर पुष्ट करता है। इस वजह से ऐसे संविधान को व्यावहारिक रूप से अपरिवर्तनीय भी होना चाहिए। कम से कम किसी एक पक्ष के के मत से ऐसा संविधान परिवर्तित नहीं किया जा सकता। संविधान में बदलाव खास हालत में विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है। संवैधानिक अधिकारों, काम करने और साधनों को लेकर केंद्र और राज्य सरकार में जब भी विवाद हो तो उन पर फैसला लेने के लिए न्यायपालिका के पास संविधान के संघात्मक प्रावधानों की व्य़ाख्या का पूरा और आखिरी अधिकार होना चाहिए। कहना न होगा कि 1787 में 12 स्वतंत्र राष्ट्रों की संविदा के अनुसार बने अमेरिका का संविधान इन सभी खासियतों वाला आदर्श संविधान है। हमारा संविधान भी इन विशेषताओं के नजरिए से खरा उतरता है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी एवं फ्रांस आदि में भी संघात्मक यानी गणतांत्रिक व्यवस्था है। लेकिन उनकी तुलना में भारतीय गणतंत्र को कहीं ज्यादा व्यवहारिक माना जाता है।
भारतीय गणतंत्र की ताकत भारतीयों द्वारा लिखित 395 अनुच्छेद व आठ अनुसूची से सुसज्जित दुनिया का विशालतम संविधान ही है। इस संविधान में अब तक 93 संशोधन हो चुके हैं, जिससे यह पहले से भी अधिक शक्तिशाली हो गया है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि यह संविधान हर भारतीय को अपनी बात वाजिब ढंग से कहने और इंसाफ पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार भी देता है। यही वजह है कि एटा उत्तर प्रदेश का कोई परेशान पिता अपनी बेटी के अपहरण पर पुलिस की ढिलाई बरतने से निराश होकर सुप्रीम कोर्ट को पोस्ट कार्ड लिखता है और सुप्रीम कोर्ट उसे ही याचिका मानकर प्रशासन की खटिया खड़ा कर देता है। भारतीय गणतंत्र की ताकत न्यायपालिका की न्यायिक मामलों में स्वायत्तता भी है। इसके साथ ही नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय को बनाना भी है। हालांकि इतिहास में कई बार उससे खिलवाड़ हो चुके हैं। लेकिन अब न्यायपालिका जाग गई है और उसे आम भारतीय के पक्ष में और जरूरत पड़े तो अपने बीच के लोगों के खिलाफ भी फैसले सुनाने से परहेज नहीं रहा।
भारतीय गणतंत्र की सर्वोच्च शक्ति नागरिक है और उससे भी बड़ी उसकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा है। राष्ट्र के प्रति आम भारतीय के मन में इज्जत सिर्फ इस लिए ही नहीं है कि इस राष्ट्र को बनाने और उसकी परिकल्पना के पीछे स्वतंत्रता आंदोलन का बड़ा योगदान रहा है। बल्कि इस देश में नागरिकों को मिले समानता के अधिकार ने उसके प्रति निष्ठाएं बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि भाई-भतीजावाद, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आधिकारिक लापरवाही अपने गणतंत्र के लिए अब भी चुनौती बनी हुई है। कभी-कभी सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता का उन्माद भी भारतीय गणतंत्र की राह में बड़ा रोड़ा बनकर खड़ा हो जाता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इसी गणतंत्र में इन चुनौतियों से जूझने का माद्दा भी है। लचीलापन और वक्त पड़ने पर कठोर देशभक्ति का भाव- दोनों मिलकर भारतीय गणतंत्र को महान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
26 जनवरी 1950 को जब भारतीय संविधान को स्वीकृति मिली, तब दुर्भाग्यवश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी इस अद्भुत ऐतिहासिक बदलाव को देखने के लिए हमारे बीच मौजूद नहीं थे। संविधान को लेकर बापू की परिकल्पना क्या थी, इसे जानने-समझने के लिए 1922 में दिए उनके एक बयान को देखना होगा। तब गांधी जी ने कहा था कि भारतीय संविधान भारतीयों के मुताबिक होगा और इसमें हर भारतीय की इच्छा झलकेगी। दरअसल गांधी चाहते थे कि भारतीय संविधान ना सिर्फ भारतीय आत्मा से युक्त हो, बल्कि भारतीय समाज और राजनीतिक जरूरतों को ध्यान में रखने वाला हो। यही वजह है कि उनके इस ऐतिहासिक बयान के ठीक दो साल बाद पंडित मोतीलाल नेहरू ने अंग्रेज सरकार के सामने आजाद भारत का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा के गठन की मांग रखी। गांधी के सपने को कांग्रेस और उसके आलानेता समझते थे। यही वजह है कि 1946 में जब संविधान सभा का गठन हुआ तो उसमें हर समुदाय को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई। इसमें 30 से अधिक लोग अल्पसंख्यक वर्ग के थे। फ्रेंक एंथनी एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रतिनिधि थे। इस सभा में अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष हरेंद्र कुंवर मुखर्जी थे, जबकि गोरखा समुदाय के प्रतिनिधि अरि बहादुर गुरांग थे। अन्य अहम सदस्यों में बी.आर. अंबेडकर, कृष्णास्वामी अय्यर, के.एम. मुंशी और गणेश मावलंकर थे। इतना ही नहीं, इस सभा में महिला सदस्यों को भी शामिल किया गया, जिनमें सरोजनी नायडू, हंसाबाई मेहता, दुर्गाबाई देशमुख और राजकुमारी अमृत कौर प्रमुख थीं। इस सभा के पहले सभापति बिहार के वरिष्ठ समाजवादी नेता सच्चिदानंद सिन्हा चुने गए। बाद में इस सभा के सभापति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को बनाया गया। यह संयोग ही है कि उसी संविधान के तहत भारत के पहले राष्ट्रपति का चुनाव हुआ तो कांग्रेस की पहली पसंद यही डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ही थे। संविधान सभा की पहली बैठक नौ दिसंबर 1946 को हुई थी। जबकि संविधान बनाने के लिए इस सभा ने भीम राव अंबेडकर की अध्यक्षता में बाकायदा एक प्रारूप समिति(ड्राफ्ट कमेटी) का गठन भी किया। जिसकी पहली बैठक 29 अगस्त 1947 को हुई। इस समिति में अंबेडकर के अलावा छह और सदस्य थे। इतनी मेहनत के बाद बने संविधान को बेहतर होना ही था। भारतीय संविधान में भारत को गणतांत्रिक गणराज्य कहा गया है। लेकिन हमारा गणराज्य पूर्व सोवियत संघ की तरह राज्यों का संघ नहीं है। गणतंत्र का मतलब समूह तंत्र यानी राज्यों का समूह ही होता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे यहां राज्य सोवियत संघ या स्विटजरलैंड की तरह आजाद तो नहीं हैं, लेकिन उनकी स्वायत्तता का संविधान ने खासा ध्यान रखा है। भारत में शासन तीन सूचियों के तहत होता है – संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। सबसे दिलचस्प बात यह है कि राज्य सूची के विषयों मसलन कानून और व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार राज्यों के अधिकार में दखल नहीं दे सकती। लेकिन जब कानून – व्यवस्था की यह ढिलाई देश की सेहत पर असर डालने लगती है तो केंद्र को धारा 355 और 356 के तहत कार्रवाई करने का अधिकार संविधान ने दे रखा है। केंद्र सूची पर निश्चित तौर सिर्फ और सिर्फ केंद्र का ही अधिकार है तो समवर्ती सूची पर राज्यों और केंद्र दोनों का अधिकार है। लेकिन विवाद की स्थिति में संसद की ही बात मानी जाएगी। 356 और संसद के विशेषाधिकार का प्रावधान दरअसल देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने का अधिकार देता है। किसी राज्य सरकार को केंद्र सरकार बर्खास्त तो कर सकती है। लेकिन देश का गणतांत्रिक स्वरूप बनाए रखने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने इसके लिए जरूरी उपबंध कर दिया है। मसलन जब तक संसद के दोनों सदन अलग-अलग केंद्र सरकार के इस फैसले पर सहमति नहीं जताते तो उसका आदेश वैध नहीं रह सकेगा। बिहार में ऐसा हो चुका है। इसी तरह कर्नाटक के पूर्व मुख्य मंत्री एस आर बोम्मई केस में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई राज्य सरकार बहुमत में है या अल्पमत में, इसका फैसला विधानसभा में ही होना चाहिए। इस एक उपबंध ने राज्य सरकारों की स्वायत्तता को बरकरार रखने और राज्यपालों के जरिए केंद्र सरकार की मनमानी पर पूरी तरह रोक लगा दी। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि राज्य अपनी मनमानी कर सकें। संविधान ने उन्हें रोकने के लिए भी केंद्र को भरपूर हथियार मुहैया कराए हैं।
सबसे पहले जानते हैं कि संघात्मक संविधान की प्रमुख विशेषताएँ क्या मानी जाती हैं। राजनीति शास्त्र के पंडितों के मुताबिक राजनयिक शक्तियों का संघीय एवं राज्य सरकारों के बीच संवैधानिक विभाजन संघात्मक संविधान की पहली शर्त है। संघीय संविधान के मुताबिक केंद्रीय प्रभुसत्ता से न तो संघीय और न ही राज्य सरकारें अलग हो सकती हैं। इसके साथ ही संघात्मक संविधान केंद्र और राज्य दोनों के लिए समान तौर पर सर्वोच्च होता है। चूंकि संघ एवं राज्य सरकारों के बीच अधिकारों का साफ विभाजन होता है, लिहाजा संघात्मक सविधान का लिखित होना सबसे ज्यादा जरूरी है। संघात्मक संविधान संघीय एवं राज्यों के समझौते को आखिरी तौर पर पुष्ट करता है। इस वजह से ऐसे संविधान को व्यावहारिक रूप से अपरिवर्तनीय भी होना चाहिए। कम से कम किसी एक पक्ष के के मत से ऐसा संविधान परिवर्तित नहीं किया जा सकता। संविधान में बदलाव खास हालत में विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा ही किया जा सकता है। संवैधानिक अधिकारों, काम करने और साधनों को लेकर केंद्र और राज्य सरकार में जब भी विवाद हो तो उन पर फैसला लेने के लिए न्यायपालिका के पास संविधान के संघात्मक प्रावधानों की व्य़ाख्या का पूरा और आखिरी अधिकार होना चाहिए। कहना न होगा कि 1787 में 12 स्वतंत्र राष्ट्रों की संविदा के अनुसार बने अमेरिका का संविधान इन सभी खासियतों वाला आदर्श संविधान है। हमारा संविधान भी इन विशेषताओं के नजरिए से खरा उतरता है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी एवं फ्रांस आदि में भी संघात्मक यानी गणतांत्रिक व्यवस्था है। लेकिन उनकी तुलना में भारतीय गणतंत्र को कहीं ज्यादा व्यवहारिक माना जाता है।
भारतीय गणतंत्र की ताकत भारतीयों द्वारा लिखित 395 अनुच्छेद व आठ अनुसूची से सुसज्जित दुनिया का विशालतम संविधान ही है। इस संविधान में अब तक 93 संशोधन हो चुके हैं, जिससे यह पहले से भी अधिक शक्तिशाली हो गया है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि यह संविधान हर भारतीय को अपनी बात वाजिब ढंग से कहने और इंसाफ पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार भी देता है। यही वजह है कि एटा उत्तर प्रदेश का कोई परेशान पिता अपनी बेटी के अपहरण पर पुलिस की ढिलाई बरतने से निराश होकर सुप्रीम कोर्ट को पोस्ट कार्ड लिखता है और सुप्रीम कोर्ट उसे ही याचिका मानकर प्रशासन की खटिया खड़ा कर देता है। भारतीय गणतंत्र की ताकत न्यायपालिका की न्यायिक मामलों में स्वायत्तता भी है। इसके साथ ही नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय को बनाना भी है। हालांकि इतिहास में कई बार उससे खिलवाड़ हो चुके हैं। लेकिन अब न्यायपालिका जाग गई है और उसे आम भारतीय के पक्ष में और जरूरत पड़े तो अपने बीच के लोगों के खिलाफ भी फैसले सुनाने से परहेज नहीं रहा।
भारतीय गणतंत्र की सर्वोच्च शक्ति नागरिक है और उससे भी बड़ी उसकी राष्ट्र के प्रति निष्ठा है। राष्ट्र के प्रति आम भारतीय के मन में इज्जत सिर्फ इस लिए ही नहीं है कि इस राष्ट्र को बनाने और उसकी परिकल्पना के पीछे स्वतंत्रता आंदोलन का बड़ा योगदान रहा है। बल्कि इस देश में नागरिकों को मिले समानता के अधिकार ने उसके प्रति निष्ठाएं बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि भाई-भतीजावाद, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आधिकारिक लापरवाही अपने गणतंत्र के लिए अब भी चुनौती बनी हुई है। कभी-कभी सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता का उन्माद भी भारतीय गणतंत्र की राह में बड़ा रोड़ा बनकर खड़ा हो जाता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इसी गणतंत्र में इन चुनौतियों से जूझने का माद्दा भी है। लचीलापन और वक्त पड़ने पर कठोर देशभक्ति का भाव- दोनों मिलकर भारतीय गणतंत्र को महान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
Tuesday, January 11, 2011
मनरेगा की बढ़ी दरों से किसे होगा फायदा
उमेश चतुर्वेदी
महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरी बढ़ाने के मसले पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिस तरह सोनिया गांधी को जवाब लिखा था, उससे लग रहा था कि मनरेगा के तहत ग्रामीण बेरोजगारों को पुरानी दरों पर ही पसीना बहाना पड़ेगा। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष के नाते सोनिया गांधी का सुझाव था कि जब राज्यों ने अपने यहां न्यूनतम मजदूरी दरें बढ़ा दी हैं, लिहाजा मनरेगा की मेहनताना दरें भी बढ़ाई जानी चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री का मानना था कि सरकार कानूनी तौर पर मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी दरें बढ़ाने के लिए बाध्य नहीं है। बहरहाल सोनिया गांधी के सुझाव पर मनरेगा की मजदूरी की दरें से सत्रह से तीस फीसदी तक बढ़ा दी गईं हैं। इससे केंद्र सरकार पर तकरीबन 3500 करोड़ रूपए सालाना का अतिरिक्त बोझ बढ़ने का अनुमान जताया जा रहा है। प्रधानमंत्री इन दरों को बढ़ाने से हिचक रहे थे तो शायद उसके पीछे सरकारी खजाने पर बढ़ने वाला इस बोझ की चिंता ही काम कर रही थी। बहरहाल केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय का दावा है कि इससे देश के पांच करोड़ ऐसे लोगों को सीधे फायदा होगा, जिन्हें नियमित तौर पर रोजगार हासिल नहीं है। उपर से देखने में सरकार का यह दावा सही लगता है। लेकिन इसके तह में जाने के बाद इसकी हकीकत परत-दर-परत खुलकर सामने आ जाती है।
