Sunday, May 13, 2018

मां पर अस्फुट विचार


प्रकाशित लेखों और कहीं बोलने-सम्मानित होने जैसी सार्वजनीन गतिविधियों को छोड़कर मैं निजी तथ्यों को सोशल मीडिया पर गोपनहीन करने से बचता हूं.. आज मातृ दिवस है..सोशल मीडिया पर देख रहा हूं..मां-बच्चे के बेहद निजी रिश्ते को भी किस तरह सार्वजनिक कर-करके हम लोग लहालोट हो रहे हैं.. मां से रिश्ता तो ऐसा है कि वह कुमाता भी हो तो वह सांसों में रचा-बसा होता है..इसीलिए हमारे शास्त्र तो मानते ही नहीं माता कुमाता हो सकती है..कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति । आधी जिंदगी गुजर चुकी है..मातृ दिवस पर याद करने बैठा हूं तो जाया माता के साथ ही कितनी माताएं याद आ रही हैं..जाया मां तो मेरे सांस के साथ ही जाएगी... उसके अस्तित्व का क्या नकार और क्या स्वीकार..आप अस्वीकार करके भी उससे दूर थोड़े ही जा सकते हैं..आपकी रक्त वाहिनियों में गुजरते रक्त के हर कण, अस्थियों का एक-एक अणु, मज्जा की हर एक बूंद तो उसकी ही है..उसे क्या याद करना और क्या भूल जाना.. आप भूलते रहिए..लेकिन आपका अस्तित्व ही उसे न भुला पाने का सर्वश्रेेष्ठ उदाहरण है... मुझे अपनी जाया मां की तरह अपनी चाचियों से भी भरपूर प्यार मिलता रहा है...बहू-बच्चों वाली हो गई हैं वे..लेकिन उनके पास साल-छह महीने में पहुंच जाता हूं..अब भी वैसे ही प्यार करती हैं, जैसे जब वे ब्याह कर आई थीं तो करती थीं ...तब अपनी उम्र पांच से लेकर बारह साल तक रही थी... एक चाची तो दूसरी मां की ही तरह है...एक चाची तो अब भी गांव जाता हूं तो मुझे अपने घर में रूकने ही नहीं देती.. बुलावा भेज देती है..बहुएं रहीं भी, तब भी खुद ही चाय-नाश्ता बनाकर खिलाती-पिलाती है..जिसके लिए आज भी अपनी मां की तरह बबुआ ही हूं... मुझे उस बूढ़ी मां का दुलार आज भी भिगो रहा है, जब अपने चौथेपन में देवरिया के किसी गांव से अपने परिवार को छोड़कर मेरे गांव आ गई थीं.. बाबू ही कहती थीं..मांग-चोंग कर ही गुजारा करती थी..लेकिन अपना पूरा प्यार मुझ पर उड़ेल देती थी.. जब तीसरी कक्षा में था तो एक रात वह इस दुनिया से कूच कर गई थी..उस दिन का सूनापन आज भी जब याद आता है..अजीब-सी हूक और खालीपन से भर देता है... मइया यानी दादी तो 14 साल की उम्र तक मेरी दूसरी मां ही रहीं...वह मेरे पिता की ही मां नहीं थीं..मेरी भी थीं..हमारी ही नहीं..मेरे चचेरे चाचाओं की भी..चाचा भी बुढ़़ापे की ओर चल पड़े हैं और आज भी उन्हें याद करते हैं..मां तो वह अपने देवर यानी मेरे छोटे बाबा की भी थीं..जब आखिरी विदाई देने के लिए उन्हें कंधे पर उठाया था..तब छोटका बाबा के मुंह से उनके लिए निकले शब्द जब भी याद आते हैं, गहरे तक भिगो जाते हैं.. काकी को कैसे भूल सकता हूं..बाबूजी की चाची..उनकी सुन हम भी उन्हें काकी ही कहते थे..जब भी मां नहीं रहती थीं..हमारी मदद को आगे आने में देर नहीं लगाती थीं.. अपनी सास को भी भूल पाना आसान नहीं हैं..सास जी से साल-छह महीने में मिलता हूं तो उनकी आंखों की चमक ही बताती है कि वे मेरे लिए क्या हैं..और उनके लिए मैं बच्चे के अलावा क्या हूं.. जाया मां का अहसान चुका पाना इस जन्म में क्या, किसी भी जन्म में संभव नहीं..लेकिन अपने जीवन पर अहसानों की फेहरिश्त की ओर देखता हूं तो ऐसी कई मांएं नजर आती हैं..किन-किन का अहसान चुका सकता हूं..

