उमेश चतुर्वेदी
आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और आम आदमी की कार कही जाने वाली नैनो में कोई समानता हो सकती है भला ! अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और टाटा संस के चेयरमैन रतन टाटा में भी कोई तुलना कैसे की जा सकती है ? लेकिन नैनो पर राजनीति ने जिस तरह करवट बदली है – ऐसा ही हो रहा है। बुश ने तालिबान के खिलाफ लड़ाई छेड़ते वक्त कहा था कि आतंकवाद के खिलाफ उनका साथ दें। जो साथ देगा, वह आतंकवाद का विरोधी है, जो साथ नहीं देगा- उसे आतंकवाद का मददगार माना जाएगा। नैनो की राजनीति में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
सिंगूर से उठकर रतन टाटा साणंद पहुंच गए हैं। एक एम (ममता बनर्जी ) ने उन्हें परेशान किया तो दूसरे एम ( नरेंद्र मोदी ) ने उन्हें उबार लिया और एक एस ( सिंगूर ) से उठाकर दूसरे एस ( साणंद) को पहुंचा दिया। ममता से पीछा छुड़ाकर टाटा अब दूसरे मोदी की संगत में गदगद नजर आ रहे हैं। लेकिन संबंधों के बनाव-बिगाड़ के इस दौर में औद्योगीकरण के पक्ष और विपक्ष में चर्चाएं शुरू हो गई हैं। ठीक उसी तरह – जैसे आतंकवाद को लेकर जार्ज बुश ने कहा था। यानी अगर आप नैनो के पक्ष में हैं तो आप औद्योगीकरण और उद्योगों, गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन के सहयोगी है। अगर ऐसा नहीं है तो इसका मतलब साफ है कि आप उद्योगों और रोजगार की संभावनाओं के खिलाफ हैं। दिलचस्प बात ये है कि इस मसले पर उद्योग संगठनों से लेकर बीजेपी और वामपंथी- सभी एक समान राय रखते हैं। भारतीय लोकतंत्र में उलटबांसियों का खेल समझने के लिए ये उदाहरण भी मौजूं होगा। परमाणु करार के खिलाफ वाम और दक्षिण साथ हैं। अब नैनो को लेकर भी वाम और दक्षिण एक ही मंच पर नजर आ रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने नैनो को साणंद पहुंचाकर बाजी मार ली है। जाहिर है वे विजयी भाव से सियासी मैदान पर नजर फिरा रहे हैं। जबकि सिंगूर से नैनो के बाहर होने के बाद पश्चिम बंगाल के वामपंथी दल निराशा के गर्त में गोते लगाते नजर आ रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में रतन टाटा समेत उद्योगपतियों की भूमिका किनारे बैठ लहरों का आनंद लेने वाले शख्स की तरह है। टाटा समेत कुछ उद्योग संगठनों को लगता है कि अब पश्चिम बंगाल का भला होने से रहा। कहना ना होगा – उनके बैठाए इस डर ने पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को परेशान कर रखा है। मजदूरों के हितैषी दर्शन पर खड़ी मार्क्सवादी पार्टी की अब प्रमुख चिंता ये है कि उसकी छवि कहीं उद्योग विरोधी की न बन जाए। रतन टाटा को मार्क्सवादियों की ये दुविधा और डर पता है – लिहाजा वे इसे भरपूर तरीके से भुना रहे हैं। रतन टाटा देश के एक प्रमुख उद्योगपति हैं। जाहिर है, उद्योग संगठन उनका साथ देंगे ही और वे दे रहे हैं।
नैनो के समर्थन और नैनो विरोध की कसौटी पर किसी को कैसे कसा जा सकता है कि वह उद्योग का विरोधी या है या नहीं। मौजूदा माहौल में ममता बनर्जी कठगरे में खड़ी नजर आ रही हैं। उद्योग जगत उनकी ओर उंगली उठाए खड़ा है। अपनी उग्र राजनीति के लिए ममता वैसे ही राष्ट्रीय स्तर पर सवालों के केंद्र में रही हैं। लेकिन वे इतनी भी नौसिखुआ नहीं हैं कि उन्हें इस आंदोलन के इस हश्र का अंदाजा नहीं होगा। नैनो की सियासत के इस नतीजे का उन्हें अंदाजा हो गया था – तभी वे सोनिया गांधी और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी से मिलकर इस मसले के हल में मध्यस्थता करने की अपील की। गांधी ने भूमिका निभाई भी। दुर्गापुर हाइवे जाम करके कोलकाता की सब्जी-दूध सप्लाई लाइन को सफलतापूर्वक बाधित करने वाली ममता बनर्जी का खुद को बचाव वाले इस कदम पर टाटा की नजर थी। जो टाटा हर हाल में सिंगूर न छोड़ने का दावा करते रहे थे , उन्होंने पश्चिम बंगाल को टा-टा करने का मन बना लिया। फिर उद्योग समर्थकों के पलक-पांवड़े बिछाने की होड़ लग गई। उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात की इस होड़ में गुजरात ने बाजी मारी। अब ममता बनर्जी कठगरे में हैं और चुप हैं।