मनरेगा योजना ग्रामीण इलाके के उन लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई थी, जिन्हें पूरे साल रोजगार हासिल नहीं होता। इस योजना के जरिए उन लोगों को सरकार साल में कम से कम सौ दिन का रोजगार मुहैय्या कराती है, जो बेरोजगार हैं। इसका मकसद यह है कि कम से कम इसकी कमाई से मनरेगा मजदूरों के परिवार को भुखमरी का सामना नहीं करना पड़ेगा। यूपीए की पहली सरकार में इस योजना का श्रेय सरकार का बाहर से समर्थन करते रहे वामपंथी लेते रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अतुल कुमार अनजान खुलेतौर पर कहते रहे हैं कि 2008 की विश्वव्यापी मंदी के दौरान मनरेगा के ही चलते भारतीय अर्थव्यवस्था पर खास असर नहीं पड़ा। क्योंकि इस योजना के जरिए गांवों तक पैसा प्रवाह बढ़ा और इससे अर्थव्यवस्था चलती रही। 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने भी अपनी इसे सफल योजना के तौर पर जमकर प्रचारित किया और वोट के मैदान में इसका फायदा उठाने की कामयाब कोशिश भी की। इस बीच छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हुईं, महंगाई सुरसा की तरह मुंह बाए बढ़ती रही। ऐसे में यह वाजिब ही था कि मनरेगा के तहत काम करने वालों की मजदूरी बढ़ाने की मांग उठे। बढ़ती महंगाई के दौर में सौ या सवा सौ रूपए की रोजाना की मजदूरी पर गुजारा करना आसान कैसे हो सकता है। यहां यह ध्यान देने की बात यह है कि मजदूरी की दरें तमाम राज्यों में भी अलग-अलग है। सबसे कम 80 रूपए मजदूरी अरूणाचल प्रदेश और नगालैंड में है तो इससे कुछ ज्यादा 81.40 मजदूरी मणिपुर में है। वहीं झारखंड में यह दर 99 रूपए है। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और राजस्थान में 100 रूपए है। जबकि हरियाणा के लोगों को रोजाना 141 रूपए की दर पर मनरेगा के तहत मजदूरी दी जाती है। इन आंकड़ों से साफ है कि राज्यों में ये दरें एक समान नहीं हैं। बहरहाल जिन राज्यों में सौ रूपए से कम मजदूरी है, वहां के मजदूरों को अब कम से कम सौ रूपए मिलेंगे। इसी तरह उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड में 120 रूपए दिए जाएंगे। राजस्थान में यह दर जहां 119 रूपए होगी, वहीं हरियाणा में सबसे ज्यादा 141 रूपए मिलेंगे। लेकिन सबसे बडा सवाल यह है कि जिस न्यूनतम मजदूरी दर को आधार बनाकर इसे बढा़या गया है, कुछ राज्यों में अब भी मनरेगा के तहत उतनी रकम नहीं मिलने जा रही। मसलन राजस्थान में न्यूनतम मजदूरी दर इन दिनों 135 रूपए है, लेकिन बढ़ी हुई दरों पर यहां कुल जमा 119 रूपए ही मिलेंगे। उपर से देखने में मनरेगा दर में यही एक गड़बड़ी नजर आ रही है। लेकिन ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम कर रहे स्वयंसेवी संगठनों को इस बढ़ी हुई दर में भी राजनीति नजर आ रही है। पीस फाउंडेशन से जुडे धीरेंद्र सिंह का कहना है कि मनरेगा के तहत एक साथ 3500 करोड़ रूपए ज्यादा मिलने से बैंकों को कहीं ज्यादा फायदा होगा। क्योंकि यह रकम बैंकों के ही तहत मजदूरों के पास जाएगी। नए नियमों के तहत बैंक अपने यहां जमा रकम से नौगुना ज्यादा रकम का लोन दे सकते हैं। जाहिर है मनरेगा के तहत आवंटित हुए पैसे से बैंकों का कारोबार बढ़ेगा।
स्वयंसेवी संगठनों को लगता है कि बढ़ी हुई यह रकम भी नाकाफी है। क्योंकि 2009 में सौ रूपए की जो कीमत थी, उसके मुकाबले आज के दौर में 120 या 141 रूपए की कीमत भी बेहद कम है। स्वयंसेवी संगठनों का सवाल यह भी है कि मूलतः यह योजना ग्रामीण बेरोजगारों के लिए है। लेकिन हकीकत तो यह है कि गांवों में अब लोग रहे ही नहीं। दरअसल अब बेरोजगारी की समस्या शहरों के लिए ज्यादा है और मनरेगा की यह रकम सिर्फ ग्रामीण बेरोजगारी को ही एक हद तक रोक सकती है। उनका कहना है कि अगर छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करते वक्त ही मनरेगा की मजदूरी दरें बढ़ाई गईं होतीं तो शायद शहरी बेरोजगारी को एक हद तक रोका जा सकता था। जिसका फायदा शहरों को भी होता, तब ग्रामीण बेरोजगार मजबूरी में शहरों का रूख नहीं करते।
महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरी बढ़ाने के मसले पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिस तरह सोनिया गांधी को जवाब लिखा था, उससे लग रहा था कि मनरेगा के तहत ग्रामीण बेरोजगारों को पुरानी दरों पर ही पसीना बहाना पड़ेगा। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के अध्यक्ष के नाते सोनिया गांधी का सुझाव था कि जब राज्यों ने अपने यहां न्यूनतम मजदूरी दरें बढ़ा दी हैं, लिहाजा मनरेगा की मेहनताना दरें भी बढ़ाई जानी चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री का मानना था कि सरकार कानूनी तौर पर मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी दरें बढ़ाने के लिए बाध्य नहीं है। बहरहाल सोनिया गांधी के सुझाव पर मनरेगा की मजदूरी की दरें से सत्रह से तीस फीसदी तक बढ़ा दी गईं हैं। इससे केंद्र सरकार पर तकरीबन 3500 करोड़ रूपए सालाना का अतिरिक्त बोझ बढ़ने का अनुमान जताया जा रहा है। प्रधानमंत्री इन दरों को बढ़ाने से हिचक रहे थे तो शायद उसके पीछे सरकारी खजाने पर बढ़ने वाला इस बोझ की चिंता ही काम कर रही थी। बहरहाल केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय का दावा है कि इससे देश के पांच करोड़ ऐसे लोगों को सीधे फायदा होगा, जिन्हें नियमित तौर पर रोजगार हासिल नहीं है। उपर से देखने में सरकार का यह दावा सही लगता है। लेकिन इसके तह में जाने के बाद इसकी हकीकत परत-दर-परत खुलकर सामने आ जाती है।
मनरेगा योजना ग्रामीण इलाके के उन लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई गई थी, जिन्हें पूरे साल रोजगार हासिल नहीं होता। इस योजना के जरिए उन लोगों को सरकार साल में कम से कम सौ दिन का रोजगार मुहैय्या कराती है, जो बेरोजगार हैं। इसका मकसद यह है कि कम से कम इसकी कमाई से मनरेगा मजदूरों के परिवार को भुखमरी का सामना नहीं करना पड़ेगा। यूपीए की पहली सरकार में इस योजना का श्रेय सरकार का बाहर से समर्थन करते रहे वामपंथी लेते रहे हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अतुल कुमार अनजान खुलेतौर पर कहते रहे हैं कि 2008 की विश्वव्यापी मंदी के दौरान मनरेगा के ही चलते भारतीय अर्थव्यवस्था पर खास असर नहीं पड़ा। क्योंकि इस योजना के जरिए गांवों तक पैसा प्रवाह बढ़ा और इससे अर्थव्यवस्था चलती रही। 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने भी अपनी इसे सफल योजना के तौर पर जमकर प्रचारित किया और वोट के मैदान में इसका फायदा उठाने की कामयाब कोशिश भी की। इस बीच छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हुईं, महंगाई सुरसा की तरह मुंह बाए बढ़ती रही। ऐसे में यह वाजिब ही था कि मनरेगा के तहत काम करने वालों की मजदूरी बढ़ाने की मांग उठे। बढ़ती महंगाई के दौर में सौ या सवा सौ रूपए की रोजाना की मजदूरी पर गुजारा करना आसान कैसे हो सकता है। यहां यह ध्यान देने की बात यह है कि मजदूरी की दरें तमाम राज्यों में भी अलग-अलग है। सबसे कम 80 रूपए मजदूरी अरूणाचल प्रदेश और नगालैंड में है तो इससे कुछ ज्यादा 81.40 मजदूरी मणिपुर में है। वहीं झारखंड में यह दर 99 रूपए है। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और राजस्थान में 100 रूपए है। जबकि हरियाणा के लोगों को रोजाना 141 रूपए की दर पर मनरेगा के तहत मजदूरी दी जाती है। इन आंकड़ों से साफ है कि राज्यों में ये दरें एक समान नहीं हैं। बहरहाल जिन राज्यों में सौ रूपए से कम मजदूरी है, वहां के मजदूरों को अब कम से कम सौ रूपए मिलेंगे। इसी तरह उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और झारखंड में 120 रूपए दिए जाएंगे। राजस्थान में यह दर जहां 119 रूपए होगी, वहीं हरियाणा में सबसे ज्यादा 141 रूपए मिलेंगे। लेकिन सबसे बडा सवाल यह है कि जिस न्यूनतम मजदूरी दर को आधार बनाकर इसे बढा़या गया है, कुछ राज्यों में अब भी मनरेगा के तहत उतनी रकम नहीं मिलने जा रही। मसलन राजस्थान में न्यूनतम मजदूरी दर इन दिनों 135 रूपए है, लेकिन बढ़ी हुई दरों पर यहां कुल जमा 119 रूपए ही मिलेंगे। उपर से देखने में मनरेगा दर में यही एक गड़बड़ी नजर आ रही है। लेकिन ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम कर रहे स्वयंसेवी संगठनों को इस बढ़ी हुई दर में भी राजनीति नजर आ रही है। पीस फाउंडेशन से जुडे धीरेंद्र सिंह का कहना है कि मनरेगा के तहत एक साथ 3500 करोड़ रूपए ज्यादा मिलने से बैंकों को कहीं ज्यादा फायदा होगा। क्योंकि यह रकम बैंकों के ही तहत मजदूरों के पास जाएगी। नए नियमों के तहत बैंक अपने यहां जमा रकम से नौगुना ज्यादा रकम का लोन दे सकते हैं। जाहिर है मनरेगा के तहत आवंटित हुए पैसे से बैंकों का कारोबार बढ़ेगा।
स्वयंसेवी संगठनों को लगता है कि बढ़ी हुई यह रकम भी नाकाफी है। क्योंकि 2009 में सौ रूपए की जो कीमत थी, उसके मुकाबले आज के दौर में 120 या 141 रूपए की कीमत भी बेहद कम है। स्वयंसेवी संगठनों का सवाल यह भी है कि मूलतः यह योजना ग्रामीण बेरोजगारों के लिए है। लेकिन हकीकत तो यह है कि गांवों में अब लोग रहे ही नहीं। दरअसल अब बेरोजगारी की समस्या शहरों के लिए ज्यादा है और मनरेगा की यह रकम सिर्फ ग्रामीण बेरोजगारी को ही एक हद तक रोक सकती है। उनका कहना है कि अगर छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करते वक्त ही मनरेगा की मजदूरी दरें बढ़ाई गईं होतीं तो शायद शहरी बेरोजगारी को एक हद तक रोका जा सकता था। जिसका फायदा शहरों को भी होता, तब ग्रामीण बेरोजगार मजबूरी में शहरों का रूख नहीं करते।
Monday, December 20, 2010
वैचारिकता और सादगी की राजनीति के आखिरी प्रतीक
उमेश चतुर्वेदी
सन 2001 के गर्मियों की एक दोपहर दिल्ली के एक अखबारी दफ्तर में सादगी से भरी एक शख्सियत नमूदार हुई। उस अखबार ने उस शख्सियत से तब के दौर की राजनीति पर एक लेख की फरमाइश की थी। किसी व्यस्तता के चलते तय वक्त पर लेख न दे पाने की बात उन्हें याद आई तो वे सीधा अखबार के दफ्तर चले आए। दफ्तर पहुंचते ही उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक से कागज की मांग रखी और एक कोने में तल्लीनता से लेख लिखने बैठ गए। अभी वे लेख लिख ही रहे थे कि भोपाल से आए एक दफ्तरी मित्र ने उनके बारे कुछ इस अंदाज में पूछताछ की- पंडित जी, कौन है यह शख्स, जिसके ऐसे दिन आ गए हैं कि अखबारी दफ्तर के कोने में बैठ कर लिखना पड़ रहा है। जब उस मित्र को बताया गया कि ये सज्जन जनता पार्टी के पूर्व महासचिव तथा खादी और ग्रामोद्योग आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र मोहन हैं तो उनका मुंह हैरत से खुला का खुला ही रह गया।
सुरेंद्र मोहन का नाम आज की पीढ़ी हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में छपते रहे उनके राजनीतिक लेखों के लिए ही जानती होगी। लेकिन समाजवादी आंदोलन की धारा से ताजिंदगी जुड़े रहे इस शख्स की एक दौर में देश के राजनीतिक गलियारों में तूती बोलती थी। डॉक्टर लोहिया और किशन पटनायक के नजदीकी रहे सुरेंद्र मोहन का जनता पार्टी के गठन में खास योगदान था। इंदिरा सरकार ने देश पर जब आपातकाल थोप दिया तो उसका जोरदार विरोध करने वाले लोगों में सुरेंद्र मोहन आगे थे। जिसकी कीमत उन्हें जेल यात्रा के तौर पर चुकानी पड़ी। आपातकाल खत्म होने के बाद समूचे विपक्ष की एकता के तौर पर जनता पार्टी बनी और सुरेंद्र मोहन उसके महासचिव बने। महासचिव रहते नौजवानों को राजनीति में आगे लगे और उन्हें समाजवादी नैतिकता में प्रशिक्षित करने में सुरेंद्र मोहन की भूमिका को आज भी लोग याद करते हैं। आज की राजनीति का साहित्य-लेखन और संस्कृतिकर्म से लगभग रिश्ता टूटता जा रहा है। लेकिन सुरेंद्र मोहन ऐसे राजनेता थे, जिनका लेखन और संस्कृतिकर्म से बराबर रिश्ता बना रहा। अरविंद मोहन, कुरबान अली, विनोद अग्निहोत्री से लेकर नई पीढ़ी तक के पत्रकारों से उनका रिश्ता बना रहा। रिश्तों के बीच अपनी राजनीतिक ऊंचाई को कभी आड़े नहीं आने देते थे। इन पंक्तियों के लेखक को याद है कि 1996 के लोकसभा चुनावों में किस तरह लोग उनके सामने जनता दल का टिकट पाने के लिए लाइन लगाए खड़े रहते थे। 1996 के लोकसभा चुनावों के बाद जब किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो संयुक्त मोर्चा की सरकार बनवाने में हरिकिशन सिंह सुरजीत के साथ जिन नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उनमें सुरेंद्र मोहन का नाम भी आगे था। बदले में उन्हें राज्यपाल का पद वीपी सिंह सरकार ने प्रस्तावित किया। लेकिन उन्होंने विनम्रता पूर्वक इसे ठुकरा दिया। जब उन्हें खादी और ग्रामोद्योग आयोग का अध्यक्ष पद प्रस्तावित हुआ तो गांधी जी के कार्यों को आगे बढ़ाने के नाम पर उन्होंने यह भूमिका स्वीकार कर ली।