Wednesday, January 24, 2018

साहित्य मनुष्य को बेहतर बनाता है

मुम्बई, "उपन्यास और कविताएं वस्तुतः जीवन और समाज की धड़कन होती है। व्यक्तित्व  चेहरों से याद रखे जाते हैं या कृति के माध्यम से। लेखक अपनी कृति से सदैव जीवित रहता है ।"यह उद्गार हेमंत फाउंडेशन पुरस्कार समारोह के मुख्य अतिथि भोपाल से पधारे आईसेक्ट यूनिवर्सिटी के रिसर्च जनरल अनुसंधान के संपादक सुप्रसिद्ध कवि विजयकांत वर्मा ने 20 जनवरी 2018 को श्री राजस्थानी सेवा संघ के सभागार में व्यक्त किए।
 कार्यक्रम का आरंभ दीप प्रज्वलन से शुरू हुआ। अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्था की अध्यक्ष सुप्रसिद्ध साहित्यकार संतोष श्रीवास्तव ने अपने स्वागत भाषण में कहा
"यह पुरस्कार हमारे लिए एक इम्तिहान की तरह है जिसे हम जीवन की चुनौती मानकर हर साल आयोजित करते हैं और आयोजित करते रहेंगे।" सितारों के आगे जहां और भी है अभी इश्क के इम्तिहां और भी है"
आयोजन की प्रस्तावना तथा संस्था का परिचय कथाकार पत्रकार संस्था की सचिव प्रमिला वर्मा ने दिया। उन्होंने विजय वर्मा कथा सम्मान एवं हेमंत स्मृति कविता सम्मान का संक्षिप्त इतिहास भी बतलाया। विजय वर्मा  सम्मान के लिए चयनित पुस्तक "दीनानाथ की चक्की" के बारे में बोलते हुए सुप्रसिद्ध पत्रकार हरीश पाठक ने कहा "अशोक मिश्र की कहानियां विमर्शवादी या फैशनेबल कहानियां नहीं है।उन्होंने संग्रह की कहानी `पत्रकार बुद्धिराम @पत्रकारिता डॉट कॉम" का विशेष उल्लेख किया । उन्होंने कहा कि इस कहानी में पत्रकारिता का पूरा सच बहुत ही विश्वसनीय ढंग से लिखा गया है। पाठक ने अशोक मिश्र की कहानी दीनानाथ की चक्की और अन्य की विस्तार से चर्चा की ।
हेमंत स्मृति कविता सम्मान के लिए चयनित पुस्तक वसंत के पहले दिन से पहले पर नवभारत टाइम्स मुंबई के सहायक संपादक हरि मृदुल ने कहा "राकेशजी की कविता चालू मुहावरों और बड़बोलेपन से पूरी तरह मुक्त है इसीलिए गहरी हैपाठक से बतियाती और संवेदना को छूती इस तरह की कविताएं काफी कम लिखी जा रही हैं । इन्हीं अर्थों में "बसन्त के पहले दिन से पहले " एक मूल्यवान संग्रह है उनके पास प्रतिरोध की इकाई प्रभावशाली कविताएं हैं। विजय वर्मा कथा सम्मान सूर्यबालाजी के कर कमलों द्वारा अशोक मिश्र एवं विजयकांत वर्मा द्वारा हेमंत स्मृति कविता सम्मान राकेश पाठक को प्रदान किया गया ।
अपने वक्तव्य में कथाकार अशोक मिश्र ने कहा "मेरे लिए कहानी लिखना किसी आम आदमी की पीड़ा को वाणी देने जैसा है । मेरी कोशिश होती है कि अन्याय, असमानतापक्षपातअव्यवस्थाशोषण के दुष्चक्र में पिसते और मेहनत मजदूरी कर गुजारा करने वाले मजदूर या किसान की दशा का थोड़ा सा चित्रण कर सके तो शायद लिखना सार्थक कहलाएगा ।"
डॉ राकेश पाठक ने संस्था को धन्यवाद देते हुए कहा "कविता आम आदमी को बेहतर मनुष्य बनाने का काम करती है। इस हिंसक समय में प्रेम कविताएं मनुष्यता का संदेश देती हैं। उन्होंने अपनी एक प्रेम कविता का पाठ रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया।जेजेटी यूनिवर्सिटी के कुलपति एवं राजस्थानी सेवा संघ के प्रमुख विशिष्ट अतिथि विनोद टीबड़ेवाला ने राजनीतिक गतिविधियों पर गहरी चिंता व्यक्त की और साहित्यकारों की लेखनी से  परिवर्तन होने का आव्हान किया। समारोह की अध्यक्ष सुप्रसिद्ध साहित्यकार सूर्यबाला ने कहा।
"यह दोनों पुरस्कार एक बहन एक मां द्वारा अपने दिवंगत रचनाकार भाई और सगे बेटे को दी गई श्रद्धांजलि है । संतोषजी ने अपने दुख के अंकुरों को रोपकर उन्हें संवेदना और रचनात्मकता के घने छायादार वृक्ष में परिवर्तित कर दिया। इन पुरस्कारों का हमारे महानगर के साहित्यिक परिदृश्य को बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है और इस मंच से पुरस्कृत नामों की विश्वसनीयता पर कभी सवाल नहीं उठे।"
कवि गजलकार देवमणि पांडेय ने कार्यक्रम का संचालन किया।