यहीं भारत के किसान आंदोलन की बिडंबना खुलकर सामने आ जाती है। इस देश में किसानों के हकों की बात करना इतना बड़ा गुनाह हो गया है कि आप उद्योग और रोजगार के विरोधी ठहरा दिए जाते हैं। सिंगूर के किसान भी उद्योगों के खिलाफ नहीं हैं। ममता बनर्जी ने किसानों की इसी आवाज को ताकत देने की कामयाब कोशिश की थी। किसानों की लड़ाई में साथ उतरीं महाश्वेता देवी और मेधा पाटकर भी उद्योगों की विरोधी नहीं रहीं। उनका सिर्फ इतना ही कहना था कि जिस जमीन के मालिक सदियों से किसान हैं – उनकी मर्जी के खिलाफ उनकी ही जमीन से बेदखल किया जाना गलत है। महाश्वेता देवी और मेधा पाटकर भी उसी दर्शन में भरोसा करती हैं – जिसमें पश्चिम बंगाल में सरकार चला रही सीपीएम का विश्वास है। इस आंदोलन में वामपंथी कार्यकर्ताओं के कोप का निशाना बन चुकीं मेधा पाटकर और महाश्वेता देवी ने सुझाव भी दिया था कि अगर उद्योगों के लिए जमीन चाहिए ही तो पश्चिम बंगाल में भी काफी बंजर भूमि है, उन्हें ही क्यों न लिया जाए। उस जमीन को लेने से किसानों के रोजी-रोजगार पर भी असर नहीं पड़ेगा और बंजर भूमि को उद्योगों के लिए उद्योगपति और सरकार मिलकर विकसित कर सकते हैं। लेकिन उद्योग और उदारीकरण के पक्ष में उठी लहर ने ये सोचने की ताकत उस वामपंथ से भी छीन ली है – जिसे कम से कम ऐसे मसलों पर सोचने वाला माना जाता रहा है।
महाराष्ट्र और दादरा नगर हवेली में अपनी संस्था वनराई के जरिए क्रांति लाने वाले पूर्व युवा तुर्क मोहन धारिया ने इन पंक्तियों के लेखक से एक बार देश में बेतहाशा तरीके से खुल रहे स्पेशल इकोनॉमिक जोन को लेकर चिंता जताई थी। उनका कहना था कि हमसे करीब ढाई गुना ज्यादा बड़े देश चीन में कुल पचहत्तर सेज हैं, जबकि अपने देश में चार सौ उन्नीस प्रस्ताव या तो मंजूर हो चुके हैं या वहां काम शुरू हो चुका है। इनमें से ज्यादातर सेज हरी-भरी उपजाऊ जमीनों पर ही बने हैं या बन रहे हैं। जिस तरह पिछले कुछ महीनों से खाद्यान्नों की महंगाई का सामना पूरी दुनिया कर रही है, उसमें उपजाऊ जगहों पर सेज विकसित किए जाने की प्रक्रिया पर ही सवाल उठ रहे हैं। इस सिलसिले में एक जबर्दस्त चुटकी पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु ने ली। उनका कहना था कि एक तरफ सरकार बंजर भूमि के विकास के लिए करोड़ों रूपए खर्च कर रही है और दूसरी तरफ उपजाऊ जमीन पर सेज बनाने के प्रस्तावों को मंजूरी दे रही है। अफसोस की बात ये है कि सिंगूर के बहाने किसानों ने जो सवाल उठाए थे, उसके जरिए किसानों के आंदोलन को एक नई दिशा दी जा सकती थी, उनके अधिकारों के बहाने देश में खाद्यान्न संकट को हल करने की दिशा में नई बहस हो सकती थी। जिसके मंथन से निकला वैचारिक मक्खन देश को नई दिशा देता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