1989 में राष्ट्रीय मोर्चा के गठन में भी सुरेंद्र मोहन की भूमिका रही। लेकिन बदले में उन्होंने कोई प्रतिदान लेना स्वीकार नहीं किया। 1977 और 1989 में भी उन्हें राज्यपाल और कैबिनेट मंत्री पद का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन गांधीवादी सादगी में भरोसा करने वाले सुरेंद्र मोहन को पदों का मोह लुभा नहीं पाया। समाजवादी मूल्यों से उनका ताजिंदगी रिश्ता बना रहा। समाजवादी आंदोलन पर जब भी आंच आती दिखी या समाजवादी कार्यकर्ता पर हमला हुआ, आगे आने से वे कभी पीछे नहीं हटे। 2009 की गर्मियों पर जब डॉक्टर सुनीलम पर हमला हुआ तो दिल्ली के मध्यप्रदेश भवन के सामने चिलचिलाती धूप में प्रदर्शन करने से भी वे पीछे नहीं हटे। खादी के पैंट-शर्ट में लंबी-पतली क्षीण काया को संभालते कंधे पर खादी का झोला टांगे उनकी शख्सियत हर उस मौके पर नमूदार हो जाती, जहां उनकी जरूरत होती। अस्सी पार की वय और दमे का रोग उनकी राह में कभी बाधा नहीं बना। दिल्ली के विट्ठलभाई पटेल हाउस के ठीक सामने अखबारों का गढ़ आईएनएस बिल्डिंग स्थापित हैं। वहां संजय की चाय की दुकान पर पत्रकारों के साथ चाय पीने और सामयिक राजनीति की चर्चा करते उन्हें देखा जा सकता था। हालांकि पिछले कुछ सालों से उम्र के तकाजे ने इस आदत पर विराम लगा दिया था।
शुक्रवार की सुबह जब सामयिक वार्ता से जुड़े एक मित्र का फोन उनके न रहने की खबर के साथ आया तो सहसा भरोसा नहीं हुआ। गुरूवार की देर शाम वे मुंबई से लौटे थे और लिखाई-पढ़ाई के बाद सो गए थे। शुक्रवार की सुबह उठकर उन्होंने पानी पिया और बेचैनी की शिकायत की। पत्नी मंजू मोहन जब तक उन्हें अस्पताल ले जाने की तैयारी करतीं, समाजवाद का सादगीभरा सितारा उस राह पर कूच कर गया, जहां से सिर्फ स्मृतियां ही लौट पाती हैं। जब-जब समाजवाद की चर्चा छिड़ेगी, दिल्ली के नौजवान पत्रकारों को समाजवादी दुरभिसंधियों को समझने की जरूरत पड़ेगी, सुरेंद्र मोहन की याद आती रहेगी।
सन 2001 के गर्मियों की एक दोपहर दिल्ली के एक अखबारी दफ्तर में सादगी से भरी एक शख्सियत नमूदार हुई। उस अखबार ने उस शख्सियत से तब के दौर की राजनीति पर एक लेख की फरमाइश की थी। किसी व्यस्तता के चलते तय वक्त पर लेख न दे पाने की बात उन्हें याद आई तो वे सीधा अखबार के दफ्तर चले आए। दफ्तर पहुंचते ही उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक से कागज की मांग रखी और एक कोने में तल्लीनता से लेख लिखने बैठ गए। अभी वे लेख लिख ही रहे थे कि भोपाल से आए एक दफ्तरी मित्र ने उनके बारे कुछ इस अंदाज में पूछताछ की- पंडित जी, कौन है यह शख्स, जिसके ऐसे दिन आ गए हैं कि अखबारी दफ्तर के कोने में बैठ कर लिखना पड़ रहा है। जब उस मित्र को बताया गया कि ये सज्जन जनता पार्टी के पूर्व महासचिव तथा खादी और ग्रामोद्योग आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र मोहन हैं तो उनका मुंह हैरत से खुला का खुला ही रह गया।
सुरेंद्र मोहन का नाम आज की पीढ़ी हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में छपते रहे उनके राजनीतिक लेखों के लिए ही जानती होगी। लेकिन समाजवादी आंदोलन की धारा से ताजिंदगी जुड़े रहे इस शख्स की एक दौर में देश के राजनीतिक गलियारों में तूती बोलती थी। डॉक्टर लोहिया और किशन पटनायक के नजदीकी रहे सुरेंद्र मोहन का जनता पार्टी के गठन में खास योगदान था। इंदिरा सरकार ने देश पर जब आपातकाल थोप दिया तो उसका जोरदार विरोध करने वाले लोगों में सुरेंद्र मोहन आगे थे। जिसकी कीमत उन्हें जेल यात्रा के तौर पर चुकानी पड़ी। आपातकाल खत्म होने के बाद समूचे विपक्ष की एकता के तौर पर जनता पार्टी बनी और सुरेंद्र मोहन उसके महासचिव बने। महासचिव रहते नौजवानों को राजनीति में आगे लगे और उन्हें समाजवादी नैतिकता में प्रशिक्षित करने में सुरेंद्र मोहन की भूमिका को आज भी लोग याद करते हैं। आज की राजनीति का साहित्य-लेखन और संस्कृतिकर्म से लगभग रिश्ता टूटता जा रहा है। लेकिन सुरेंद्र मोहन ऐसे राजनेता थे, जिनका लेखन और संस्कृतिकर्म से बराबर रिश्ता बना रहा। अरविंद मोहन, कुरबान अली, विनोद अग्निहोत्री से लेकर नई पीढ़ी तक के पत्रकारों से उनका रिश्ता बना रहा। रिश्तों के बीच अपनी राजनीतिक ऊंचाई को कभी आड़े नहीं आने देते थे। इन पंक्तियों के लेखक को याद है कि 1996 के लोकसभा चुनावों में किस तरह लोग उनके सामने जनता दल का टिकट पाने के लिए लाइन लगाए खड़े रहते थे। 1996 के लोकसभा चुनावों के बाद जब किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो संयुक्त मोर्चा की सरकार बनवाने में हरिकिशन सिंह सुरजीत के साथ जिन नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उनमें सुरेंद्र मोहन का नाम भी आगे था। बदले में उन्हें राज्यपाल का पद वीपी सिंह सरकार ने प्रस्तावित किया। लेकिन उन्होंने विनम्रता पूर्वक इसे ठुकरा दिया। जब उन्हें खादी और ग्रामोद्योग आयोग का अध्यक्ष पद प्रस्तावित हुआ तो गांधी जी के कार्यों को आगे बढ़ाने के नाम पर उन्होंने यह भूमिका स्वीकार कर ली।
1989 में राष्ट्रीय मोर्चा के गठन में भी सुरेंद्र मोहन की भूमिका रही। लेकिन बदले में उन्होंने कोई प्रतिदान लेना स्वीकार नहीं किया। 1977 और 1989 में भी उन्हें राज्यपाल और कैबिनेट मंत्री पद का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन गांधीवादी सादगी में भरोसा करने वाले सुरेंद्र मोहन को पदों का मोह लुभा नहीं पाया। समाजवादी मूल्यों से उनका ताजिंदगी रिश्ता बना रहा। समाजवादी आंदोलन पर जब भी आंच आती दिखी या समाजवादी कार्यकर्ता पर हमला हुआ, आगे आने से वे कभी पीछे नहीं हटे। 2009 की गर्मियों पर जब डॉक्टर सुनीलम पर हमला हुआ तो दिल्ली के मध्यप्रदेश भवन के सामने चिलचिलाती धूप में प्रदर्शन करने से भी वे पीछे नहीं हटे। खादी के पैंट-शर्ट में लंबी-पतली क्षीण काया को संभालते कंधे पर खादी का झोला टांगे उनकी शख्सियत हर उस मौके पर नमूदार हो जाती, जहां उनकी जरूरत होती। अस्सी पार की वय और दमे का रोग उनकी राह में कभी बाधा नहीं बना। दिल्ली के विट्ठलभाई पटेल हाउस के ठीक सामने अखबारों का गढ़ आईएनएस बिल्डिंग स्थापित हैं। वहां संजय की चाय की दुकान पर पत्रकारों के साथ चाय पीने और सामयिक राजनीति की चर्चा करते उन्हें देखा जा सकता था। हालांकि पिछले कुछ सालों से उम्र के तकाजे ने इस आदत पर विराम लगा दिया था।
शुक्रवार की सुबह जब सामयिक वार्ता से जुड़े एक मित्र का फोन उनके न रहने की खबर के साथ आया तो सहसा भरोसा नहीं हुआ। गुरूवार की देर शाम वे मुंबई से लौटे थे और लिखाई-पढ़ाई के बाद सो गए थे। शुक्रवार की सुबह उठकर उन्होंने पानी पिया और बेचैनी की शिकायत की। पत्नी मंजू मोहन जब तक उन्हें अस्पताल ले जाने की तैयारी करतीं, समाजवाद का सादगीभरा सितारा उस राह पर कूच कर गया, जहां से सिर्फ स्मृतियां ही लौट पाती हैं। जब-जब समाजवाद की चर्चा छिड़ेगी, दिल्ली के नौजवान पत्रकारों को समाजवादी दुरभिसंधियों को समझने की जरूरत पड़ेगी, सुरेंद्र मोहन की याद आती रहेगी।
Saturday, December 4, 2010
बेशर्मी की इंतिहा
उमेश चतुर्वेदीदिल्ली मेट्रो रेल के महिला कोच में सवारी के आदी हो रहे पुरूषों की धुनाई के बाद नए सवाल उठ खड़े हुए हैं। महिला पुलिस के हाथों मार खाए पुरूषों के एक वर्ग का अहम जाग गया है। ऐसे पुरूषों ने नेशनल कॉलिजन फॉर मेन नामक संगठन बनाकर अपने लिए अलग से कोच लगाने की मांग की है। अभी तक समाज का कमजोर तबका ही अपने लिए आरक्षण और आरक्षित स्थानों की मांग करता रहा है, यह पहला मौका है जब मजबूत समझे जाने वाले पुरूष समाज के किसी संगठन ने अपने लिए आरक्षित डिब्बे की मांग रखी है। अगर पहले से चल रहे फार्मूले को ही आधार बनाया जाय तो यह मानना ही पड़ेगा कि महिलाओं की बढ़ती ताकत के सामने पुरूष वर्ग खुद को असहाय समझने लगा है। इस असहायता के दबाव में उन्हें अपने लिए महिलाओं की ही तरह खास हैसियत की मांग रखने की जरूरत पड़ने लगी है।
लेकिन यह मांग सिर्फ असहायता या महिलाओं की तुलना में पुरूषवाद को कमतर देखने का नतीजा नहीं है। दिल्ली में भी देश के बाकी इलाकों की तरह बसों तक में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें रहती हैं। देश के दूसरे इलाकों में लोग महिलाओं को देखते ही सीट खाली कर देते हैं। पश्चिम बंगाल में तो महिला के लिए सीट नहीं छोड़ना बस हो या फिर मेट्रो, मारमीट तक की वजह बन सकता है। लेकिन दिल्ली में ऐसे अपवाद ही कभी दिखते हैं, अलबत्ता यहां महिलाओं को अपमानित करने की ही संस्कृति रही है। कई बार सीट मांगते वक्त सीट के सामने उपर महिला लिखा दिखाना महिलाओं के लिए उल्टा भी पड़ जाता है। बेशर्म पुरूष सवारी को यह कहने में भी हिचक नहीं होती कि उपर लिखा है तो उपर ही बैठ जाओ। ऐसी दिल्ली में मेट्रो रेल कारपोरेशन ने ट्रेनों में महिलाओं के लिए खासतौर पर अलग कोच का इंतजाम यह सोचकर किया था कि महिलाएं यात्रा के दौरान खुद को महफूज महसूस कर सकें। लेकिन दिल्ली के पुरूषों की सोच नहीं बदली, उन्हें महिलाओं के लिए आरक्षित कोच में ही चढ़ने में आनंद आने लगा। शुरू में तो मेट्रो अधिकारियों ने इसे इक्का-दुक्का घटना मान कर नजरअंदाज किया। कई बार नजरअंदाज करना बड़े नासूर की वजह बन जाता है। दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही हुआ। दिल्ली की मेट्रो रेलों के महिला आरक्षित डिब्बों में पुरूष सवारियों का घुसना नहीं रूका। इस बहाने महिला सवारियों से छेड़खानी की घटनाएं भी बढ़ने लगीं। हारकर मेट्रो और उसकी सुरक्षा में तैनात सीआईएसएफ के अधिकारियों को आखिरी रास्ता अख्तियार करना पड़ा। सादी वर्दी में महिला सिपाहियों को तैनात किया गया और महिला सवारियों की वेश में चढ़ी सीआईएसएफ की इन सिपाहियों ने शोहदों की जमकर धुनाई की। इस धुनाई को अखबारों और खबरिया चैनलों की सुर्खियां भी हासिल हुईं। संस्कारवान तबके को यह कदम महिलाओं के हित में नजर आया। लेकिन नेशनल कॉलिजन फॉर मेन की सोच कुछ दूसरी है। लिहाजा उसे इन घटनाओं ने पुरूषों को चेताने की बजाय अलग ही मांग रखने का आधार मुहैया करा दिया। कॉलिजन का तर्क है कि जब महिलाओं के लिए अलग और रिजर्व कोच हो सकते हैं तो पुरूषों के लिए क्यों नहीं। लेकिन उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि पुरूषों की तरह क्या महिलाएं भी ट्रेनों और बसों में छेड़खानी करती पाई जाती हैं। सवाल तो यह भी है कि सुनसान सड़कों में देर रात अकेले गुजरते पुरूषों से क्या महिलाएं भी रेप करती हैं। सवाल तो यह भी है कि क्या महिलाएं भी पुरूषों को वक्त-बेवक्त छूने का सुख उठाने की ही कोशिश में रहती हैं। जाहिर है इन सभी सवालों का जवाब ना में ही है। अभी हाल ही में दिल्ली के एयरटेल हाफ मैराथन में शामिल होने के बाद बॉलीवुड अभिनेत्री गुल पनाग ने कहा था कि दिल्ली के पुरूष छूने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते। जाहिर है कि उस दिन दिल्ली वालों ने उनसे शारीरिक छेड़खानी का सुख उठाने का मौका नहीं गंवाया। कुछ साल पहले मुंबई की लोकल रेलों में भी महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में पुरूष चढ़ने से परहेज नहीं करते थे। सुनसान महिला डिब्बों में बलात्कार तक की घटनाएं भी हुईं। इसके बाद मुंबई पुलिस को सख्त रवैया अख्तियार करना पड़ा और महिला डिब्बों से पुरूष सवारियों को बाहर निकाला गया। अगर दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन ने भी मनचले पुरूषों पर काबू पाने के लिए ऐसा कोई कदम उठाया तो उसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। अपनी शारीरिक बनावट के चलते महिलाएं पुरूषों से उनके स्तर पर कम से कम शारीरिक तौर पर मुकाबला कर ही नहीं सकतीं। लिहाजा उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था करनी ही पड़ेगी। बहरहाल पुरूष अपनी वर्चस्ववादी मानसिकता से अब तक उबर नहीं पाए हैं। इसीलिए महिलाओं को दी जा रही महिलाजनित जरूरी सुविधाएं भी उनसे पच नहीं पा रही है। नेशनल कॉलिजन फॉर मेन की मांग बेवकूफी से ज्यादा कुछ नहीं है। एक दौर में पत्नी पीड़ित संघ ने जिस तरह सुर्खियां हासिल की थीं, इस संगठन की ओर लोगों का ध्यान कुछ उसी अंदाज में जा रहा है। ऐसे में इसका भी पत्नी पीड़ित संघ की तरह अगर हास्यास्पद हश्र होता है तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