कार्यक्रम में शहर के वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकारिता की दुनिया से जुड़े  संपादक और साहित्यकारों की गरिमामय उपस्थिति रही। विशेष रूप से  कानपुर से आए वाणी के संपादक श्री हरि वाणी, झांसी से आए वरिष्ठ कवि साकेत सुमन चतुर्वेदी ,कोलकाता से आए वरिष्ठ कवि कपिल आर्यसमाजसेवी विजय वर्माधीरेंद्र अस्थानासूरजप्रकाशबृजभूषण साहनीराजेश विक्रांतफिरोज खानअसीमा भट्ट ,ज्योति गजभिए ,रीता रामदासअमर त्रिपाठी ,मुरलीधर पांडे,नागेन्द्र नाथ गुप्ता,विद्याभूषण त्रिवेदी,आभा दवे ,वनमाली चतुर्वेदी,,सुनील सिंह  आदि रचनाकारों की उपस्थिति विशेष रूप से दर्ज़ की गई।

Friday, April 7, 2017

वैचारिक वर्चस्व की जंग और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद



उमेश चतुर्वेदी
भारतीय विश्वविद्यालयों को इन दिनों वैचारिकता की धार पर जलाने और उन्हें तप्त बनाए रखने की कोशिश जोरदार ढंग से चल रही है। ज्ञान की वैश्विक अवधारणा के विस्तार के प्रतिबिंब मानी जाती रही आधुनिक विश्वविद्यलाय व्यवस्था में अगर संघर्ष बढ़े हैं तो इसकी बड़ी वजह यह है कि पारंपरिक तौर पर विश्वविद्यालयों में जिस खास वैचारिक धारा का प्रभुत्व रहा है, उसे चुनौती मिल रही है। आजाद भारत से पहले भले ही भारतीय विश्वविद्यालयों की संख्या कम थी, लेकिन उनका वैचारिक आधार भारतीयता, राष्ट्रवाद और अपनी संस्कृति के नाभिनाल से गहरे तक जुड़ा हुआ था।  आजादी के बाद देश में विश्वविद्यालय भले ही बढ़ते गए, लेकिन उनका वैचारिक और सांस्कृतिक सरोकार भारतीयता की देसी अवधारणा और परंपरा से पूरी तरह कटता गया। इसके पीछे कौन लोग थे, इस पर अब सवाल उठने लगा है।
भारतीय विश्वविद्यालयों का वैचारिक चिंतन किस तरह आजादी के बाद यूरोपीय अवधारणा का गुलाम होता गया, उसकी सही व्याख्या किसी राष्ट्रवादी विचारक ने नहीं, बल्कि समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने की है। अपने आलेख अयोध्या और उससे आगे में किशन पटनायक ने लिखा है- “यूरोप के बुद्धिजीवी, खासकर विश्वविद्यालयों से संबंधित बुद्धिजीवी, का हमेशा यह रूख रहा है कि गैर यूरोपीय जनसमूहों के लोग अपना कोई स्वतंत्र ज्ञान विकसित न करें । विभिन्न क्षेत्रों में चल रही अपनी पारंपरिक प्रणालियों को संजीवित न करें, संवर्धित न करें। आश्चर्य की बात है कि कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों का भी यही रूख रहा, बल्कि अधिक रहा। किशन पटनायक की जो व्याख्या है, दरअसल उसे ही राष्ट्रवादी विचारधारा भी मानती है। विश्वविद्यालयों की परिधि में काम कर रही राष्ट्रवादी विचारधारा की प्रबल प्रतिनिधि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की भी सोच ऐसी ही है। इसीलिए जब दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज में राष्ट्र विरोधी ताकतों को सगर्व बोलने को बुलावा मिलता है, या फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े होने के नारे खुलेआम लगते हैं तो उसके प्रतिकार में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को आना पड़ता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज में देशद्रोही नारे लगाने के आरोपी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र उमर खालिद और शेहला राशिद के बोलने का अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा विरोध दरअसल विश्वविद्यालयों को लेकर कम्युनिस्ट विचारकों और बुद्धिजीवियों की संकुचित सोच का विरोध है। लेकिन दुर्भाग्यवश  विश्वविद्यालयों में अब तक जमी रही वामपंथी विचारधारा इसे अभिव्यक्ति पर हमले के तौर पर प्रचारित करने लगी और उसने इसे संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के हमले के तौर पर प्रचारित करके अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।  