सबसे बड़ा सवाल ये है कि देश का औद्योगीकरण किस कीमत पर हो, खाद्यान्न की कीमत पर..किसानों के हक की कीमत पर या फिर उद्योगपतियों की इच्छाओं की कीमत पर ...सिंगूर ने यही सवाल उठाने की कोशिश की थी। सिंगूर के किसानों की भी इच्छा रही होगी कि वे नैनो कार में सवारी करें। उनका भी सपना फ्लैट स्क्रीन टीवी और फोर जी तकनीक वाले फोन के उपयोग का रहा है। लेकिन क्या रोटी या भात की कीमत पर ये सपने ..ये इच्छाएं पूरी की जा सकती हैं। क्या पेट में रोटी के बिना इन फोन और कार की कोई वकत है..। सिंगूर ने विस्थापन पर भी सवाल उठाए हैं। विस्थापन के एवज में किसानों को कुछ मिले – इसका समर्थन कम से कम वह नहीं कर सकता , जिसने विस्थापन की पीड़ा झेली होगी। वैसे भी बंजर और रेतीली माटी वाले इलाके से विस्थापन का उतना दर्द नहीं होता – जितना रोटी और रोजी देने वाली जमीन को छोड़ते वक्त होता है। सिंगूर ने इन समस्याओं पर भी ध्यान खींचने की कोशिश की थी। लेकिन दुर्भाग्य ये कि देश नैनो के पक्ष और विपक्ष की राजनीति में ही अपना भविष्य देख रहा है।
Monday, October 13, 2008
Friday, October 3, 2008
नहीं बदली विदर्भ की तसवीर
यवतमाल से लौटकर उमेश चतुर्वेदी
विदर्भ में किसानों की हत्याओं के आंकड़ों ने 2004 के लोकसभा चुनावों की तसवीर बदलने में जबर्दस्त भूमिका निभाई थी। गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल कुल जमा 441 किसानों की मौत हुई थी। इसके ठीक पहले यानी साल 2003 में किशोर तिवारी और प्रकाश पोहरे जैसे सक्रिय कार्यकर्ताओं के मुताबिक 144 लोगों ने अपनी जान खेती के नाम कुरबान की थी। जिन्हें पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान सोनिया गांधी की सभाएं याद हैं – खासतौर पर विदर्भ और आंध्रप्रदेश के तेलंगाना की – वे एनडीए सरकार की किसान विरोधी नीतियों को कोसती रहीं। उनकी पूरी कोशिश वाजपेयी सरकार के फील गुड और इंडिया शाइनिंग के नारे की धज्जियां उड़ाने पर रहती थीं। विदर्भ और तेलंगाना के किसानों की आत्महत्याओं का मसला जोरदार तरीके से उठाकर अपनी कोशिश में वे कामयाब भी रहीं। वाजपेयी सरकार वापस नहीं लौट पाई और सोनिया गांधी की कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के हाथों में केद्रीय सत्ता आ गई। सोनिया के इस सफल अभियान से ही उन्हें संसद के ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल में त्यागमयी राजमाता की भूमिका निभाने का मौका मिला।
इस ऐतिहासिक दौर के बीते पांच साल होने को आ रहे हैं। वर्धा नदी में इन पांच साल में काफी पानी बह चुका है। लेकिन विदर्भ की हालत वैसी की वैसी ही है। बल्कि इन पांच सालों में आत्महत्याओं का आंकड़ा आशंका से भी कहीं ज्यादा बढ़ गया है। जब यूपीए सरकार ने सत्ता संभाली – विदर्भ में आत्महत्याओं में थोड़ी कमी जरूर आई। उस साल 431 लोगों ने अपनी जान देकर अपनी आर्थिक मुसीबतों से छुटकारा पाने का भयावह रास्ता अख्तियार किया। ये आंकड़ा विदर्भ जनअधिकार समिति के किशोर तिवारी का है। 2006 में ये आंकड़ा तीन गुना से भी ज्यादा 1500 हो गया। इस बीच प्रधानमंत्री के दौरे हुए। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने राहत के मद में 1730 करोड़ की सहायता योजना का ऐलान किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी विदर्भ की वादियों में घूमे और 630 करोड़ दे गए। इससे आत्महत्याओं की दर में कुछ कमी तो आई – लेकिन वह कमी भी भयावह हालात को दिखाने के लिए काफी रही। 2007 में 1243 लोगों ने आत्महत्याएं कीं। मौजूदा साल के बजट में वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने 72 हजार करोड़ के किसान कर्जे की माफी का ऐलान किया। लेकिन हालत ये है कि अब तक करबी 4100 लोग अपनी जान गवां चुके हैं।