लेकिन यह मांग सिर्फ असहायता या महिलाओं की तुलना में पुरूषवाद को कमतर देखने का नतीजा नहीं है। दिल्ली में भी देश के बाकी इलाकों की तरह बसों तक में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें रहती हैं। देश के दूसरे इलाकों में लोग महिलाओं को देखते ही सीट खाली कर देते हैं। पश्चिम बंगाल में तो महिला के लिए सीट नहीं छोड़ना बस हो या फिर मेट्रो, मारमीट तक की वजह बन सकता है। लेकिन दिल्ली में ऐसे अपवाद ही कभी दिखते हैं, अलबत्ता यहां महिलाओं को अपमानित करने की ही संस्कृति रही है। कई बार सीट मांगते वक्त सीट के सामने उपर महिला लिखा दिखाना महिलाओं के लिए उल्टा भी पड़ जाता है। बेशर्म पुरूष सवारी को यह कहने में भी हिचक नहीं होती कि उपर लिखा है तो उपर ही बैठ जाओ। ऐसी दिल्ली में मेट्रो रेल कारपोरेशन ने ट्रेनों में महिलाओं के लिए खासतौर पर अलग कोच का इंतजाम यह सोचकर किया था कि महिलाएं यात्रा के दौरान खुद को महफूज महसूस कर सकें। लेकिन दिल्ली के पुरूषों की सोच नहीं बदली, उन्हें महिलाओं के लिए आरक्षित कोच में ही चढ़ने में आनंद आने लगा। शुरू में तो मेट्रो अधिकारियों ने इसे इक्का-दुक्का घटना मान कर नजरअंदाज किया। कई बार नजरअंदाज करना बड़े नासूर की वजह बन जाता है। दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही हुआ। दिल्ली की मेट्रो रेलों के महिला आरक्षित डिब्बों में पुरूष सवारियों का घुसना नहीं रूका। इस बहाने महिला सवारियों से छेड़खानी की घटनाएं भी बढ़ने लगीं। हारकर मेट्रो और उसकी सुरक्षा में तैनात सीआईएसएफ के अधिकारियों को आखिरी रास्ता अख्तियार करना पड़ा। सादी वर्दी में महिला सिपाहियों को तैनात किया गया और महिला सवारियों की वेश में चढ़ी सीआईएसएफ की इन सिपाहियों ने शोहदों की जमकर धुनाई की। इस धुनाई को अखबारों और खबरिया चैनलों की सुर्खियां भी हासिल हुईं। संस्कारवान तबके को यह कदम महिलाओं के हित में नजर आया। लेकिन नेशनल कॉलिजन फॉर मेन की सोच कुछ दूसरी है। लिहाजा उसे इन घटनाओं ने पुरूषों को चेताने की बजाय अलग ही मांग रखने का आधार मुहैया करा दिया। कॉलिजन का तर्क है कि जब महिलाओं के लिए अलग और रिजर्व कोच हो सकते हैं तो पुरूषों के लिए क्यों नहीं। लेकिन उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि पुरूषों की तरह क्या महिलाएं भी ट्रेनों और बसों में छेड़खानी करती पाई जाती हैं। सवाल तो यह भी है कि सुनसान सड़कों में देर रात अकेले गुजरते पुरूषों से क्या महिलाएं भी रेप करती हैं। सवाल तो यह भी है कि क्या महिलाएं भी पुरूषों को वक्त-बेवक्त छूने का सुख उठाने की ही कोशिश में रहती हैं। जाहिर है इन सभी सवालों का जवाब ना में ही है। अभी हाल ही में दिल्ली के एयरटेल हाफ मैराथन में शामिल होने के बाद बॉलीवुड अभिनेत्री गुल पनाग ने कहा था कि दिल्ली के पुरूष छूने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते। जाहिर है कि उस दिन दिल्ली वालों ने उनसे शारीरिक छेड़खानी का सुख उठाने का मौका नहीं गंवाया। कुछ साल पहले मुंबई की लोकल रेलों में भी महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में पुरूष चढ़ने से परहेज नहीं करते थे। सुनसान महिला डिब्बों में बलात्कार तक की घटनाएं भी हुईं। इसके बाद मुंबई पुलिस को सख्त रवैया अख्तियार करना पड़ा और महिला डिब्बों से पुरूष सवारियों को बाहर निकाला गया। अगर दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन ने भी मनचले पुरूषों पर काबू पाने के लिए ऐसा कोई कदम उठाया तो उसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। अपनी शारीरिक बनावट के चलते महिलाएं पुरूषों से उनके स्तर पर कम से कम शारीरिक तौर पर मुकाबला कर ही नहीं सकतीं। लिहाजा उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था करनी ही पड़ेगी। बहरहाल पुरूष अपनी वर्चस्ववादी मानसिकता से अब तक उबर नहीं पाए हैं। इसीलिए महिलाओं को दी जा रही महिलाजनित जरूरी सुविधाएं भी उनसे पच नहीं पा रही है। नेशनल कॉलिजन फॉर मेन की मांग बेवकूफी से ज्यादा कुछ नहीं है। एक दौर में पत्नी पीड़ित संघ ने जिस तरह सुर्खियां हासिल की थीं, इस संगठन की ओर लोगों का ध्यान कुछ उसी अंदाज में जा रहा है। ऐसे में इसका भी पत्नी पीड़ित संघ की तरह अगर हास्यास्पद हश्र होता है तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
जीत ने बदल दिए सुर
उमेश चतुर्वेदी
भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की जब भी चर्चा होती है, सहज ही एक पुरानी फिल्म का गीत – इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा- याद आ जाता है। समाजवादी आंदोलन और पार्टियों की यह नियति में एकजुटता और साथ चलने का स्थायी भाव नहीं रहा है। यही वजह है कि उनमें आपसी विरोधाभास और अलगाव कुछ ज्यादा ही दिखता रहा है। बिहार में प्रचंड बहुमत हासिल कर चुके जनता दल यूनाइटेड चूंकि एक दौर में समाजवादी आंदोलन का प्रमुख अगुआ दल रहा है। लिहाजा समाजवादी आंदोलन के रोग से यह दल भला कैसे अछूता रह सकता है। बिहार विधानसभा चुनाव में उतरने के ठीक पहले जिस तरह पार्टी के मुंगेर से सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन, कैमूर के सांसद महाबली सिंह और औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार ने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था तो समाजवादी विचारधारा की राजनीति की सीमाएं एक बार फिर याद आ गई थीं।
समाजवादी चिंतन में आपसी खींचतान का हश्र कम से कम हर अगले चुनाव में पराजय और टूटन के तौर पर दिखता रहा है। सुशील कुमार हों या ललन या फिर महाबली सिंह, उन्हें लगता रहा होगा कि अपने विद्रोही कदम के जरिए वे नीतीश कुमार को सबक सिखा सकते हैं। लेकिन इतिहास ने इस बार पलटी खाई है। यह पहला मौका है, जब समाजवादी विचारों के अनुयाइयों के आपसी विचलन से जनता विचलित नहीं हुई और उसने नीतीश कुमार को ही समर्थन देकर उनके एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली नीतियों की तसदीक कर दी है। हालांकि राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन को अपने विद्रोह पर इतना ज्यादा भरोसा था कि उन्होंने नैतिकता और संसदीय राजनीति के मूल्यों तक की परवाह नहीं की। जनता दल यू के सांसद रहते हुए उन्हें कांग्रेस के बिहार प्रभारी मुकुल वासनिक के साथ मिलकर नीतीश कुमार को हराने की जोड़-जुगत बिठाने से कोई गुरेज नहीं रहा। इतना ही नहीं, कई जगह कांग्रेस के प्रत्य़ाशी तय करने और उनके लिए खुलेआम प्रचार करने से भी वे पीछे नहीं हटे। राजनीति में ऐसे कदम तब उठाए जाते हैं, जब या तो राजनीतिक हाराकिरी करनी होती है या फिर कदम उठाने वाले को नतीजे अपनी तरफ रहने का पूरा अंदाजा होता है। ललन बिहार की राजनीति में कुछ वक्त पहले तक नीतीश कु्मार की दाहिनी बांह माने जाते रहे हैं। कुख्यात चारा घोटाले में लालू यादव को जेल भिजवाने के अभियान में भारतीय जनता पार्टी के झारखंड के नेता सरजू राय और बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी के साथ ललन का भी महत्वपूर्ण हाथ रहा है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में खुद के लिए कहीं ज्यादा समर्थन की उम्मीद बढ़ गई थी। कैमूर के सांसद महाबली सिंह पहले लालू यादव के साथ थे। लेकिन वहां उनकी दाल नहीं गली तो वे बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए थे। इसके बाद उन्हें जनता दल यू में अपना राजनीतिक कैरियर दिखा और पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू के टिकट पर जीत गए। कैमूर से जीत के बाद उनकी भी उम्मीदें बढ़ गईं। अपने क्षेत्र की चैनपुर विधानसभा सीट से अपने बेटे के लिए टिकट चाहते थे, लेकिन नीतीश ने नहीं दिया तो बेटे को आरजेडी से चुनाव मैदान में उतार दिया। लेकिन नीतीश लहर के सामने उनका बेटा नहीं टिक पाया। कुछ इसी तरह औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार अपने भाई के लिए टिकट चाहते थे। जेडीयू ने उनकी इच्छा पूरी नहीं कि तो उन्होंने भाई को आरजेडी के टिकट पर मैदान में उतार दिया। लेकिन वह भी खेत रहा। इसी तरह टिकटों के बंटवारे को लेकर कभी नीतीश कुमार के खास सहयोगी और दोस्त रहे उपेंद्र कुशवाहा भी नाराज हो गए। सभी नाराज नेताओं को यही लगता था कि उनकी नाराजगी नीतीश को जरूर गुल खिलाएगी। लेकिन बिहार की जनता ने जिस तरह पुराने मुहावरे को बदल दिया है, उससे सबक सिखाने की मंशा रखने वाले इन नेताओं के सुर बदल गए हैं। ललन सिंह ने तो बिना देर किए नीतीश को जीत की बधाई तक दे डाली। महाबली सिंह को अब समाजवादी नैतिकता याद आने लगी है और वे कहते फिर रहे हैं कि उनके बेटे की राजनीति से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। कुछ इसी अंदाज में सुशील कुमार भी जनता दल यू और नीतीश कुमार से अपनी निष्ठा जता रहे हैं। इन नेताओं की सोच में आए इस बदलाव के बाद अब एक और कहावत याद आने लगी है- जैसी बहे बयार, पीठ तैसी कीजै। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि हवा के झोंके की ओर पीठ करके चेहरे को बचाया तो जा सकता है, लेकिन क्या नीतीश कुमार नाम की हवा इन चेहरों को माफ करने के मूड में है। इसका जवाब नीतीश का वह बयान ही देता है, जो उन्होंने ललन सिंह की बधाई के बाद मीडिया के सवालों के जवाब में दिया था- ललन सिंह पर फैसला पार्टी आलाकमान लेगा।
भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की जब भी चर्चा होती है, सहज ही एक पुरानी फिल्म का गीत – इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा- याद आ जाता है। समाजवादी आंदोलन और पार्टियों की यह नियति में एकजुटता और साथ चलने का स्थायी भाव नहीं रहा है। यही वजह है कि उनमें आपसी विरोधाभास और अलगाव कुछ ज्यादा ही दिखता रहा है। बिहार में प्रचंड बहुमत हासिल कर चुके जनता दल यूनाइटेड चूंकि एक दौर में समाजवादी आंदोलन का प्रमुख अगुआ दल रहा है। लिहाजा समाजवादी आंदोलन के रोग से यह दल भला कैसे अछूता रह सकता है। बिहार विधानसभा चुनाव में उतरने के ठीक पहले जिस तरह पार्टी के मुंगेर से सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन, कैमूर के सांसद महाबली सिंह और औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार ने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था तो समाजवादी विचारधारा की राजनीति की सीमाएं एक बार फिर याद आ गई थीं।
समाजवादी चिंतन में आपसी खींचतान का हश्र कम से कम हर अगले चुनाव में पराजय और टूटन के तौर पर दिखता रहा है। सुशील कुमार हों या ललन या फिर महाबली सिंह, उन्हें लगता रहा होगा कि अपने विद्रोही कदम के जरिए वे नीतीश कुमार को सबक सिखा सकते हैं। लेकिन इतिहास ने इस बार पलटी खाई है। यह पहला मौका है, जब समाजवादी विचारों के अनुयाइयों के आपसी विचलन से जनता विचलित नहीं हुई और उसने नीतीश कुमार को ही समर्थन देकर उनके एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली नीतियों की तसदीक कर दी है। हालांकि राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन को अपने विद्रोह पर इतना ज्यादा भरोसा था कि उन्होंने नैतिकता और संसदीय राजनीति के मूल्यों तक की परवाह नहीं की। जनता दल यू के सांसद रहते हुए उन्हें कांग्रेस के बिहार प्रभारी मुकुल वासनिक के साथ मिलकर नीतीश कुमार को हराने की जोड़-जुगत बिठाने से कोई गुरेज नहीं रहा। इतना ही नहीं, कई जगह कांग्रेस के प्रत्य़ाशी तय करने और उनके लिए खुलेआम प्रचार करने से भी वे पीछे नहीं हटे। राजनीति में ऐसे कदम तब उठाए जाते हैं, जब या तो राजनीतिक हाराकिरी करनी होती है या फिर कदम उठाने वाले को नतीजे अपनी तरफ रहने का पूरा अंदाजा होता है। ललन बिहार की राजनीति में कुछ वक्त पहले तक नीतीश कु्मार की दाहिनी बांह माने जाते रहे हैं। कुख्यात चारा घोटाले में लालू यादव को जेल भिजवाने के अभियान में भारतीय जनता पार्टी के झारखंड के नेता सरजू राय और बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी के साथ ललन का भी महत्वपूर्ण हाथ रहा है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में खुद के लिए कहीं ज्यादा समर्थन की उम्मीद बढ़ गई थी। कैमूर के सांसद महाबली सिंह पहले लालू यादव के साथ थे। लेकिन वहां उनकी दाल नहीं गली तो वे बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए थे। इसके बाद उन्हें जनता दल यू में अपना राजनीतिक कैरियर दिखा और पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू के टिकट पर जीत गए। कैमूर से जीत के बाद उनकी भी उम्मीदें बढ़ गईं। अपने क्षेत्र की चैनपुर विधानसभा सीट से अपने बेटे के लिए टिकट चाहते थे, लेकिन नीतीश ने नहीं दिया तो बेटे को आरजेडी से चुनाव मैदान में उतार दिया। लेकिन नीतीश लहर के सामने उनका बेटा नहीं टिक पाया। कुछ इसी तरह औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार अपने भाई के लिए टिकट चाहते थे। जेडीयू ने उनकी इच्छा पूरी नहीं कि तो उन्होंने भाई को आरजेडी के टिकट पर मैदान में उतार दिया। लेकिन वह भी खेत रहा। इसी तरह टिकटों के बंटवारे को लेकर कभी नीतीश कुमार के खास सहयोगी और दोस्त रहे उपेंद्र कुशवाहा भी नाराज हो गए। सभी नाराज नेताओं को यही लगता था कि उनकी नाराजगी नीतीश को जरूर गुल खिलाएगी। लेकिन बिहार की जनता ने जिस तरह पुराने मुहावरे को बदल दिया है, उससे सबक सिखाने की मंशा रखने वाले इन नेताओं के सुर बदल गए हैं। ललन सिंह ने तो बिना देर किए नीतीश को जीत की बधाई तक दे डाली। महाबली सिंह को अब समाजवादी नैतिकता याद आने लगी है और वे कहते फिर रहे हैं कि उनके बेटे की राजनीति से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। कुछ इसी अंदाज में सुशील कुमार भी जनता दल यू और नीतीश कुमार से अपनी निष्ठा जता रहे हैं। इन नेताओं की सोच में आए इस बदलाव के बाद अब एक और कहावत याद आने लगी है- जैसी बहे बयार, पीठ तैसी कीजै। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि हवा के झोंके की ओर पीठ करके चेहरे को बचाया तो जा सकता है, लेकिन क्या नीतीश कुमार नाम की हवा इन चेहरों को माफ करने के मूड में है। इसका जवाब नीतीश का वह बयान ही देता है, जो उन्होंने ललन सिंह की बधाई के बाद मीडिया के सवालों के जवाब में दिया था- ललन सिंह पर फैसला पार्टी आलाकमान लेगा।
Saturday, November 27, 2010
खेल संस्कृति की ओर बढ़ते कदम
उमेश चतुर्वेदी