Tuesday, July 26, 2016

सूचना सेवा में सुधार पर बासवान समिति ने खड़े किये हाथ

संघ लोकसेवा आयोग परीक्षा से संबंधित सुधारों पर कार्य करने के लिए बी एस बासवान समिति ने भारतीय सूचना सेवा में सुधार के सवाल पर हाथ खड़े कर दिये हैं, इससे इस सेवा में सुधार के लिए किये जा रहे प्रयासों को झटका लगा है।
                 हालांकि समिति ने अभी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी नहीं है लेकिन भारतीय सूचना सेवा में सुधार के लिए छात्रों की ओर से किये जा रहे प्रयासों के जवाब में समिति के अध्यक्ष बी एस बासवान की ओर से जयपुर के छात्र श्याम शर्मा को ईमेल कर कहा गया है भारतीय सूचना सेवा को सिविल सेवाओं में रखना या न रखनासूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का काम हैसमिति का नहीं। मुझे लगता है कि वे यथास्थिति बनाये रखना चाहते हैं।
       हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालयजयपुर के छात्र श्याम शर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय व बासवान समिति को पत्र लिखकर मांग की थी कि भारतीय सूचना सेवा की पेशागत आवश्यकताओं को देखते हुए इसे ग्रुप ’ पेशेवर सेवा के तौर पर चिन्ह्ति किया जाए तथा इसमें प्रवेश के लिए मीडिया व जनसंचार विषयों की विशेषज्ञता अनिवार्य की जाए।
उल्लेखनीय है कि भारतीय सूचना सेवा में शीर्षस्थ पदों पर नियुक्तियों के लिए अब तक विशेषज्ञता अनिवार्य नहीं है और सिविल सेवाओं में निचले रैंकों पर रहने वाले प्रतिभागी अनिच्छा के साथ इस सेवा में पहुंचते हैं जिससे सरकार की कार्यदक्षता तो प्रभावित होती ही हैसाथ हीसंचार कौशल संयुक्त पेशेवर प्रतिभा के साथ भी अन्याय होता है। इस संबंध में मीडिया स्कैनदिल्ली पत्रकार संघ,आईआईएमसी छात्र संघ तथा अन्य तमाम मीडिया संगठनों व छात्र संगठनों ने बासवान समिति को पत्र लिखा है।  
इन संगठनों का मानना है कि यह स्थिति पत्रकारिता के छात्रों के साथ अन्याय जैसी है। देशभर में बड़ी संख्या में पत्रकारिता संस्थानों से सैकड़ों की संख्या में स्नातक होकर पत्रकारिता और जनसंचार के छात्र निकलते हैं और उनके कौशलों की आवश्यकता वाली एक लोकसेवा भी अस्तित्व में है फिर भी उनको अवसर देने के स्थान पर इस सेवा में ऐसे लोगों को मौका दिया जा रहा है जिनके पास पत्रकारिता और जनसंचार की बेसिक जानकारी तक नहीं है। इसलिए सूचना और प्रसारण मंत्रालयकेंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभागसंघ लोकसेवा आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय से मांग की गयी है कि देशभर में पत्रकारिता के छात्रों के हित में भारतीय सूचना सेवा को पूरी तरह विशेषज्ञ सेवा के रूप में ग्रुप ए पेशेवर सेवा के रूप में चिन्हित किया जाए। 

Wednesday, May 25, 2016

आपकी मदद चाहिए..