विदर्भ का मामला परमाणु करार पर विश्वासमत पाने की कोशिश में जुटी केंद्र सरकार की बहस के दौरान फिर उछला। जब कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने यवतमाल जिले की दो महिलाओं कलावती और शशिकला की बदहाली की चर्चा की। जाखना गांव की कलावती के बहाने उन्होंने विदर्भ के किसानों की बदहाली का जिक्र किया तो पूरे देश का ध्यान उसकी ओर चला गया। सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक विंदेश्वर पाठक 2 अगस्त को उसे पच्चीस लाख रूपए की सहायता दे आए। दो सितंबर को यवतमाल जिले के सोनखास गांव की शशिकला भी उनसे फायदा पाने में कामयाब रही। इस सहायता ने विदर्भ में खानाबदोश जातियों के कमजोर और बदहाल लोगों की उम्मीदें बढ़ा दीं। 400 की जनसंख्या वाले सोनखास गांव के पचास झोपड़ों में से एक को फायदा मिला तो बाकी लोगों के आंखों में एक ही सवाल तैरने लगे। उन्हें सहायता क्यों नहीं ! बदहाली में वे भी जिंदगी गुजार रहे हैं। लेकिन इसका फायदा उन्हें क्यों नहीं मिलना चाहिए। आधे-अधूरे कपड़ों में बूढ़े-बूढ़ियों के साथ ही जवान – बच्चों का हुजूम वहां जुट गया। सबका विंदेश्वर पाठक से एक ही सवाल था- सहायता हमें भी चाहिए। दिल्ली से गए संवाददाताओं के पास लोगों की अर्जियां जुटने लगीं। किसी के बच्चे का एक्सीडेंट में हाथ काटना पड़ा तो किसी को आंख से दिखाई नहीं देता और सबको सहायता चाहिए। विंदेश्वर पाठक को ऐसी परिस्थितियों में हाथ तो खड़ा करना ही था। उन्होंने खड़ा कर दिया कि वे कितने लोगों को सहायता दे सकते हैं। लगे हाथों उन्होंने सुझाव भी दे डाला कि नागपुर बढ़ते हुए करोड़पतियों का शहर है। मुंबई में 110 खरबपति रहते हैं। सभी एक-एक दो परिवारों को गोद ले लें- समस्या का समाधान हो जाएगा। पता नहीं यवतमाल से उठी ये आवाज मुंबई और 115 किलोमीटर दूर नागपुर में कितने कानों तक पहुंची।
कलावती और शशिकला को फायदा तो मिल गया, क्योंकि उनकी झोपड़ी में रोड शो करते हुए राहुल गांधी पहुंच गए थे। लेकिन विदर्भ में हजारों लोग परेशान हैं। कर्जे में डूबे हुए हैं। ये संभव नहीं है कि सभी बदहाल झोपड़ियों में राहुल गांधी पहुंचे और उनकी बदहाली दूर करने के लिए कोई सुलभ इंटरनेशनल पहुंच जाए। अगर राहुल गांधी सभी झोपड़ियों में पहुंचने भी लगें तो बाजार अर्थव्यवस्था का कोई नुमाइंदा उन झोपड़ियों में दो या तीन लाख का चेक देने के लिए आने से रहा। (विंदेश्वर पाठक ने इतनी ही रकम शशिकला और कलावती को दी है।)
झोपड़ियों में जाकर चुनावी तैयारियों के लिए जनसमर्थन तो जुटाया जा सकता है। लेकिन हजारों-लाखों लोगों की समस्या का समाधान मुकम्मल रणनीति के तहत नीतियों में बदलाव लाकर - फिर उसे सही तरीके तक गांवों के स्तर तक पहुंचा कर ही किया जा सकता है। लेकिन विदर्भ में जो हालात हैं – उसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि हालात बदले हैं। बहुत कम लोगों को पता होगा कि 1923 में अंग्रेजों ने जिस रेलवे लाइन का दोहरीकरण किया था – वह मुंबई – नागपुर रेलवे लाइन ही थी। इसकी वजह ये थी कि विदर्भ में उन दिनों दुनिया का बेहतरीन कपास पैदा होता था और उसे मुंबई बंदरगाह तक पहुंचने में देर न हो, इसलिए दो ट्रैक बनाए गए। मुंबई से ये कपास मानचेस्टर की सूती मिलों तक पहुंचाया जाता था। डंकेल प्रस्तावों के लागू होने के बाद तक यहां का कपास किसान उगाते थे और खुद बेचते थे। तब खेती की लागत कम होती थी। किसान अपना बीज खुद संरक्षित करते थे, उन बीजों से पैदा फसल में ज्यादा रासायनिक खाद और कीटनाशक का उपयोग नहीं होता था। लेकिन जब से बीटी कॉटन का दौर शुरू हुआ है – हर साल किसान को हजारों रूपए बीज में खर्च करने पड़ रहे हैं। इस बीज से उगी