क्रिकेट सितारों को भगवान की तरह पूजने वाले देश में आमतौर पर दूसरे खेलों के खिलाड़ियों को अपनी पहचान का भी संकट सताता रहा है। लेकिन ग्वांगझू एशियाड में बढ़ती पदकों की संख्या से साफ है कि देश की खेल संस्कृति बदल रही है। ग्वांगझू एशियाड में निश्चित तौर पर चीन अजेय होकर उभरा है। लेकिन भारतीय खिलाड़ियों और पदक तालिका में लगातार बढ़ती उनकी पहुंच से साफ है कि भारतीय खिलाड़ियों का रवैया बदल रहा है। दस स्वर्ण पदकों के साथ ग्वांगझू की पदक तालिका में अब तक भारत 53 पदक जीत चुका है और मुक्केबाजी में तीन के साथ ही पुरूष कबड्डी और महिला कबड्डी में एक-एक पदक मिलना तय हो गया है। क्योंकि ये सभी पांच खिलाड़ी अपनी प्रतियोगिताओं के फाइनल में पहुंच चुके हैं। जाहिर है कि अब तक के प्रदर्शन के मुताबिक भारत को 58 पदक मिलने ही हैं। इस तरह एशियाड में भारत का यह अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन है। इसके पहले दोहा एशियाड में भारत ने दस स्वर्ण, 17 रजत समेत 53 पदक जीता था। एशियाड में भारत ने सबसे ज्यादा पदक 1982 के दिल्ली एशियाड में जीता था। उस वक्त भारत ने अपनी झोली में 13 स्वर्ण, 19 रजत और 25 कांस्य समेत 57 पदक डाले थे। इस हिसाब से देखें से ग्वांगझू एशियाड में यह भी रिकॉर्ड टूटने जा रहा है, क्योंकि 58 पदक जीतना तय हो गया है। हालांकि यह रिकॉर्ड भारतीय ओलंपिक संघ के दावे और अपेक्षाओं के मुताबिक नहीं है। 629 सदस्यीय दल ग्वांगझू भेजते वक्त भारतीय ओलंपिक संघ ने 80 से 85 पदक जीतने का दावा किया था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
क्रिकेट के वर्चस्व वाले इस देश में अगर दूसरे खेलों को लेकर सोच सकारात्मक बनी है और एशियाड खेलों में अपने प्रदर्शन से देश का नाम रोशन कर रहे हैं तो इसकी वजह देश के खेल मानस में आ रहा बदलाव है। निश्चित तौर पर इसमें बीजिंग ओलंपिक में सुनहरा प्रदर्शन कर चुके अभिनव बिंद्रा या पदक तालिका में स्थान बना चुके सुशील कुमार, विजेद्र कुमार जैसे लोगों का भी योगदान है। जिन्हें भारत वापसी के बाद लोगों का प्यार मिला। केंद्र और राज्य सरकारों ने उन पर इनामों की बरसात कर दी। कभी हवाई अड्डों पर ढोल-नगाड़ों से स्वागत का मौका विदेशी धरती से जीत के बाद वापसी करते क्रिकेटरों को ही मिलता था। लेकिन अब दूसरे खिलाड़ियों के लिए भारतीय प्रशंसकों का रवैया बदल रहा है। जबकि पहचान के संकट से दूसरे खेलों के खिलाड़ी जूझते रहते थे। महिला मुक्केबाजी में अब तो एमसी मैरीकॉम को सभी लोग जान गए हैं। दुर्भाग्यवश उन्हें ग्वांगझू एशियाड में रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा है। लेकिन पांच साल पहले उन्हीं मैरीकॉम ने एक टेलीविजन चैनल के संवाददाता से उल्टे पूछ लिया था कि एमसी मैरीकॉम को जानते हैं आप। मैरीकॉम ने यह सवाल पूछ कर एक तरह से अपनी व्यथा ही जाहिर की थी। लेकिन अब अभिनव बिंद्रा, गगन नारंग, एमसी मैरीकॉम, बिजेंद्र, सुशील किसी परिचय के मोहताज नहीं है। यह बदलाव एक दिन में नहीं आया है। इन खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत के बूते अपनी और अपने खेलों की पहचान बनाई है। जिसका असर यह पड़ा है कि अब कारपोरेट सेक्टर का हाथ दूसरे खेलों के खिलाड़ियों की मदद आगे बढ़ने लगा है।
अक्टूबर में हुए कॉमनवेल्थ खेलों की उसके आयोजन में हुए भ्रष्टाचार के लिए काफी आलोचना हुई है। इस भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार तीन अधिकारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को कांग्रेस के सचिव पद से हटा दिया गया है। इतनी लानत-मलामत के बावजूद कॉमनवेल्थ खेल आयोजनों ने भी भारत में खेल संस्कृति को बढ़ाने में मदद दी है। कॉमनवेल्थ खेलों में भी भारत का प्रदर्श बेहतर रहा। दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों के पहले भारत ने 2002 के मैनचेस्टर में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया था। तब उसे 70 पदक मिले थे। लेकिन दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों में 38 स्वर्ण सहित 101 पदक जीतकर खिलाड़ियों ने भारतीय खेल प्रेमियों को निराश नहीं किया। विवादों और आलोचनाओं के साथ ही दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों को अगर याद किया जाएगा तो उसकी एक बड़ी वजह भारत का बेहतरीन प्रदर्शन भी होगा। देश की खेल संस्कृति को बढ़ावा देने में भारत सरकार की खेलनीति का भी कम असर नहीं है। यह खेल नीति ही है कि खेलों को लेकर बजट बढ़ाया गया। हालांकि मौजूदा वित्त वर्ष में खेल मद में 3565 करोड़ ही आवंटित किया गया। जबकि इसके ठीक पहले साल 3706 करोड़ दिए गए थे।
आखिर में : बढ़ती खेल संस्कृति के बावजूद देश के सामने अब भी सबसे बड़ी चुनौती है लालफीताशाही और भाईभतीजावाद। ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को उभारने के लिए अब तक कोई मुकम्मल नीति भी नहीं है। ऐसे में बिना किसी ठोस नीति और कार्यक्रम के चीन जैसी अजेय बढ़त हासिल करना कैसे संभव होगा।
क्रिकेट सितारों को भगवान की तरह पूजने वाले देश में आमतौर पर दूसरे खेलों के खिलाड़ियों को अपनी पहचान का भी संकट सताता रहा है। लेकिन ग्वांगझू एशियाड में बढ़ती पदकों की संख्या से साफ है कि देश की खेल संस्कृति बदल रही है। ग्वांगझू एशियाड में निश्चित तौर पर चीन अजेय होकर उभरा है। लेकिन भारतीय खिलाड़ियों और पदक तालिका में लगातार बढ़ती उनकी पहुंच से साफ है कि भारतीय खिलाड़ियों का रवैया बदल रहा है। दस स्वर्ण पदकों के साथ ग्वांगझू की पदक तालिका में अब तक भारत 53 पदक जीत चुका है और मुक्केबाजी में तीन के साथ ही पुरूष कबड्डी और महिला कबड्डी में एक-एक पदक मिलना तय हो गया है। क्योंकि ये सभी पांच खिलाड़ी अपनी प्रतियोगिताओं के फाइनल में पहुंच चुके हैं। जाहिर है कि अब तक के प्रदर्शन के मुताबिक भारत को 58 पदक मिलने ही हैं। इस तरह एशियाड में भारत का यह अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन है। इसके पहले दोहा एशियाड में भारत ने दस स्वर्ण, 17 रजत समेत 53 पदक जीता था। एशियाड में भारत ने सबसे ज्यादा पदक 1982 के दिल्ली एशियाड में जीता था। उस वक्त भारत ने अपनी झोली में 13 स्वर्ण, 19 रजत और 25 कांस्य समेत 57 पदक डाले थे। इस हिसाब से देखें से ग्वांगझू एशियाड में यह भी रिकॉर्ड टूटने जा रहा है, क्योंकि 58 पदक जीतना तय हो गया है। हालांकि यह रिकॉर्ड भारतीय ओलंपिक संघ के दावे और अपेक्षाओं के मुताबिक नहीं है। 629 सदस्यीय दल ग्वांगझू भेजते वक्त भारतीय ओलंपिक संघ ने 80 से 85 पदक जीतने का दावा किया था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
क्रिकेट के वर्चस्व वाले इस देश में अगर दूसरे खेलों को लेकर सोच सकारात्मक बनी है और एशियाड खेलों में अपने प्रदर्शन से देश का नाम रोशन कर रहे हैं तो इसकी वजह देश के खेल मानस में आ रहा बदलाव है। निश्चित तौर पर इसमें बीजिंग ओलंपिक में सुनहरा प्रदर्शन कर चुके अभिनव बिंद्रा या पदक तालिका में स्थान बना चुके सुशील कुमार, विजेद्र कुमार जैसे लोगों का भी योगदान है। जिन्हें भारत वापसी के बाद लोगों का प्यार मिला। केंद्र और राज्य सरकारों ने उन पर इनामों की बरसात कर दी। कभी हवाई अड्डों पर ढोल-नगाड़ों से स्वागत का मौका विदेशी धरती से जीत के बाद वापसी करते क्रिकेटरों को ही मिलता था। लेकिन अब दूसरे खिलाड़ियों के लिए भारतीय प्रशंसकों का रवैया बदल रहा है। जबकि पहचान के संकट से दूसरे खेलों के खिलाड़ी जूझते रहते थे। महिला मुक्केबाजी में अब तो एमसी मैरीकॉम को सभी लोग जान गए हैं। दुर्भाग्यवश उन्हें ग्वांगझू एशियाड में रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा है। लेकिन पांच साल पहले उन्हीं मैरीकॉम ने एक टेलीविजन चैनल के संवाददाता से उल्टे पूछ लिया था कि एमसी मैरीकॉम को जानते हैं आप। मैरीकॉम ने यह सवाल पूछ कर एक तरह से अपनी व्यथा ही जाहिर की थी। लेकिन अब अभिनव बिंद्रा, गगन नारंग, एमसी मैरीकॉम, बिजेंद्र, सुशील किसी परिचय के मोहताज नहीं है। यह बदलाव एक दिन में नहीं आया है। इन खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत के बूते अपनी और अपने खेलों की पहचान बनाई है। जिसका असर यह पड़ा है कि अब कारपोरेट सेक्टर का हाथ दूसरे खेलों के खिलाड़ियों की मदद आगे बढ़ने लगा है।
अक्टूबर में हुए कॉमनवेल्थ खेलों की उसके आयोजन में हुए भ्रष्टाचार के लिए काफी आलोचना हुई है। इस भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार तीन अधिकारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को कांग्रेस के सचिव पद से हटा दिया गया है। इतनी लानत-मलामत के बावजूद कॉमनवेल्थ खेल आयोजनों ने भी भारत में खेल संस्कृति को बढ़ाने में मदद दी है। कॉमनवेल्थ खेलों में भी भारत का प्रदर्श बेहतर रहा। दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों के पहले भारत ने 2002 के मैनचेस्टर में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया था। तब उसे 70 पदक मिले थे। लेकिन दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों में 38 स्वर्ण सहित 101 पदक जीतकर खिलाड़ियों ने भारतीय खेल प्रेमियों को निराश नहीं किया। विवादों और आलोचनाओं के साथ ही दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों को अगर याद किया जाएगा तो उसकी एक बड़ी वजह भारत का बेहतरीन प्रदर्शन भी होगा। देश की खेल संस्कृति को बढ़ावा देने में भारत सरकार की खेलनीति का भी कम असर नहीं है। यह खेल नीति ही है कि खेलों को लेकर बजट बढ़ाया गया। हालांकि मौजूदा वित्त वर्ष में खेल मद में 3565 करोड़ ही आवंटित किया गया। जबकि इसके ठीक पहले साल 3706 करोड़ दिए गए थे।
आखिर में : बढ़ती खेल संस्कृति के बावजूद देश के सामने अब भी सबसे बड़ी चुनौती है लालफीताशाही और भाईभतीजावाद। ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को उभारने के लिए अब तक कोई मुकम्मल नीति भी नहीं है। ऐसे में बिना किसी ठोस नीति और कार्यक्रम के चीन जैसी अजेय बढ़त हासिल करना कैसे संभव होगा।
बिहार के आंकड़े भी कुछ कहते हैं
उमेश चतुर्वेदी
भारतीय राजनीति में एक बड़ी बिडंबना देखने को मिलती है। हर कामयाब राजनेता अपनी गलतियों से सीखने के बावजूद अपने पिछले प्रदर्शन को ही अपनी उपलब्धि मान बैठता है। लगातार साथ चलने वाले कथित सलाहकार और चंपू उसके स्पष्ट नजरिए को धुंधला बनाने में कुछ ज्यादा ही योगदान करते हैं। इसका खामियाजा उसे और बड़ी कीमत देकर चुकाना पड़ता है। बिहार के मौजूदा चुनाव के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो कई और दिलचस्प निष्कर्ष भी सामने आते हैं। मौजूदा विधानसभा अभियान में एक तथ्य साफ नजर आ रहा था – नीतीश लहर का उभार। लालू प्रसाद यादव को विपक्षी नेता होने के नाते इसे नकारना ही था। लेकिन उनकी यह नकार जमीनी हकीकतों से दूर थी। दरअसल पिछले यानी 2005 के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्हें 31.1 प्रतिशत वोट मिला था। तब रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी के साथ उनका गठबंधन नहीं था। तब पासवान की पार्टी अकेले चुनाव मैदान में थी। उस वक्त उसे 13.2 प्रतिशत वोट मिला था। जबकि जनता दल-यू और बीजेपी गठबंधन 36.2 प्रतिशत वोटों के साथ कामयाब हुआ था। लालू यादव और रामविलास पासवान को उम्मीद थी कि उनके साथ आने से उनका कुल मिलाकर वोट प्रतिशत 34.3 प्रतिशत हो जाएगा। जो बीजेपी-जेडी-यू गठबंधन के पिछले वोटों की तुलना में महज 2.8 फीसदी ही कम रहेगा। उन्हें यह भी उम्मीद रही होगी कि बटाईदारी कानून के लागू किए जाने की चर्चा से भूमिहार और ठाकुर वोटरों की नाराजगी का उन्हें फायदा मिलेगा। जिससे उनके गठबंधन के साथ कम से कम इन सवर्ण जातियों का समर्थन भी हासिल हो जाएगा। लेकिन लालू यादव यहीं पर एक चूक कर गए। उन्होंने बहुमत मिलने की हालत में खुद के मुख्यमंत्री बनाए जाने का ऐलान कर दिया। लालू यादव ऐसा करते वक्त भूल गए कि उनके पंद्रह साल के राज में उनसे अगर कोई सबसे ज्यादा नाराज रहा है तो वे सवर्ण मतदाता ही रहे हैं। उनका यह आकलन गलत रहा, क्योंकि तमाम बदलावों के बावजूद कम से कम सवर्ण मतदाता अभी-भी लालू को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। फिर भारतीय राजनीति में यह देखा गया है कि अनुसूचित जातियों का वोट बैंक वाली पार्टियों के साथ जब भी किसी दूसरी किसी पार्टी का गठबंधन होता है तो यह वोट बैंक दूसरी पार्टी के साथ चला जाता है, लेकिन दूसरी पार्टी के वोटर अनुसूचित जातियों के साथ कम ही आते हैं। यानी रामविलास पासवान के वोटरों ने आरजेडी उम्मीदवारों के लिए वोटिंग में झिझक नहीं दिखाई, लेकिन आरजेडी के समर्थकों के लिए पासवान के उम्मीदवारों को वोट देना रास नहीं आया। नीतीश कुमार के पक्ष में सिर्फ उनका सुशासन ही नहीं रहा। बल्कि समाज के दूसरे वर्गों को भी सत्ता में मिली भागीदारी ने उनकी साख और समर्थन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चुनाव नतीजों के विश्लेषण में कुछ तथ्यों की ओर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है। यह सच है कि करीब ढाई दशक बाद 2006 में बिहार में पंचायत चुनाव हुए। जिसमें महिलाओं को पचास प्रतिशत का आरक्षण दिया गया। महिलाओं को विकास और फैसले लेने की प्रक्रिया में पहली बार भागीदारी मिली। कानून-व्यवस्था की हालत सुधरने के बाद उनमें आत्मविश्वास भी जगा। दलितों में महादलित जातियों को घर बनाने की सुविधाएं और जमीन देकर नीतीश कुमार ने नया वोट बैंक भी बनाया। चूहा खाने के लिए अभिशप्त मुसहर जैसी जातियों को पहली बार घर की छत नसीब हुई। देश में पहली ग्राम कचहरी योजना की शुरूआत भी नीतीश कुमार ने ही की। इसका दोहरा फायदा हुआ। छोटे-मोटे झगड़ों के लिए गांव वालों को थाना-कचहरी के चक्कर काटने से मुक्ति मिली और न्यायमित्र के तौर पर हजारों लोगों को रोजगार भी मिला। गांवों के स्कूलों में शिक्षा मित्र के साथ ही हजारों शिक्षकों की नियुक्ति ने भी नीतीश कुमार के लिए नया वोट बैंक बनाने में मदद दी।