मेरी कार चोरी हुए दस दिन हो गए..दिल्ली पुलिस ने इसे कैजुअली लिया..हम चाहते हैं कि आगे से ऐसे मामलों को दिल्ली पुलिस कैजुअली ना ले..इसलिए एक याचिका डाली है..जो नीचे दिए गए लिंक पर है..कृपया इस पर क्लिक करें और अपना हस्ताक्षर करके सहयोग करें..ताकि आगे किसी की कार चोरी हो तो पुलिस उसे कैजुअली ना ले..
https://www.change.org/p/home-ministry-of-india-my-car-is-stolen/c/456065495यहां करें क्लिक

Monday, May 9, 2016

उत्तराखंड में किस करवट बैठेगा राजनीतिक ऊंट



उमेश चतुर्वेदी
दुनियाभर के लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था वाले समाजों में आखिरी उम्मीद की किरण न्यायपालिका कितनी बन पाई है, यह शोध का विषय है। लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दें तो भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका ही आखिरी उम्मीद की किरण बनकर उभरी है। हाल के दिनों आए जजों की नियुक्ति वाली कोलेजियम को बहाल करने वाले फैसले को छोड़ दें तो अभी-भी सर्वोच्च न्यायपालिका इंसाफ की आखिरी उम्मीद बनी हुई है। उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार के बहुमत परीक्षण कराने का आदेश भी कम से कम कांग्रेस पार्टी के लिए आखिरी उम्मीद की ही तरह आया है। इसलिए वह इसे लोकतंत्र की जीत बताते नहीं अघा रही है। अपने समाज में चूंकि न्यायिक फैसलों की आलोचना की परंपरा नहीं है, लिहाजा अगर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नहीं भी आता तो यही कांग्रेस दुखी होने के बावजूद भी उस फैसले को लोकतंत्र की हार नहीं बताती। लेकिन यह तय है कि लोकतंत्र की असल जीत या हार इस फैसले से नहीं, बल्कि 10 मई को देहरादून में विधानसभा के पटल पर होगी। अगर हरीश रावत जीत गए तो निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए झूमने का मौका होगा। सत्ता तंत्र में लगातार छीजती जा रही कांग्रेस की उत्तर भारत में एक और सरकार लौट आएगी। लेकिन अगर हार हो गई तो इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए वे क्षण बेहद दुखद होंगे।

Sunday, April 10, 2016

अमित शाह की आक्रामक राजनीति और बीजेपी

उमेश चतुर्वेदी
हताशा और निराशा के दौर से जिस पार्टी को दशकों गुजरना पड़ा हो, अगर लंबे संघर्ष के बाद वह जनता की आंखों का दुलारा बन जाए तो उसका उत्साहित होना स्वाभाविक है। भारतीय जनता पार्टी के 37 वें स्थापना दिवस पर अमित शाह की हुंकार को भी इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। पार्टी अध्यक्ष के नाते अमित शाह ने बीजेपी के कार्यकर्ताओं से कहा कि पार्टी को पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक 25 साल तक राज करना है। अमित शाह का यह बयान उनके विरोधियों को बड़बोलापन लग सकता है। विपक्षी दल इस पर सवाल भी उठा सकते हैं। उनका सवाल उठाना जायज भी है। लेकिन अमित शाह कोई अजूबी बात नहीं कर रहे हैं। जिस पार्टी के कार्यकर्ताओं को छोड़ दें, बड़े नेताओं तक को संघर्ष और राजनीतिक उत्पीड़न के लंबे दौर से जूझना पड़ा हो, उस पार्टी के अध्यक्ष की हुंकार ऐसी ही होनी चाहिए। कम से कम भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता तो ऐसा ही मानते हैं। कारपोरेट और उदारीकरण के वर्चस्व के दौर में आज टीम अगुआ से अपने लोगों को प्रेरित करने के लिए ऐसे ही बयानों की उम्मीद की जाती है। मोर्चे को फतह करने की तैयारियों में जुटी सेनाओं के जनरल भी अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाने और जीत के लिए प्रेरित करने के लिए ऐसे ही बयान देते रहे हैं। 

Saturday, February 20, 2016

कितना जहरीला है माहौल...