फसल को बचाने के लिए कीटनाशकों और रासायनिक खादों का भरपूर इस्तेमाल करना पड़ता है। किसानों के लिए संघर्षरत वरिष्ठ कार्यकर्ता विजय जावंधिया और किशोर तिवारी के मुताबिक इससे प्रति हेक्टेयर किसान की लागत करीब सात हजार रूपए पड़ रही है। इस फसल से सूंडी कीड़े भारी संख्या में पैदा होते हैं और उन्हें बचाने के लिए कीटनाशकों पर काफी खर्च करना पड़ रहा है। इसके लिए वे साल दर साल बैंकों से कहीं ज्यादा सूदखोरों से कर्ज लेने को मजबूर हैं। किशोर तिवारी के मुताबिक अकेले विदर्भ में बीजों का कारोबार 12 हजार करोड़ को पार कर गया है। यानी ये सारा पैसा मोनसेंटो जैसी अमेरिकी कंपनियों के खाते में जा रहा है। यहां ये ध्यान देने की जरूरत है कि विदर्भ की पूरी खेती वर्षा के पानी पर निर्भर है। अगर बारिश ना हुई तो सारी लागत गई सूखे में।
सूदखोर के यहां पैसा लगातार बढ़ते ही जाना है। ये हालत उन किसानों की है – जो रसूखदार और अच्छी-खासी जमीन के मालिक हैं। जिस कलावती का दलित महिला के तौर पर राहुल गांधी ने संसद में जिक्र करके कांग्रेस जनों की वाहवाही पाई- वह कोई दलित नहीं, बल्कि स्थानीय नंदुबार जैसी दबंग और रसूखदार जाति की महिला है।
कोसी की बाढ़ ने इन दिनों देश का ध्यान बंटा रखा है। नागपुर में किसानों की समस्याओं पर 3 सितंबर को हुए एक सम्मेलन में ये सवाल उठा कि इस बदहाली के बाद भी कोसी इलाके से शायद ही कोई आत्महत्या की खबर सामने आए। आखिर क्या वजह है कि कोसी या पूर्वी उत्तर प्रदेश की बदहाली के बीच से भी आत्महत्या की शायद ही कोई खबर आती है- जबकि विदर्भ ऐसी अशुभ खबरों से भरा हुआ है। इसकी वजह है – विदर्भ में नगदी फसल की खेती। वहां अनाज उत्पादन की बजाय लोग कपास जैसी कमाई वाली फसल पर ज्यादा निर्भर हैं। अब लोग कपास से मुड़े भी हैं तो उनका ध्यान सूरजमुखी की खेती पर आ टिका है। विदर्भ में सिंचाई की मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। लिहाजा पूरी की पूरी खेती आसमानी कृपा पर है। आसमान की कृपा हुई तो समझो वारा-न्यारा। नहीं हुई तो भुखमरी की हालत। ऐसी हालत में मजदूरी पर जिंदगी गुजारने वाले लोगों को काम नहीं मिल पाता। अन्न उत्पादन वाले इलाके में मजदूरों को नगदी और ज्यादा मजदूरी नहीं मिलती – लेकिन मजदूरी के तौर पर खाने के लिए अनाज जरूर मिल जाता है। जिससे समाज के कमजोर तबके को भी भुखमरी का सामना नहीं करना पड़ता है।
आज राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना यानी नरेगा की बड़ी चर्चा है। कांग्रेस की अगुआई वाली केंद्र सरकार और जुलाई के पहले तक उसे समर्थन दे रहे वामपंथी दल इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर गिनाते रहे हैं। साल के कम से कम एक सौ दिनों तक मजदूर परिवारों को 100 रूपए रोजाना की दर से काम देने का वायदा इसी योजना में शामिल है। केंद्र सरकार के अपनाए जाने के पहले महाराष्ट्र ही पहला राज्य था, जिसने इस नीति की शुरूआत की थी। लेकिन हकीकत ये है कि नरेगा के तहत महाराष्ट्र में भी काम नहीं मिल रहा है। लगातार तीन साल से विदर्भ सूखे का सामना कर रहा है। लेकिन वहां नरेगा के तहत काम कम हो रहा है। शशिकला के गांव यवतमाल जिले के सोनखास में लोगों ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि एक तो काम हो नहीं रहा है। अगर हो रहा है तो उन्हें मजदूरी के तौर पर सिर्फ तीस रूपए दिए जा रहे हैं। ऐसे में उनका काम कैसे चलेगा। अगर लोगों के इस आरोप में दम है तो विलासराव देशमुख सरकार को इसका जवाब भारी पड़ेगा।
Thursday, October 2, 2008
आजमगढ़ : और भी पहचान है मेरी .....