मौजूदा चुनाव में फिर भी दूसरी पार्टियों को 26.8 फीसद वोट मिले हैं, जिनमें सीपीआई, सीपीएम, बीएसपी समेत कई पार्टियां शामिल हैं। कांग्रेस भी 8.4 प्रतिशत वोट पाने में कामयाब रही है। यानी नीतीश के खिलाफ 52.8 फीसदी वोटिंग हुई है। इससे साफ है कि अगर पहले की तरह लालू यादव ने कांग्रेस का भी साथ लिया होता और अपनी पुरानी सहयोगी वामपंथी पार्टियों के साथ तालमेल किया होता तो उनके लिए तसवीर इतनी बुरी नहीं होती। सबसे बड़ी बात यह है कि 1990 के बाद यह पहला मौका होगा, जब लालू यादव या उनके परिवार के लिए अहम संवैधानिक स्थिति नहीं होगी। 1990 से 2005 तक उनके या उनके परिवार के पास मुख्यमंत्री या नेता विपक्ष की कुर्सी रही है। लेकिन चुनावी नतीजों ने इस बार उनसे यह अधिकार भी छीन लिया है। कायदे से नेता विपक्ष होने के लिए कुछ विधानसभा सीटों की दस फीसदी सदस्य होने चाहिए। इस हिसाब से बिहार में नेता विपक्ष की संवैधानिक कुर्सी हासिल करने के लिए आरजेडी के पास 25 विधायक होने चाहिए थे। लेकिन इस बार उनके पास महज 22 विधायक ही जीत कर आए हैं।
आखिर में : आंकड़ों की नजर में बिहार चुनाव ने कुछ नई इबारतें भी लिखी हैं। दुनिया में किसी गठबंधन की यह सबसे बड़ी जीत है। बिहार में इसके पहले 1995 में लालू यादव की अगुआई में आरजेडी ने 320 सीटों में 182 सीट जीत हासिल की थी।
भारतीय राजनीति में एक बड़ी बिडंबना देखने को मिलती है। हर कामयाब राजनेता अपनी गलतियों से सीखने के बावजूद अपने पिछले प्रदर्शन को ही अपनी उपलब्धि मान बैठता है। लगातार साथ चलने वाले कथित सलाहकार और चंपू उसके स्पष्ट नजरिए को धुंधला बनाने में कुछ ज्यादा ही योगदान करते हैं। इसका खामियाजा उसे और बड़ी कीमत देकर चुकाना पड़ता है। बिहार के मौजूदा चुनाव के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो कई और दिलचस्प निष्कर्ष भी सामने आते हैं। मौजूदा विधानसभा अभियान में एक तथ्य साफ नजर आ रहा था – नीतीश लहर का उभार। लालू प्रसाद यादव को विपक्षी नेता होने के नाते इसे नकारना ही था। लेकिन उनकी यह नकार जमीनी हकीकतों से दूर थी। दरअसल पिछले यानी 2005 के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्हें 31.1 प्रतिशत वोट मिला था। तब रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी के साथ उनका गठबंधन नहीं था। तब पासवान की पार्टी अकेले चुनाव मैदान में थी। उस वक्त उसे 13.2 प्रतिशत वोट मिला था। जबकि जनता दल-यू और बीजेपी गठबंधन 36.2 प्रतिशत वोटों के साथ कामयाब हुआ था। लालू यादव और रामविलास पासवान को उम्मीद थी कि उनके साथ आने से उनका कुल मिलाकर वोट प्रतिशत 34.3 प्रतिशत हो जाएगा। जो बीजेपी-जेडी-यू गठबंधन के पिछले वोटों की तुलना में महज 2.8 फीसदी ही कम रहेगा। उन्हें यह भी उम्मीद रही होगी कि बटाईदारी कानून के लागू किए जाने की चर्चा से भूमिहार और ठाकुर वोटरों की नाराजगी का उन्हें फायदा मिलेगा। जिससे उनके गठबंधन के साथ कम से कम इन सवर्ण जातियों का समर्थन भी हासिल हो जाएगा। लेकिन लालू यादव यहीं पर एक चूक कर गए। उन्होंने बहुमत मिलने की हालत में खुद के मुख्यमंत्री बनाए जाने का ऐलान कर दिया। लालू यादव ऐसा करते वक्त भूल गए कि उनके पंद्रह साल के राज में उनसे अगर कोई सबसे ज्यादा नाराज रहा है तो वे सवर्ण मतदाता ही रहे हैं। उनका यह आकलन गलत रहा, क्योंकि तमाम बदलावों के बावजूद कम से कम सवर्ण मतदाता अभी-भी लालू को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। फिर भारतीय राजनीति में यह देखा गया है कि अनुसूचित जातियों का वोट बैंक वाली पार्टियों के साथ जब भी किसी दूसरी किसी पार्टी का गठबंधन होता है तो यह वोट बैंक दूसरी पार्टी के साथ चला जाता है, लेकिन दूसरी पार्टी के वोटर अनुसूचित जातियों के साथ कम ही आते हैं। यानी रामविलास पासवान के वोटरों ने आरजेडी उम्मीदवारों के लिए वोटिंग में झिझक नहीं दिखाई, लेकिन आरजेडी के समर्थकों के लिए पासवान के उम्मीदवारों को वोट देना रास नहीं आया। नीतीश कुमार के पक्ष में सिर्फ उनका सुशासन ही नहीं रहा। बल्कि समाज के दूसरे वर्गों को भी सत्ता में मिली भागीदारी ने उनकी साख और समर्थन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चुनाव नतीजों के विश्लेषण में कुछ तथ्यों की ओर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है। यह सच है कि करीब ढाई दशक बाद 2006 में बिहार में पंचायत चुनाव हुए। जिसमें महिलाओं को पचास प्रतिशत का आरक्षण दिया गया। महिलाओं को विकास और फैसले लेने की प्रक्रिया में पहली बार भागीदारी मिली। कानून-व्यवस्था की हालत सुधरने के बाद उनमें आत्मविश्वास भी जगा। दलितों में महादलित जातियों को घर बनाने की सुविधाएं और जमीन देकर नीतीश कुमार ने नया वोट बैंक भी बनाया। चूहा खाने के लिए अभिशप्त मुसहर जैसी जातियों को पहली बार घर की छत नसीब हुई। देश में पहली ग्राम कचहरी योजना की शुरूआत भी नीतीश कुमार ने ही की। इसका दोहरा फायदा हुआ। छोटे-मोटे झगड़ों के लिए गांव वालों को थाना-कचहरी के चक्कर काटने से मुक्ति मिली और न्यायमित्र के तौर पर हजारों लोगों को रोजगार भी मिला। गांवों के स्कूलों में शिक्षा मित्र के साथ ही हजारों शिक्षकों की नियुक्ति ने भी नीतीश कुमार के लिए नया वोट बैंक बनाने में मदद दी।
मौजूदा चुनाव में फिर भी दूसरी पार्टियों को 26.8 फीसद वोट मिले हैं, जिनमें सीपीआई, सीपीएम, बीएसपी समेत कई पार्टियां शामिल हैं। कांग्रेस भी 8.4 प्रतिशत वोट पाने में कामयाब रही है। यानी नीतीश के खिलाफ 52.8 फीसदी वोटिंग हुई है। इससे साफ है कि अगर पहले की तरह लालू यादव ने कांग्रेस का भी साथ लिया होता और अपनी पुरानी सहयोगी वामपंथी पार्टियों के साथ तालमेल किया होता तो उनके लिए तसवीर इतनी बुरी नहीं होती। सबसे बड़ी बात यह है कि 1990 के बाद यह पहला मौका होगा, जब लालू यादव या उनके परिवार के लिए अहम संवैधानिक स्थिति नहीं होगी। 1990 से 2005 तक उनके या उनके परिवार के पास मुख्यमंत्री या नेता विपक्ष की कुर्सी रही है। लेकिन चुनावी नतीजों ने इस बार उनसे यह अधिकार भी छीन लिया है। कायदे से नेता विपक्ष होने के लिए कुछ विधानसभा सीटों की दस फीसदी सदस्य होने चाहिए। इस हिसाब से बिहार में नेता विपक्ष की संवैधानिक कुर्सी हासिल करने के लिए आरजेडी के पास 25 विधायक होने चाहिए थे। लेकिन इस बार उनके पास महज 22 विधायक ही जीत कर आए हैं।
आखिर में : आंकड़ों की नजर में बिहार चुनाव ने कुछ नई इबारतें भी लिखी हैं। दुनिया में किसी गठबंधन की यह सबसे बड़ी जीत है। बिहार में इसके पहले 1995 में लालू यादव की अगुआई में आरजेडी ने 320 सीटों में 182 सीट जीत हासिल की थी।
Saturday, October 2, 2010
Thursday, September 16, 2010
राजनीतिक दलों में सचमुच कब आएगा आंतरिक लोकतंत्र
उमेश चतुर्वेदी
सोनिया गांधी चौथी बार कांग्रेस आई की अध्यक्ष चुन ली गई हैं। कहने को तो जनप्रतिनिधित्व कानूनों के मुताबिक पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत उन्हें अध्यक्ष चुना गया है। वैसे तो उनका चुनाव महज औपचारिकता ही था। लिहाजा पार्टी में जश्न का माहौल है। उन्हें बधाईयां देने-दिलाने का दौर तेज है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा करते नहीं थकते। लेकिन पश्चिमी लोकतांत्रिक समाजों की तरह यहां बड़ी पार्टियों के अध्यक्षों के चुनावों के बाद बधाईयों या समालोचनाओं की परंपरा भी नहीं है। लोकतांत्रिक समाज की पहली ही शर्त वैचारिकता और कार्यक्रम आधारित विरोध होता है। लेकिन हमारे राजनीतिक दलों की आपसी दुश्मनी इससे भी कहीं आगे की है। उनके बीच अश्पृश्यता की हद तक विरोधी होने की परंपरा है। उपर से देखने पर यही कारण नजर आता है कि जब किसी दल विशेष का नया नेता चुना जाता है तो उसे बधाई देने या उसकी समालोचना नहीं की जाती। हमारी राजनीतिक संस्कृति इसे सामने वाले दलों का आंतरिक मामला मानकर उस पर टिप्पणियां करने से बचती है। लेकिन क्या देश का शासन संभाल रही महत्वपूर्ण पार्टियों का आंतरिक चुनाव मामूली घरेलू मसला जैसा ही है। जिन अध्यक्षों और कार्यकारिणी के फैसलों पर देश के करोड़ों लोगों के भाग्य का फैसला निर्भर करता हो क्या वह सचमुच मामूली घरेलू मामला हो सकता है, अगर भारतीय राजनीति और उसके पुरोधा ऐसा मानते हैं तो उसका भगवान ही मालिक है। हालांकि बात इतनी सी नहीं है। दरअसल आज हमारे यहां जो राजनीतिक संस्कृति विकसित हो चुकी है, उसमें आम कार्यकर्ता का अपनी योग्यता और नेतृत्व क्षमता के दम पर अपनी पार्टी के सर्वोच्च पद पर पहुंचना संभव ही नहीं रहा। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस हो या फिर देश का प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी, उनके यहां कार्यकर्ताओं की भूमिका महज दरी बिछाने और पानी पिलाने तक ही सीमित हो गई है। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी परिवार आधारित पार्टियों की तो बात ही छोड़ देनी चाहिए, जो पारिवारिक लिमिटेड कंपनियों की तरह चलती हैं। यही वजह है कि जब सोनिया गांधी अध्यक्ष बनती हैं तो भारतीय जनता पार्टी प्रतिक्रिया देने से बचती है और जब नितिन गडकरी सारे वरिष्ठों को दरकिनार करके अध्यक्ष पद की कुर्सी पर काबिज किए जाते हैं तो कांग्रेस को यह घटना प्रतिक्रिया के लायक नहीं लगती।
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का पूरा विकास चूंकि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के साथ हुआ है, इसलिए उससे लोकतांत्रिक परंपराओं की उम्मीद कुछ ज्यादा ही की जाती है। आजादी का सपना और आजादी के बाद के लोकतांत्रिक समाज के निर्माण की रूप रेखा कांग्रेस की अगुआई में ही देश ने देखा था। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि आजादी के बाद उसी कांग्रेस में चुने हुए पहले अध्यक्ष सीताराम केसरी थे। जिन्हें पहले तो कांग्रेस ने मजबूरी में कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया और बाद में बाकायदा वे अध्यक्ष चुने गए। कांग्रेस के शुभचिंतकों की नजर में केसरी ने हो सकता है कांग्रेस का खास भला न किया हो, देवेगौड़ा के मुताबिक वे प्रधानमंत्री बनने की हड़बड़ी में भी थे। सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष बनते ही उनके मन में ऐसी अभीप्सा जागना संभव भी था। लेकिन उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वे चुने हुए अध्यक्ष थे। लेकिन 1998 में कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन में उस अर्जुन सिंह की पहल पर उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, जो खुद पीवी नरसिंह राव के चलते कांग्रेस से बाहर हो चुके थे और उन्हें केसरी ने ही कांग्रेस में प्रवेश कराया था। रामशरण जोशी की किताब 'अर्जुन सिंह : एक सहयात्री इतिहास का' में अर्जुन सिंह की इन कोशिशों का विस्तार से वर्णन किया गया है। सोनिया गांधी तब से कांग्रेस से अध्यक्ष हैं। हां उनके पहले औपचारिक चुनाव में उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद और दूसरे चुनाव में राजेश पायलट ने जरूर ताल ठोंका था। लेकिन वे खेत रहे थे।
भारतीय राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद का आरोप लगाने वाले बहुत हैं। लेकिन सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यह सवाल गौड़ हो जाता है। हां, रस्मी तौर पर रविशंकर प्रसाद ने इस चुनाव पर सवाल जरूर उठाया। कांग्रेस से भीतर इस पर सवाल उठने की गुंजाइश तो आज की राजनीतिक संस्कृति ने छोड़ी ही नहीं है। राजनीतिक कार्यकर्ता तो सिर्फ कृतकृत्य भयऊं गोसाईं की तर्ज पर ताली बजाने और आनंदित होने में ही गर्व का अनुभव करता है। लेकिन इससे यह सवाल गौड़ नहीं हो जाता कि कांग्रेस को अपना अध्यक्ष गांधी-नेहरू परिवार से बाहर क्यों नहीं मिलता। क्यों नहीं उसे अब कोई पुरूषोत्तम दास टंडन, पट्टाभि सीतारमैया, के कामराज जैसा आम कार्यकर्ता अध्यक्ष बनने और पार्टी की कमान संभालने योग्य नहीं लगता।
दरअसल आज गांधी और नेहरू परिवार कांग्रेस की ताकत और कमजोरी दोनों ही बन गया है। हाल के वर्षों में जब-जब कांग्रेस की कमान गांधी-नेहरू परिवार से बाहर गई है, कांग्रेस में बिखराव आया है। वह कमजोर भी हुई है। इसका फायदा गांधी-नेहरू परिवार के उत्तराधिकारियों को भी अपना राजनीतिक रसूख बनाने में मिलता है। राहुल गांधी जगह-जगह कहते फिरते हैं कि उनके नाम के आगे गांधी लगे होने के चलते उन्हें काफी फायदा मिला है। अपनी जनता का लगाव देखिए कि उसे भी गांधी-नेहरू परिवार ही ज्यादा अच्छा लगता है। लिहाजा जब कांग्रेस की कमान इस परिवार के हाथ में रहती है तो वह उस कांग्रेस के हाथ का साथ देने के लिए अपनी उंगलियों से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की ओर बढ़ा देती है, लेकिन जैसे ही कांग्रेस की अगुआई इस परिवार से बाहर जाती है, जनता की उंगलियां भी जैसे कांग्रेस के हाथ से दूर जाने लगती है। उसे देश के तारनहार के तौर पर सिर्फ गांधी-नेहरू परिवार ही नजर आता है। सोनिया गांधी को इसका श्रेय जरूर जाता है कि उन्होंने शिथिल हो चुकी कांग्रेस की रगों में नई जान फूंकी और उसे दोबारा सत्ता की सीढ़ी तक पहुंचाया।