माहौल में कितना जहर भर गया है.. जरा देखिए फेसबुक पर यह पोस्ट..मेरे छात्र रहे हैं नाम है मन्शेष कुमार.. आईआईएमसी जैसी जगह में पढ़ते हैं..तो जाहिर है कि ऊंची छलांग लगाने की भी सोच रहे होंगे..लेकिन उनकी भाषा कैसी है..जरा पढ़िए..मेरे पोस्ट को शेयर करते वक्त,.दुख है कि इन्हें अपनी क्लास में मैं पढ़ा नहीं पाया..वैसे 23 साल पहले मैं उसी क्लास में छात्र था..आखिर भविष्य में ये क्या करेंगे...अंदाज लगाइए...इनका परिचय और इनकी पोस्ट दोनों लगा रहा हूं..देखिए और विचार कीजिए...

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Saturday, January 23, 2016

झारखंड में रघुबर सरकार की नायाब कोशिश

बजट की तैयारियों में जनता से मांगे सुझाव
उमेश चतुर्वेदी
उफान मारती जनाकांक्षाओं के रथ पर सवार होकर सत्ता में आने वाली सरकारों की चुनौतियां कम नहीं होतीं। उन्हें अपने उस आधारवोट बैंक की उम्मीदों पर खरा उतरना होता है, जिनके समर्थन की बदौलत उन्हें सत्ता की ताकत हासिल हुई रहती है। जिस पश्चिमी मॉडल के लोकतंत्र को आज पूरी दुनिया में आदर्श माना जा रहा है, जिसे 66 साल पहले हमने भी स्वीकार किया, उसकी सबसे बड़ी खामी है कि सत्ता में आते ही राजनीतिक दल उसी जनता को भूल जाते हैं, जिनके समर्थन का आधार ही उन्हें सत्ता की सर्वोच्च सीढ़ी तक पहुंचाता रहा है। सत्ता में आने के बाद वायदों को भूल जाना ज्यादातर राजनेताओं और राजनीति की रवायत रही है। ऐसे में अगर झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास सूबे के दूसरे बजट की तैयारी के लिए जनता के बीच घूम रहे हैं और लोगों से राय-सलाह ले रहे हैं और उनके वायदे के मुताबिक राज्य का अगला बजट बनाने की तैयारी कर रहे हैं तो उसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। हालांकि अभी तक सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के अलावा दूसरे किसी राजनीतिक खेमे से उनके इस कदम की सराहना की खबर सामने नहीं आई है। लेकिन उनके कामकाज पर अभी तक कोई सवाल नहीं उठा है। झारखंड की विपक्षी राजनीति के सबसे अहम किरदार और झारखंड में गुरूजी के नाम से विख्यात झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरेन ने जमशेदपुर में रघुबर दास सरकार का पहला साल पूरा होने के संदर्भ में पूछे एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि एक साल में कोई भी सरकार बहुत कुछ नहीं कर सकती। किसी राज्य या देश के विकास के लिए एक साल का वक्त कुछ खास नहीं होता। लेकिन रघुबर दास सरकार ने इस दौरान झारखंड के विकास के लिए जो कदम उठाए हैं, वे ठीक हैं और उन्हें मौका दिया जाना चाहिए।
सवाल यह उठता है कि आखिर राज्य के दूसरे बजट के लिए ही रघुबर दास सरकार ने रायशुमारी के लिए जनता के बीच जाने का कदम क्यों उठाया। पहले बजट के लिए उन्होंने ऐसी कवायद क्यों नहीं की। इसका जवाब राज्य सरकार के पास है। झारखंड के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार शिल्पकुमार का कहना है कि चूंकि जब झारखंड में भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिला, तब बजट सत्र की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। कुछ ही महीनों बाद बजट पेश किया जाना था। तब सरकार के पास पहली जिम्मेदारी यह थी कि सबसे पहले सूबे की संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखते हुए बजट पेश किया जाय। उस वक्त राज्य सरकार के पास जनता की राय जानने और फिर बजट तैयार करने का वक्त नहीं था।