उमेश चतुर्वेदी
1974 के मार्च महीने की एक तारीख...पटना जाने वाली तमाम रेलगाड़ियां निरस्त कर दी गई हैं। 18 मार्च 1974 को नौजवानों ने पटना विधानसभा के घेराव का ऐलान कर रखा है। इसकी अगुआई जेपी को करनी है। घेराव को नाकामयाब बनाने के लिए बिहार के साथ ही केंद्र सरकार भी जुट गई है। इस घेराव में तब का एक क्रांतिकारी समाजवादी नेता भी शामिल होने को तैयार है। किसी तरह वाराणसी पहुंच गया है। रेलगाड़ियां बंद कर दी गई हैं। इसी बीच पता चलता है कि कोई रेलगाड़ी मुगलसराय होते हुए पटना जा रही है। क्रांतिकारी नेता पर पुलिस की निगाह है। उसके गिरफ्तार होने का खतरा है। लिहाजा काशीहिंदू विश्वविद्यालय के कुछ छात्र नेता रणनीति बनाते हैं। तय होता है कि ये नेता बुनकर के तौर पर जाएगा। लुंगी कुर्ता और गोलटोपी पहने कुछ लोगों का एक ग्रुप वाराणसी के काशी स्टेशन पर पहुंचता है। पुलिस होने के बावजूद ये नेता अपने हाथों बुनी साड़ियों का बंडल लिए ट्रेन में सवार हो जाता है।
18 मार्च 1974 को पटना में जो हुआ – अब इतिहास है। इसी घेराव में इनकम टैक्स चौराहे पर जेपी पर पुलिस ने जमकर लाठियां बरसाईं। इन लाठियों की धमक इतनी दूर तक सुनाई दी कि इंदिरा गांधी की सर्वशक्तिमान सरकार हिल गई। यहां अब बता देना जरूरी है कि बुनकर के भेष में पटना गए वे नेता थे जार्ज फर्नांडिस और उन्हें स्टेशन पर चढ़ाने आए थे आज के कांग्रेस के प्रवक्ता मोहन प्रकाश। जो तब बीएचयू छात्रसंघ के प्रभावी नेता थे। जिन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश की खाक छानी है – उन्हें पता है कि आजमगढ़ से लेकर मऊ तक पहले हथकरघे का जाल बिछा हुआ था। गांव-गांव में दरी, चादर और गमछे के साथ ही बनारसी साड़ियां बुनीं जाती थीं। इन्हें लेकर एक खास ड्रेस में लोग गांव-गांव बेचने के लिए निकलते थे। तब उन पर कोई सवाल नहीं उठाता था। लेकिन इसी आजमगढ़ के सरायमीर के अबू सलेम की अपराध की दुनिया में चर्चा क्या बढ़ी – पूरा आजमगढ़ अपराधियों और आतंकवाद का गढ़ नजर आने लगा है।
लेकिन आजमगढ़ की यही पहचान नहीं है। आज राष्ट्रीय क्षितिज पर जब भी हिंदू-मुस्लिम समभाव की बात की जाती है – इस्लाम के विद्वान के तौर पर मौलाना वहीदुद्दीन खान के बिना पूरी नहीं होती। वे वहीदुद्दीन साहब भी इसी आजमगढ़ में पले – बढ़े हैं। कैफी आजमी ने उर्दू शायरी की दुनिया में जो नए प्रतिमान खड़े किए, सिनेमा के गीतों को नया अंदाज दिया – वे इसी आजमगढ़ के मेजवां से निकले थे। चंद सिरफिरों के चलते आज आजमगढ़ की एक पूरी पीढ़ी को देशद्रोही और आतंकवादी का तमगा दिया जा रहा है – ऐसे लोगों को जानकर हैरत होगी कि कैफी आजमी ने अपनी जिंदगी के आखिरी साल अपनी माटी – अपनी हवा के बीच मेजवां में ही गुजारे। जबकि देश के सपनीले शहर मुंबई में उनके पास जिंदगी के वे सारे साजोसामान मौजूद थे – जिसकी खोज में आज हर कोई हलकान हुए जा रहा है। और एक बार हासिल होते ही वह अपनी माटी की महक को भूल जाना चाहता है। कैफी उन लोगों में से नहीं थे।
आज हैरी पोटर की लेखिका जेके रॉलिंग की दुनिया में खासी चर्चा है। बच्चों की लेखिका के तौर पर विख्यात रॉलिंग को जानने वालों की कमी नहीं है। लेकिन कितने लोगों को सनीमासीन खान का नाम पता है। बच्चों के लेखक के तौर पर दुनिया भर में विख्यात इस लेखक की कृतियां मलय, पश्तो, अरबी से लेकर तमाम पश्चिमी भाषाओं में हो चुका है। मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाला शायद ही कोई देश हो – जहां खान की किताबों की प्रदर्शनी ना लगी हो।