आज की राजनीति का सबसे बड़ा साध्य सत्ता हो गई है। राजनीतिक ताकत का आकलन सत्ता तक पहुंच से ही लगाया जाता है। यही वजह है कि आज नैतिक ताकत की सत्ता कमजोर हुई है। फिर सत्ता तक आम कार्यकर्ता की पहुंच भी लगातार कम हुई है। लिहाजा आम लोगों के लिए असल में सोचने वाली ताकतों की सत्ता तक पहुंच लगातार कम हुई है। इसका असर है कि आज आम आदमी हाशिए पर है। मजे की बात यह है कि हाशिए के लोगों की जब भी आवाज उठाई जाती है, उसका मकसद दूरंदेशी राजनीतिक विकास नहीं होता, बल्कि फौरी राजनीतिक फायदा उठाना होता है। सोनिया गांधी का अध्यक्ष बनना कांग्रेस के लिए फौरी फायदे का सौदा भले ही हो, लेकिन यह तय है कि यह उसी राजनीतिक संस्कृति को ही पुष्ट कर रहा है, जिसमें आम आदमी की भारतीय गणतंत्र में असल भागीदारी कम होती जाएगी। कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी आजकल कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र बहाली की कोशिशों में जुटे हैं। कांग्रेस में यह लोकतंत्र बहाली तभी सफल मानी जाएगी, जब पार्टी के शीर्ष पद पर कोई आम कार्यकर्ता अपनी राजनीतिक क्षमता के दम पर पहुंच पाएगा। निश्चित तौर पर यह दूसरे दलों के लिए नजीर साबित होगा।
Sunday, August 1, 2010
साहित्यिकों से दो बातें
उमेश चतुर्वेदी
(रूसी विचारक प्रिंस क्रोपाटकिन से क्षमा सहित, जिनकी एक किताब का शीर्षक ही है –नवयुवकों से दो बातें )
महान कथाकार प्रेमचंद की कल जयंती बीत गई। मेरे जेहन में उनका जयशंकर प्रसाद के साथ खिंचवाई एक तसवीर ताजा हो गई है। इस तसवीर में कामायनी के रचयिता महाकवि प्रसाद धीर-गंभीर मुद्रा में खड़े हैं। लेकिन उनके साथ खड़े उपन्यास सम्राट की भंगिमा बिलकुल अलग है। उपन्यास सम्राट के फटे जूते से पैरों की अनामिका उंगली किंचित झांकती सी नजर आ रही है। प्रसाद जी की गंभीरता से ठीक उलट प्रेमचंद के स्मित होठ इससे बेपरवाह नजर आ रहे हैं। इस तसवीर के याद आने की अपनी वजह भी है। प्रेमचंद की यह भावमुद्रा दरअसल उनकी मनोदशा का प्रतीक भी है। प्रेमचंद आज भी नए-पुराने लेखकों से कहीं ज्यादा लोकप्रिय हैं। हिंदीभाषी इलाके में अगर लोकप्रियता के मामले में उनसे तुलसीदास ही भारी पड़ सकते हैं। उनकी भी जयंती आने ही वाली है। दोनों की भावभूमि भले ही अलग हो, लेकिन दोनों कम से कम एक मामले में समान हैं। जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता और पहचान दूसरे लेखकों और कवियों से कोसों आगे है। दोनों की रचनाएं आज जिंदगी के कठिन मोड़ों पर नई राह दिखाने के लिए बतौर उदाहरण के तौर पर भी पेश की जातीं हैं। लोक और अपने समय के साथ जुड़े होने के चलते आम जीवन में उनकी पैठ का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता। दैनंदिन जिंदगी में ऐसे अक्सर अनचाहे मौके आ जाते हैं, जब राह कठिन लगने लगती है। कई बार तो राह सूझती भी नहीं। निराशा के गहरे गर्त में डूबते ऐसे पलों में तुलसी और प्रेमचंद की रचनाएं राह दिखाती नजर आती हैं।
किसी साहित्यिक और उसके साहित्य की लोकप्रियता का इससे बेहतरीन उदाहरण क्या होगा। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि आज कम से कम हिंदी साहित्य की दुनिया में लोकप्रियता शब्द उपेक्षा का पात्र है। आज अगर कोई लोकप्रिय है तो उसका मतलब यही लगा लिया जाता है कि वह बाजारू है। आज बाजार के बिना एक कदम आगे बढ़ना मुश्किल है, लेकिन बाजार के साथ अगर आप कदमताल मिलाने लगते हैं तो आप बाजारू बन जाते हैं। हालांकि बाजारूपन कहीं ज्यादा सतही भाव लिए हुए है। लेकिन यह कहां की बात हो गई कि आप लोकप्रिय हो गए तो बाजारू हो गए। लेकिन हिंदी का साहित्यिक समाज आज इसी विरोधाभास को लेकर जी रहा है। इन्हीं विरोधाभासों के ही चलते गुलशन नंदा, रानू , वेदप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, जैसे लुगदी साहित्यकार बाजारू हैं। यह बात दीगर है कि उनकी कई लुगदी रचनाएं रेलवे स्टेशनों की किताबों की दुकानों की श्रृंखला एच ह्वीलर के जरिए सामान्य पाठकों की पहली पसंद रहीं हैं। उन पर लोकप्रिय फिल्में और टेलीविजन सीरियल तक बन चुके हैं। लोगों ने उन्हें पसंद भी किया, लेकिन ये रचनाएं क्लासिक का दर्जा नहीं पा सकीं। खैर यह अलग बहस का विषय है। एक बार फिर लौटते हैं प्रसाद और प्रेमचंद की तसवीर पर। यह तसवीर दो लोगों की मनोदशा के साथ ही हिंदी की हकीकत को भी बयां करती हैं। प्रेमचंद अगर लोकप्रिय हैं तो इसकी एक बड़ी वजह जनता से उनका जुड़ाव भी है। वे हमेशा लोगों से जुड़े रहे। हाल ही में सोजे वतन की जब्ती को लेकर उनका संस्मरण पढ़ने का मौका मिला। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की पत्रिका पुस्तक वार्ता के एक अंक में छपे इस संस्मरण में उन्होंने सोजे वतन की जब्ती और इसे नौकरी की दुश्वारियों की चर्चा की है। इस चर्चा का लब्बोलुआब यह है कि उन दिनों में भी उन्होंने जनता से अपने जुड़ाव को नहीं तोड़ा था।
हिंदी में इन दिनों प्रगतिशील और जनवादी होने का दावा करने वाले लोगों की अच्छी-खासी संख्या रचनारत है। लेकिन सही मायने में आमलोगों से उनका जुड़ाव कम ही है। यही वजह है कि उनके बगल वाला भी नहीं जानता कि वे कितने बड़े और महत्वपूर्ण लेखक और रचनाकार हैं। बड़े-बड़े लेखकों की मौत के बाद प्रकाशित होने वाले रिपोर्ताजों में अक्सर इस बात का जिक्र होता है कि उन्हें तो बगल वाले ही नहीं जानते। इस बहाने हिंदी वालों की लानत-मलामत भी खूब की जाती है कि हाय देखो, हिंदीभाषी लोग कितने कुसंस्कारी हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हमारे साहित्यिक सही मायने में उस गली की समस्या के निदान से भी दूर भागते हैं, जिसमें वे रहते हैं। अगर निदान के लिए वे जुड़ना भी चाहते हैं तो उनका लहजा विशिष्टता का भाव लिए होता है। ऐसे में जनता भला कैसे उनसे जुड़ सकती है और जुड़ेगी नहीं तो उनके लेखन से वाकिफ कैसे होगी। मराठी के ग्रंथाली आंदोलन की खूब चर्चा की जाती है। ग्रंथाली के जरिए मराठी लेखकों ने अपने साहित्य को जनता के बीच ले जाने का उपक्रम शुरू किया था। उनके लिए राहत की बात यह है कि जिन दिनों यह आंदोलन शुरू हुआ, संयोग से बाजारवाद और उदारीकरण नहीं था। लिहाजा वे बाजारू होने के आरोप से बचे रह सके। ग्रंथाली का एक मकसद आम लोगों की समस्याओं से रूबरू भी होना था। मराठी का लेखक अपने पाठकों के दैनंदिन जीवन की समस्याओं से भी रूबरू होता है। उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहता है। यही वजह है कि वहां का पाठक अपने साहित्यिकों को सीधे जानता है।
ऐसा नहीं कि हिंदी में ऐसा नहीं हो सकता। नई पीढ़ी में ऐसे साहित्यिक आ रहे हैं जो दैनंदिन जीवन की समस्याओं से रूबरू होने और लोगों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़े होने से नहीं झिझकते। लेकिन जरूरत इस बात की है कि इस चलन को आम बनाया जाय। तभी जनता हमारे साहित्यिकों से ना सिर्फ जुड़ पाएगी, बल्कि उनकी रचनाओं से भी खुद को जुड़ा महसूस कर पाएगी।
(रूसी विचारक प्रिंस क्रोपाटकिन से क्षमा सहित, जिनकी एक किताब का शीर्षक ही है –नवयुवकों से दो बातें )
महान कथाकार प्रेमचंद की कल जयंती बीत गई। मेरे जेहन में उनका जयशंकर प्रसाद के साथ खिंचवाई एक तसवीर ताजा हो गई है। इस तसवीर में कामायनी के रचयिता महाकवि प्रसाद धीर-गंभीर मुद्रा में खड़े हैं। लेकिन उनके साथ खड़े उपन्यास सम्राट की भंगिमा बिलकुल अलग है। उपन्यास सम्राट के फटे जूते से पैरों की अनामिका उंगली किंचित झांकती सी नजर आ रही है। प्रसाद जी की गंभीरता से ठीक उलट प्रेमचंद के स्मित होठ इससे बेपरवाह नजर आ रहे हैं। इस तसवीर के याद आने की अपनी वजह भी है। प्रेमचंद की यह भावमुद्रा दरअसल उनकी मनोदशा का प्रतीक भी है। प्रेमचंद आज भी नए-पुराने लेखकों से कहीं ज्यादा लोकप्रिय हैं। हिंदीभाषी इलाके में अगर लोकप्रियता के मामले में उनसे तुलसीदास ही भारी पड़ सकते हैं। उनकी भी जयंती आने ही वाली है। दोनों की भावभूमि भले ही अलग हो, लेकिन दोनों कम से कम एक मामले में समान हैं। जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता और पहचान दूसरे लेखकों और कवियों से कोसों आगे है। दोनों की रचनाएं आज जिंदगी के कठिन मोड़ों पर नई राह दिखाने के लिए बतौर उदाहरण के तौर पर भी पेश की जातीं हैं। लोक और अपने समय के साथ जुड़े होने के चलते आम जीवन में उनकी पैठ का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता। दैनंदिन जिंदगी में ऐसे अक्सर अनचाहे मौके आ जाते हैं, जब राह कठिन लगने लगती है। कई बार तो राह सूझती भी नहीं। निराशा के गहरे गर्त में डूबते ऐसे पलों में तुलसी और प्रेमचंद की रचनाएं राह दिखाती नजर आती हैं।
किसी साहित्यिक और उसके साहित्य की लोकप्रियता का इससे बेहतरीन उदाहरण क्या होगा। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि आज कम से कम हिंदी साहित्य की दुनिया में लोकप्रियता शब्द उपेक्षा का पात्र है। आज अगर कोई लोकप्रिय है तो उसका मतलब यही लगा लिया जाता है कि वह बाजारू है। आज बाजार के बिना एक कदम आगे बढ़ना मुश्किल है, लेकिन बाजार के साथ अगर आप कदमताल मिलाने लगते हैं तो आप बाजारू बन जाते हैं। हालांकि बाजारूपन कहीं ज्यादा सतही भाव लिए हुए है। लेकिन यह कहां की बात हो गई कि आप लोकप्रिय हो गए तो बाजारू हो गए। लेकिन हिंदी का साहित्यिक समाज आज इसी विरोधाभास को लेकर जी रहा है। इन्हीं विरोधाभासों के ही चलते गुलशन नंदा, रानू , वेदप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, जैसे लुगदी साहित्यकार बाजारू हैं। यह बात दीगर है कि उनकी कई लुगदी रचनाएं रेलवे स्टेशनों की किताबों की दुकानों की श्रृंखला एच ह्वीलर के जरिए सामान्य पाठकों की पहली पसंद रहीं हैं। उन पर लोकप्रिय फिल्में और टेलीविजन सीरियल तक बन चुके हैं। लोगों ने उन्हें पसंद भी किया, लेकिन ये रचनाएं क्लासिक का दर्जा नहीं पा सकीं। खैर यह अलग बहस का विषय है। एक बार फिर लौटते हैं प्रसाद और प्रेमचंद की तसवीर पर। यह तसवीर दो लोगों की मनोदशा के साथ ही हिंदी की हकीकत को भी बयां करती हैं। प्रेमचंद अगर लोकप्रिय हैं तो इसकी एक बड़ी वजह जनता से उनका जुड़ाव भी है। वे हमेशा लोगों से जुड़े रहे। हाल ही में सोजे वतन की जब्ती को लेकर उनका संस्मरण पढ़ने का मौका मिला। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की पत्रिका पुस्तक वार्ता के एक अंक में छपे इस संस्मरण में उन्होंने सोजे वतन की जब्ती और इसे नौकरी की दुश्वारियों की चर्चा की है। इस चर्चा का लब्बोलुआब यह है कि उन दिनों में भी उन्होंने जनता से अपने जुड़ाव को नहीं तोड़ा था।
हिंदी में इन दिनों प्रगतिशील और जनवादी होने का दावा करने वाले लोगों की अच्छी-खासी संख्या रचनारत है। लेकिन सही मायने में आमलोगों से उनका जुड़ाव कम ही है। यही वजह है कि उनके बगल वाला भी नहीं जानता कि वे कितने बड़े और महत्वपूर्ण लेखक और रचनाकार हैं। बड़े-बड़े लेखकों की मौत के बाद प्रकाशित होने वाले रिपोर्ताजों में अक्सर इस बात का जिक्र होता है कि उन्हें तो बगल वाले ही नहीं जानते। इस बहाने हिंदी वालों की लानत-मलामत भी खूब की जाती है कि हाय देखो, हिंदीभाषी लोग कितने कुसंस्कारी हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हमारे साहित्यिक सही मायने में उस गली की समस्या के निदान से भी दूर भागते हैं, जिसमें वे रहते हैं। अगर निदान के लिए वे जुड़ना भी चाहते हैं तो उनका लहजा विशिष्टता का भाव लिए होता है। ऐसे में जनता भला कैसे उनसे जुड़ सकती है और जुड़ेगी नहीं तो उनके लेखन से वाकिफ कैसे होगी। मराठी के ग्रंथाली आंदोलन की खूब चर्चा की जाती है। ग्रंथाली के जरिए मराठी लेखकों ने अपने साहित्य को जनता के बीच ले जाने का उपक्रम शुरू किया था। उनके लिए राहत की बात यह है कि जिन दिनों यह आंदोलन शुरू हुआ, संयोग से बाजारवाद और उदारीकरण नहीं था। लिहाजा वे बाजारू होने के आरोप से बचे रह सके। ग्रंथाली का एक मकसद आम लोगों की समस्याओं से रूबरू भी होना था। मराठी का लेखक अपने पाठकों के दैनंदिन जीवन की समस्याओं से भी रूबरू होता है। उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहता है। यही वजह है कि वहां का पाठक अपने साहित्यिकों को सीधे जानता है।
ऐसा नहीं कि हिंदी में ऐसा नहीं हो सकता। नई पीढ़ी में ऐसे साहित्यिक आ रहे हैं जो दैनंदिन जीवन की समस्याओं से रूबरू होने और लोगों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़े होने से नहीं झिझकते। लेकिन जरूरत इस बात की है कि इस चलन को आम बनाया जाय। तभी जनता हमारे साहित्यिकों से ना सिर्फ जुड़ पाएगी, बल्कि उनकी रचनाओं से भी खुद को जुड़ा महसूस कर पाएगी।
Friday, July 2, 2010
ढक्कन वाली पीढ़ी और साहित्य का संस्कार

उमेश चतुर्वेदी
बहुत खुशनसीब वे होते हैं, जिनकी जिंदगी की तय खांचे और योजना के मुताबिक चलती है। लेकिन आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने अपने बच्चों तक की जिंदगी के लिए खांचे तय कर रखे हैं और इसी खांचे के तहत जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ रही है। मनोवैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री भले ही इस चलन को गलत बताते रहें, थ्री इडियट जैसी फिल्में भी इसकी आलोचना करती रहें, लेकिन उदारीकरण के बाद आई भौतिकवाद की आंधी और उसमें कठिन और कठोर हुई जिंदगी की पथरीली राह पर चलते वक्त आज की जवान होती पीढ़ी के लोग सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि काश उनके भी माता-पिता ने उनकी जिंदगी का खांचा तय कर दिया होता ...