जिस ट्रिकल डाउन सिद्धांत के मुताबिक उदारीकरण की अर्थव्यवस्था को हमने स्वीकार किया है, उसमें वोट मांगते वक्त जनाकांक्षा की बात तो खूब की जाती है। लेकिन जब सचमुच जनता के लिए कुछ करने का वक्त आता है, तब जनता के लिए चर्चाओं की बजाय उद्योगपतियों और आर्थिक संगठनों के प्रतिनिधियों से बात करके नीतियां तैयार कर ली जाती हैं और उसके मुताबिक बजट बनाकर योजनाएं शुरू कर दी जाती हैं। और इस तरह जनाकांक्षाएं कहीं पीछे रह जाती हैं। इन संदर्भों में देखें तो संभवत: ये पहला मौका है, जब किसी मुख्यमंत्री ने राज्य के लोगों से राज्य का बजट तैयार करने के लिए ना सिर्फ राय मांगी है, बल्कि राज्य में घूम-घूमकर लोगों की आकांक्षाओं का जानने का प्रयास कर रहा है। मुख्यमंत्री रघुबर दास ने बजट निर्माण के विकेन्द्रीकरण की दिशा में राज्य के सभी पांचों प्रमंडलों (कमिश्नरियों) में खुद जा कर छात्रों, महिलाओं, किसानों, शिक्षाविदों, स्वयंसेवी संस्थाओं, व्यापारियों के प्रतिनिधियों से मिलकर बजट पर चर्चा की शुरूआत की है। रघुबरदास का मानना है कि इससे बजट को जनोन्मुखी बनाने में मदद मिलेगी।
बजट को लेकर एक शिकायत यह रही है कि अफसरों को राज्य और आम लोगों की परेशानियों की जानकारी नहीं होती। वे यह भी नहीं जानते कि जमीनी हकीकत क्या है। लिहाजा बंद कमरों और दफ्तरों के भीतर वे जो बजट तैयार कर देते हैं, उनका जमीनी जरूरतों से कई बार दूर-दूर का वास्ता नहीं होता। रघुबर दास ने शायद इसी वजह से जनोन्मुखी विकास के लिए जनता द्वारा जनता के लिए जनता का बजट का अपने अधिकारियों को संदेश दिया है। वैसे इस बजट निर्माण प्रक्रिया की शुरूआत सितम्बर से ही कर दी गई है। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री ने 11 दिसंबर तक राज्य के 5 प्रमंडलों से 2 प्रमंडलों का ना सिर्फ दौरा पूरा कर लिया था, बल्कि इस दौरान समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से मिलकर बजट की जरूरतों पर चर्चा भी पूरी कर ली थी। इस दौरान सरकार की कोशिश यह रही है कि लोग क्या चाहते हैं और उनकी विकास की अवधारणा में स्थानीय जरूरतें क्या हैं, यह जाना और समझा जाय । रघुबर दास ने बजट चर्चा की शुरूआत उत्तरी छोटा नागपुर के धनबाद में 6 दिसम्बर को की और उन्होंने लोगों के साथ दूसरी रायशुमारी दक्षिणी छोटा नागुपर के गुमला में 11 दिसम्बर को की । इसी तरह मुख्यमंत्री ने संताल परगना के दुमका में 19 दिसम्बर को,  पलामू के डालटनगंज में 23 दिसम्बर और कोलहान प्रमंडल के चाईबासा में 24 दिसम्बर को लोगों से मुलाकात की और उनकी राय जानने की कोशिश की। इस दौरान कोशिश रही कि महिला-प्रतिनिधियों, किसानों, प्रख्यात शिक्षविदों, छात्रों के प्रतिनिधि और एनजीओ के प्रतिनिधि को बुलाया जाय। यह भी कोशिश रही कि जो लोग बुलाए जाएं, दरअसल उनकी अपने समुदाय पर गहरी पकड़ तो हो ही, अपने समुदाय की जरूरतों और कमजोरियों के साथ उसकी भावी चुनौतियों को भी समझते हों। सबसे बड़ी बात यह है कि इस दौरान राज्य के प्रमुख विभागों के सचिवों की मौजूदगी अनिवार्य रही। ताकि वे लोगों की समस्याओं को सीधे-सीधे जान सकें। इस बैठक के दौरान इलाके के सांसदों और विधायकों समेत दूसरे जन-प्रतिनिधियों को नहीं बुलाया गया। हालांकि उनसे अलग से राय जरूर मांगी गई है और वह भी लिखित रूप से। ताकि उनकी मांगों और सुझावों को भी बजट में समाहित किया जा सके। इसके साथ ही सांसदों और विधायकों से सरकार ने अपील की है कि वे अपने-अपने इलाकों के महत्वपूर्ण कार्यों की सूची मुहैया करा दें, ताकि बजट में उसे शामिल किया जा सके।