आजमगढ़ की स्थापना 1665 में एक दबंग जमींदार आजमखान ने की थी। दिलचस्प बात ये है कि यह एक हिंदू जमींदार की मुस्लिम पत्नी का बेटा था। इतिहासकारों के मुताबिक विक्रमजीत गौतम राजपूत था। मेहनगर की मुस्लिम पत्नी से उसके दो बच्चे थे। दूसरे बच्चे अजमत ने किला बनाया। जो आज भी आजमगढ़ में अजमत के किले के तौर पर विख्यात है। हिंदू पिता और मुस्लिम पत्नी की संतान आजमगढ़ में दंगों का कोई गहरा इतिहास नहीं रहा है। दोनों परिवारों का ही संस्कार था कि यहां गंगजमुनी संस्कृति की धारा लगातार बहती रही। आजमगढ़ में राष्ट्रवाद किस कदर हिलोरें ले रहा था – इसकी मिसाल 1857 का संग्राम भी है। आजमगढ़ की धरती पर ही वीर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। इसी दौर में यहां एक बड़े इस्लामिक विद्वान शिबली नोमानी ने यहां की धरती के जरिए इस्लामिक दुनिया में अमिट छाप छोड़ी। सर सैय्यद अहमद खां के कभी सहयोगी रहे शिबली नोमानी इतिहास, इस्लाम, दर्शन और सूफीवाद के मशहूर मर्मज्ञ थे। उन्होंने मक्का तक हज की यात्रा की और मोहम्मद साहब से जुड़ी चीजों का संग्रह किया। इसे वे भले ही नहीं लिख पाए – लेकिन बाद में उनके उत्तराधिकारी सैय्यद सुलेमान नदवी ने लिखा। जिसे इस्लाम की दुनिया में आज भी खासे आदर के साथ लिया जाता है। शिबली के योगदान को आजमगढ़ ने आज भी शिबली कॉलेज के रूप में शिद्दत से याद रखा है। आजमगढ़ में उच्च शिक्षा के इस अहम केंद्र में ना सिर्फ मुस्लिम – बल्कि हिंदू छात्र भी अपना भविष्य संवारने का काम कर रहे हैं। शिबली की ही देन है कि आजमगढ़ कभी शिया शिक्षा का अहम केंद्र हुआ करता था। यहां दुनिया भर से लोग इस्लाम की शिया तहजीब का अध्ययन करने आते थे। इस धरती ने अमीन अहसान इस्लाही और जफरूल इस्लाम जैसे इस्लाम के जाने-माने विद्वान भी पैदा किए हैं तो इतिहासकारों की पंक्ति में आदर के साथ लिया जाने वाला नाम इश्तियाक अहमद जिल्दी भी यहीं के हैं और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। इसी धरती के सपूत सम्सुर्रहमान फारूकी को भी भूलना कठिन है।
13 सितंबर के दिल्ली बम धमाकों के बाद आजमगढ़ एक बार फिर पूरी दुनिया की नजर में आ गया है। पिछले कुछ साल से आजमगढ़ की पहचान के प्रतीक बने हैं माफिया सरगना अबू सलेम। जयपुर और अहमदाबाद धमाके के मास्टरमाइंड के तौर पर जब से अबू बशर की गिरफ्तारी हुई है – पहचान की ये धारा और पुख्ता हुई। रही- सही कसर 13 सितंबर के धमाके में मारे गए आतिफ और साजिद के साथ ही सैफ की गिरफ्तारी ने पूरी कर दी है। इसके बाद आजमगढ़ को सिर्फ और सिर्फ आतंकवादियों के गढ़ के तौर पर पहचान दी गई है। यहां के ब्लैक पॉट्री नाम से दुनियाभर में मशहूर उर्दू पुस्तकालय के उल्लेख के बिना तो ये चर्चा अधूरी रहेगी। माना जाता है कि उर्दू अदीब की दुनिया में इस पुस्तकालय को काफी आदर के साथ देखा जाता है।
हिंदी के पहले महाकाव्य रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध’ का नाम तो सभी जानते हैं। लेकिन इसी धरती के श्यामनारायण पांडे थे – जिन्होंने महाराणा प्रताप और अकबर के युद्ध को विषय बनाकर हल्दीघाटी नामक खंडकाव्य लिखा। राणा प्रताप के घोड़े चेतक का जो वर्णन उन्होंने किया है – उसे पढ़कर आज भी रोमांच हो जाता है। आजमगढ़ के मेंहनगर के विसहम में दाऊद इब्राहिम की रिश्तेदारी की जमकर चर्चा हो रही है। हाजी मस्तान की रिश्तेदारी को लेकर भी आजमगढ़ चर्चा में है। लेकिन लोग ये भूल गए हैं कि इसी जिले में हरिहरपुर नाम का एक ब्राह्मणबहुल गांव है – जहां तबला सम्राट गुदई महाराज की ससुराल थी। दूसरे तबला उस्ताद किशन महाराज और ठुमरी की विख्यात गायिका गिरिजा देवी की भी रिश्तेदारी इस गांव में है। आजमगढ़ में कला और संस्कृति की ये धारा ही रही है कि लोग फिल्म और टेलीविजन की दुनिया में भी जमकर नाम और दाम कमा रहे हैं। जीटीवी के मशहूर रियलिटी शो सारेगामापा के प्रोड्यूसर गजेंद्र सिंह और फिल्म निर्देशक राजेश सिंह भी इसी धरती के वासी हैं। राहुल सांकृत्यायन इसी जिले के पंदह के निवासी थे। जिनके दर्शन-दिग्दर्शन का लोहा पूरी दुनिया ने माना।