बहरहाल अपनी जिंदगी भी ऐसी खुशनसीबी के पड़ावों से नहीं गुजरी। जिस वक्त जिंदगी तय करने का वक्त था, पढ़ाई के उस दौर में रोजाना ट्रेन की घंटों की यात्रा करना मजबूरी थी। घर से कॉलेज की दूरी जो ज्यादा थी। लेकिन इस अनखांचे की जिंदगी ने खुदबखुद एक खांचा दे दिया। तब ट्रेन की लंबी यात्रा काटने के लिए किताबों और पत्रिकाओं का सहारा लेना शुरू किया और देखते ही देखते किताबें और पत्रिकाएं जिंदगी की पथरीली राह पर सहारा तो बन ही गईं, जिंदगी को देखने का नया नजरिया भी देने लगीं। किताबों की दुनिया से लोगों को परिचित कराने में ट्रेनों की बड़ी भूमिका रही है। मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार कहा था कि रेल यात्राओं का एक बड़ा फायदा उनकी जिंदगी में यह रहा है कि इसी दौरान उन्होंने कई अहम किताबें पढ़ लीं। रेल यात्रियों के मनोरंजन में किताबों की जो भूमिका रही है, उसमें एक बड़ा हाथ एएच ह्वीलर बुक कंपनी और सर्वोदय पुस्तक भंडार जैसे स्टॉल का भी रहा है। यह भी सच है कि इन स्टॉल्स से गंभीर साहित्य की तुलना में इब्ने सफी और कुशवाहा कांत के साथ गुलशन नंदा, रानू, सुरेंद्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लुगदी साहित्यकार ज्यादा बिकते रहे हैं। यहां पाठकों की जानकारी के लिए बता देना जरूरी है कि इन साहित्यकारों को लुगदी साहित्यकार क्यों कहा जाता है। दरअसल इनकी रचनाएं जिस कागज पर छपा करती थीं, वह कागज अखबारी कचरे और किताबों के कबाड़ की लुगदी बनाकर दोबारा तैयार किया जाता था। बहरहाल इसी लुगदी साहित्य के बीच ही गोदान, गबन से लेकर चित्रलेखा तक पढ़ने वाले पाठक भी मिल जाते थे। इसके साथ ही पाठकीयता का एक नया संसार लगातार रचा-बनाया जाता था। ट्रेन में बैठने की जगह मिली नहीं कि किताब या पत्रिका झोले से निकाली और अपनी दुनिया में डूब गए।
लेकिन आज हालात बदल गए हैं। तकनीकी क्रांति ने आज की पीढ़ी के हाथ में मोबाइल के तौर पर नन्हा-मुन्ना कंप्यूटर ही दे दिया है। मोबाइल फोन सचमुच में जादू का पिटारा है। बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा का 2003 में उद्घाटन करते वक्त तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे पंडोरा बॉक्स ही कहा था। तो इस जादुई बॉक्स ने संगीत और एफएम का जबर्दस्त सौगात दे दिया है। आज की पीढ़ी इसका हेडफोन साथ लेकर चलती है और गाड़ी या बस में जैसे ही मौका मिला, हेड फोन कान में लगाती है और दीन-दुनिया से बेखबर संगीत की अपनी दुनिया में डूब जाती है। मेरे के मित्र हैं, वे इस पीढ़ी को ढक्कन वाली पीढ़ी कहते हैं। आपने होमियोपैथिक दवाओं की पुरानी शीशियां देखी होंगी। कार्क लगाकर उन्हें बंद किया जाता था। आज के हेडफोन कुछ वैसे ही कान में कार्क की तरह फिट हो जाते हैं, जैसे पहले ढक्कन लगाए जाते थे। जाहिर है कि ढक्कन वाली इस पीढ़ी से रेल और बस यात्राओं के दौरान पढ़े जाने का जो रिवाज रहा है, वह लगातार छीजता जा रहा है। आज की पीढ़ी के हाथ में पत्रिकाएं और किताबें कम ही दिखती हैं। लेकिन नई-नई सुविधाओं वाले गजट उनके हाथ में जरूर हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव मोहन प्रकाश जैसे नेता कहा करते हैं कि जब वे पढ़ाई करते थे, उस वक्त अगर दिनमान में उनकी चिट्ठी भी छप जाती थी तो वे पूरी यूनिवर्सिटी में गर्व से उसे लेकर अपने बगल में दबाए घूमा करते थे। वैसे भी दिनमान और धर्मयुग पढ़ना उस समय शान की बात मानी जाती थी। लेकिन आज की पीढ़ी के लिए नए गजट ही शान के प्रतीक हैं। जाहिर है कि सोच में आए इस बदलाव का असर भी दिख रहा है। चूंकि पाठकीयता नहीं है, उसका संस्कार नहीं है तो आप देखेंगे कि आज की पीढ़ी के ज्यादातर लोगों को सामान्य ज्ञान की सामान्य सी जानकारी भी नहीं है। इसका दर्शन यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में पढ़ाने वाले अध्यापकों-प्रोफेसरों को रोजाना हो रहा है। कई बार तो वे माथा तक पीटने के लिए मजबूर हो जाते हैं। लेकिन क्या मजाल कि ढक्कन वाली पीढ़ी के माथे पर शिकन तक आ जाए। हो सकता है बदले में आपको यह भी सुनने को मिले- इट्स ओके...सब चलता है यार...
तो क्या किताबें मर जाएंगी ...क्या नए गजट की दुनिया उन्हें खा जाएगी...यहां पर याद आता है मशहूर अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन का कथन। उन्होंने कहा था – दुनिया जैसी भी है, चलती रहेगी। फिर हम भी उम्मीद क्यों न बनाए रखें।
Sunday, June 27, 2010
बाजी जीत पाएंगे नीतीश कुमार

उमेश चतुर्वेदी
पिछले यानी 2009 के आम चुनावों के आखिरी दौर के मतदान के ठीक बाद कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने जब नीतीश कुमार की प्रशंसा की थी, भारतीय जनता पार्टी से उनके अलगाव का अंदेशा उसी दिन लगाया जाने लगा था। यह बात और है कि जिस फोटो वाले विज्ञापन के नाम पर नीतीश कुमार नाराज होने का स्वांग कर रहे हैं, नरेंद्र मोदी के साथ हंसता हुआ वह फोटो उन्होंने पिछले आम चुनाव में एनडीए की लुधियाना रैली में खिंचवाए थे। उस वक्त यह माना गया था कि नीतीश कुमार के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह असली थी। लेकिन 12 जून को पटना में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान उनकी इस मुस्कान की असलियत सामने आने लगी है।
गुजरात के पांच करोड़ रूपए की सहायता को वापस करने के नीतीश के फैसले से दो तरह के सवाल उठते हैं। एक सवाल राजनीतिक है, जिसे लेकर इन दिनों जमकर हो-हल्ला मचा है। लेकिन दूसरा सवाल भारतीयता से जुड़ा है। जिस समाजवादी विचारधारामें पल-पोसकर नीतीश कुमार आगे बढ़े हैं, जिस किशन पटनायक की अगुआई में उन्हें समाजवादी राजनीति की दीक्षा मिली है, उन सबकी सोच में भारतीयता ओतप्रोत थी। उनके लिए भारत के हर कोने का नागरिक एक समान था और डॉक्टर लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण रहे हों या फिर किशन पटनायक, सबका मानना था कि पूरे देश के नागरिक को देश के हर इलाके में आने-जाने और रहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनकी इस सोच का मतलब साफ था कि इससे भारतीय गणराज्य का नागरिक सही मायने में पूरे भारत को अपना मान सकेगा और क्षेत्रीयता की धारणा से उपर उठ सकेगा। कोसी में आई बाढ़ के बाद अगर गुजरात ने मदद की थी तो इसलिए नहीं कि दोनों ही राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं, बल्कि इसलिए कि गुजरात का नागरिक भी हजारों किलोमीटर दूर अलग भाषा वाले बिहार के नागरिक के दुख को भी अपना समझ रहा था। अगर उसके मन में क्षेत्रीयता की धारणा रही होती तो वह कोसी के बाढ़ पीड़ितों के लिए आगे नहीं आता। यही बात गुजरात के लोगों पर भी लागू होती है। गुजरात में जब 2001 में भयानक सूखा पड़ा या 2002 में भारी भूकंप आया, उसमें पूरे देश ने यह सोचा होता कि वहां एक सांप्रदायिक सरकार काम कर रही है तो शायद ही सहायता मुहैया कराने में आगे रहा होता। दरअसल ऐसी सहायताएं मानवीय त्रासदी से उपजी भावनाओं की वजह से दी जाती हैं। वहां जाति-धर्म या क्षेत्रीयता की समस्याएं नहीं होतीं। अगर ऐसा ही होता तो पाकिस्तान के भूकंप पीड़ितों या बांग्लादेश के बाढ़ पीड़ितों के लिए भी भारतीय नागरिक आगे नहीं आते। नीतीश कुमार ने मुस्कुराते हुए अपने फोटो को छापने के खिलाफ गुजरात को जो जवाब दिया है, वह अतिवादी जवाब है और जिस मुस्लिम वोट की खातिर उन्होंने यह कदम उठाया है, वह भी इसे शायद ही जायज ठहराए। क्योंकि मुस्लिम नागरिक भी मानता है कि यह सहायता सांप्रदायिक नरेंद्र मोदी ने अपने घर से नहीं दी थी, बल्कि गुजरात के उन नागरिकों ने दी थी, जो बिहार के दर्द के साथ खुद को भी जुड़ा महसूस कर रहे थे। अगर ऐसे सवाल उठने लगे तो इसका जवाब देना नीतीश कुमार और उनके जनता दल यू के नेताओं को देना भारी पड़ सकता है।
रही बात राजनीतिक सवाल की, तो यह माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने गुजरात के पैसे को वापस इसलिए वापस भेजा है, ताकि बिहार के करीब बारह फीसदी मतदाताओं को खुश किया जा सके। नीतीश कुमार ने अपने शासन काल में निश्चित तौर पर व्यवस्था में एक हद तक बदलाव लाने की कामयाब कोशिश की है। उसका फायदा जितना उनकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को मिलना चाहिए था, उतना उसे नहीं मिला। बल्कि नीतीश कुमार अकेले हासिल करने में कामयाब रहे। बीजेपी से गठबंधन की वजह से नीतीश कुमार को पिछले यानी 2005 के विधानसभा चुनाव में खासी कामयाबी मिली। दरअसल कुशासन और एक खास वर्ग के लोगों को शासन-सत्ता में भागीदारी की वजह से बिहार की अधिकांश जनसंख्या नाराज थी। उसने जितना बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को साथ नहीं दिया, उससे कहीं ज्यादा लालू के खिलाफ वोट डाला। जिसमें कुशवाहा-कुर्मी के साथ अगड़े वर्ग के वोटरों का भरपूर साथ मिला। यहां ध्यान देने की बात है कि बिहार में मुसलमान करीब बारह फीसदी हैं। ब्राह्मण, भूमिहार, क्षत्रिय और कायस्थ मिलकर करीब चौदह फीसदी हैं। इसी तरह कुर्मी और कुशवाहा मिलकर करीब बारह फीसदी हैं। नीतीश कुमार को लगता है कि जातीय गणित में कुर्मी-कुशवाहा के साथ महादलितों का करीब दस फीसदी वोट के साथ मुस्लिमों का बारह फीसदी वोट मिल जाए तो उन्हें बीजेपी की जरूरत नहीं रहेगी। वैसे भी बटाईदारी पर बनी कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का शिगूफा छोड़ने के बाद वैसे ही अगड़ा वर्ग उनसे नाराज चल रहा है। इसलिए उन्हें लगता है कि कुर्मी-कुशवाहा और महादलितों के साथ मुसलमानों का वोट मिल गया तो समझो अगले कई साल तक कुर्सी पक्की। पढ़ाई-लिखाई से इंजीनियर नीतीश कुमार ने यही गणित लगाकर नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। लेकिन वे यह भूल गए हैं कि राजनीति की दुनिया में दो जमा दो का गणित चार नहीं कई बार तीन और एक भी हो जाता है। खुद उनके भी राजनीतिक जीवन में ऐसा 1995 में हो चुका है।
इसे जानने के लिए नीतीश कुमार की मूल पार्टी समता पार्टी के गठन और 1995 के विधानसभा चुनावों में मिली सफलता को भी देखना होगा। 1994 में वीपी सिंह ने राजनीति से सन्यास लेकर लोकसभा में पार्टी के नेता पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद जार्ज फर्नांडिस ही जनता दल संसदीय दल के स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे। लेकिन आज के जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने जोड़तोड़ करके खुद को संसदीय दल का नेता घोषित करा लिया था। इससे जार्ज आहत थे। इस बीच बिहार की राजनीति में लालू यादव नीतीश कुमार को अलग-थलग कर रहे थे। तभी जार्ज और नीतीश ने मिलकर जनता दल से अलग समता पार्टी बनाई और 1995 के विधानसभा चुनावों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, सीपीएम – माले और ऐसे ही दलों के साथ सीटों का तालमेल करके चुनाव लड़ा। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद समता पार्टी के विधायक दहाई का भी आंकड़ा नहीं पार कर पाए। इसके बाद उन्हें लालू जैसे कद्दावर विरोधी को मात देने के लिए सांप्रदायिकता का ही कंधा नजर आया था। इतना ही नहीं, तब समाजवादी जनता पार्टी चला रहे चंद्रशेखर भी समता पार्टी में अपनी पार्टी के विलय को तैयार थे। इसी बीच 1996 का लोकसभा चुनाव आ गया और शिवसेना के बाद भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी बनने वाला दूसरा दल समता पार्टी ही बना। जिसका उसे फायदा भी मिला। उसके बाद से नीतीश कुमार और उनकी पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्हें 2000 में मुख्यमंत्री बनाने का अभियान उनकी पार्टी से कहीं ज्यादा भारतीय जनता पार्टी ने ही चलाया। 2005 के विधानसभा चुनावों में उन्हें बतौर मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी के तब के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने ही प्रोजेक्ट किया था। जबकि इस अपनी पार्टी के इस फैसले से बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा नाराज थे। कहना न होगा कि उनकी नाराजगी अब भी बनी हुई है।
जाहिर है कि 1995 का इतिहास और चुनावी सफलता नीतीश के खिलाफ रही है। इतिहास गवाह है कि अगर बीजेपी का उन्हें साथ नहीं मिला होता तो वे आज जहां हैं, वहां नहीं होते। वैसे भी राजनीति का आज पहला उसूल हो गया है सिद्धांतों की तिलांजलि देना। यही वजह है कि आज गठबंधन बनने और बिखरने का दौर बढ़ गया है। लेकिन बिहार के जो हालात हैं और जनता दल यू की भी जो अंदरूनी हालत है, उसमें नीतीश के अतिवादी कदम उन्हें भारी ही पड़ सकते हैं। उनकी पार्टी के एक कद्दावर नेता ने नाम न छापने की शर्त पर इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि अफसरशाही पर पार्टी की कोई लगाम ही नहीं है। इससे अधिकांश नेता नाराज हैं। नाराज तो विधायक भी हैं। इसलिए अगर एक बार उनके खिलाफ विरोधी माहौल शुरू हुआ तो उनकी अपनी ही पार्टी के लोग उनके खिलाफ खड़े होने में देर नहीं लगाएंगे। प्रभुनाथ सिंह, शंभूनाथ श्रीवास्तव, राजीव रंजन सिंह लल्लन और रह-रह कर शिवानंद तिवारी के गुस्से के इजहार को इन्हीं अर्थों में जोड़कर देखा जाना चाहिए। इससे साफ है कि सत्ता की ताकत के चलते जनता दल यू के विधायक और सांसद भले ही चुप हों, लेकिन विरोधी माहौल बनने के बाद वे अपनी खुन्नस निकालने से बाज नहीं आएंगे। ऐसे में नीतीश कुमार के लिए अकेले खड़ा हो पाना आसान नहीं होगा। फिर जिस कांग्रेस के सहारे बिहार में नीतीश कुमार की अगली सरकार की कल्पना की जा रही है, उसका लिटमस टेस्ट अभी होना बाकी है। उसे लगता है कि उसके साथ जनता आ रही है। लेकिन जिस तरह बीजेपी आहत हुई है, अगर वह अपने कार्यकर्ताओं और वोटरों को यह संदेश देने में कामयाब हुई तो बिहार में भी कर्नाटक दोहराया जा सकता है। वहां जनता दल सेक्युलर के साथ बीजेपी का गठबंधन था और वक्त आने पर जब जेडी एस ने सत्ता देने से इनकार कर दिया तो दक्षिण में कमल खिल उठा था। जनता के बीच बीजेपी के पक्ष में सहानुभूति लहर चल पड़ी थी।
राजनीति संभावनाओं और आशंकाओं का खेल है। अगर बीजेपी की यह संभावना और जनता दल यू की ऐसी आशंका सच साबित हो गई तो बाजी पलटते देर नहीं लगेगी।
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