Friday, December 11, 2015

उम्मीद करें, बिहार में जारी रहेगा विकासवाद

उमेश चतुर्वेदी
राजनीति में एक कहावत धड़ल्ले से इस्तेमाल की जाती है और इस बहाने राजनीतिक दल अपनी दोस्तियों और दुश्मनी को जायज ठहराते रहते हैं। वह कहावत है – राजनीति में न तो दोस्ती स्थायी होती है और ना ही दुश्मनी। चूंकि लोकतांत्रिक समाज में राजनीति का महत्वपूर्ण लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ लोककल्याण ही हो सकता है, लिहाजा इन स्थायी दोस्तियों और दुश्मनियों का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद हो सकता है – राष्ट्रीय हित के परिप्रेक्ष्य में जन कल्याण। लेकिन क्या बिहार की राजनीति में 1993 के पहले तक रंगा और बिल्ला के नाम से मशहूर लालू और नीतीश की जोड़ी को मौजूदा परिप्रेक्ष्य में लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर तौला-परखा जा सकता है?

Friday, November 27, 2015

वेतन आयोग लाएगा महंगाई


 

कर्मचारियों की सुख समृद्धि बढ़े, उनका जीवन स्तर ऊंचा उठे, इससे इनकार कोई विघ्नसंतोषी ही करेगा। लेकिन सवाल यह है कि जिस देश में 125 करोड़ लोग रह रहे हों और चालीस करोड़ से ज्यादा लोग रोजगार के योग्य हों, वहां सिर्फ 33 लाख एक हजार 536 लोगों की वेतन बढ़ोत्तरी उचित है? सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद केंद्र सरकार की तरफ से अपने कर्मचारियों को लेकर यही आंकड़ा सामने आया है। बेशक सबसे पहले केंद्र सरकार ही अपने कर्मचारियों को वेतन वृद्धि का यह तोहफा देने जा रही है। लेकिन देर-सवेर राज्यों को भी शौक और मजबूरी में अपने कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन देना ही पड़ेगा। जब यह वेतन वृद्धि लागू की जाएगी, तब अकेले केंद्र सरकार पर ही सिर्फ वेतन के ही मद में एक लाख दो हजार करोड़ सालाना का बोझ बढ़ेगा। इसमें अकेले 28 हजार 450 करोड़ का बोझ सिर्फ रेलवे पर ही पड़ेगा। इस वेतन वृद्धि का दबाव राज्यों और सार्जजनिक निगमों पर कितना पड़ेगा, इसका अंदाजा राज्यों के कर्मचारियों की संख्या के चलते लगाया जा सकता है। साल 2009 के आंकड़ों के मुताबिक, सरकारी क्षेत्र के 8 करोड़ 70 लाख कर्मचारियों में से सिर्फ 33 लाख कर्मचारी केंद्र सरकार के हैं। जाहिर है कि बाकी कर्मचारी राज्यों के हैं या फिर सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्यों पर कितना बड़ा आर्थिक बोझ आने वाला है।याद कीजिए 2006 को। इसी वर्ष छठवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की गईं, जिससे केंद्र पर 22 हजार करोड़ रुपए का एक मुश्त बोझ बढ़ा था। केंद्रीय कर्मचारियों की तनख्वाहें अचानक  एक सीमा के पार चली गईं। केंद्र के कुल खर्च का 30 फीसदी अकेले वेतन मद में ही खर्च होने लगा।

सुबह सवेरे में