टाटा की नैनो कार को लेकर उत्सुकता अभी थमी नहीं है। पश्चिम बंगाल के सिंगूर से लेकर उत्तरांचल के पंतनगर तक इस कार की चर्चा है। लेकिन कितने लोगों को पता है कि आजमगढ़ के सत्रह साल के एक बच्चे चंदन ने दो सीटों वाली कार पहले ही बना ली है। जो एक लीटर पेट्रोल में चालीस किलोमीटर तक चल सकती है।
आजमगढ़ की इस गड्डमड्ड होती पहचान पर सबसे बेहतरीन टिप्पणी आतंकवाद से लोहा लेते रहे बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह की है। प्रकाश सिंह इसी धरती के बेटे हैं। उनका कहना है कि सरायमीर, निजामाबाद, खैराबाद, मुबारकपुर, बिलरियागंज, मोहम्मद खान और अतरौलिया से हजारों बच्चे दिल्ली, मुंबई, अलीगढ़, हैदराबाद और लखनऊ में पढ़ाई के साथ ही रोजी-रोजगार के लिए गए हैं। देश विरोधी ताकतें उन्हें बहका सकती हैं। लेकिन इसका माकूल जवाब इस पूरे इलाके को बदनाम करने की बजाय ऐसे मुकम्मल इंतजाम होने चाहिए – ताकि यहां के बच्चे बहकावे में आकर देशविरोधी ताकतों के हाथों का खिलौना ना बनें।
ये काम आजमगढ़ की मूल पहचान को बिगाड़कर तो नहीं ही किया जाना चाहिए। अन्यथा इससे जो नुकसान होगा – उसकी तासीर दूर और देर तक महसूस की जाती रहेगी।
1974 के मार्च महीने की एक तारीख...पटना जाने वाली तमाम रेलगाड़ियां निरस्त कर दी गई हैं। 18 मार्च 1974 को नौजवानों ने पटना विधानसभा के घेराव का ऐलान कर रखा है। इसकी अगुआई जेपी को करनी है। घेराव को नाकामयाब बनाने के लिए बिहार के साथ ही केंद्र सरकार भी जुट गई है। इस घेराव में तब का एक क्रांतिकारी समाजवादी नेता भी शामिल होने को तैयार है। किसी तरह वाराणसी पहुंच गया है। रेलगाड़ियां बंद कर दी गई हैं। इसी बीच पता चलता है कि कोई रेलगाड़ी मुगलसराय होते हुए पटना जा रही है। क्रांतिकारी नेता पर पुलिस की निगाह है। उसके गिरफ्तार होने का खतरा है। लिहाजा काशीहिंदू विश्वविद्यालय के कुछ छात्र नेता रणनीति बनाते हैं। तय होता है कि ये नेता बुनकर के तौर पर जाएगा। लुंगी कुर्ता और गोलटोपी पहने कुछ लोगों का एक ग्रुप वाराणसी के काशी स्टेशन पर पहुंचता है। पुलिस होने के बावजूद ये नेता अपने हाथों बुनी साड़ियों का बंडल लिए ट्रेन में सवार हो जाता है।
18 मार्च 1974 को पटना में जो हुआ – अब इतिहास है। इसी घेराव में इनकम टैक्स चौराहे पर जेपी पर पुलिस ने जमकर लाठियां बरसाईं। इन लाठियों की धमक इतनी दूर तक सुनाई दी कि इंदिरा गांधी की सर्वशक्तिमान सरकार हिल गई। यहां अब बता देना जरूरी है कि बुनकर के भेष में पटना गए वे नेता थे जार्ज फर्नांडिस और उन्हें स्टेशन पर चढ़ाने आए थे आज के कांग्रेस के प्रवक्ता मोहन प्रकाश। जो तब बीएचयू छात्रसंघ के प्रभावी नेता थे। जिन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेश की खाक छानी है – उन्हें पता है कि आजमगढ़ से लेकर मऊ तक पहले हथकरघे का जाल बिछा हुआ था। गांव-गांव में दरी, चादर और गमछे के साथ ही बनारसी साड़ियां बुनीं जाती थीं। इन्हें लेकर एक खास ड्रेस में लोग गांव-गांव बेचने के लिए निकलते थे। तब उन पर कोई सवाल नहीं उठाता था। लेकिन इसी आजमगढ़ के सरायमीर के अबू सलेम की अपराध की दुनिया में चर्चा क्या बढ़ी – पूरा आजमगढ़ अपराधियों और आतंकवाद का गढ़ नजर आने लगा है।
लेकिन आजमगढ़ की यही पहचान नहीं है। आज राष्ट्रीय क्षितिज पर जब भी हिंदू-मुस्लिम समभाव की बात की जाती है – इस्लाम के विद्वान के तौर पर मौलाना वहीदुद्दीन खान के बिना पूरी नहीं होती। वे वहीदुद्दीन साहब भी इसी आजमगढ़ में पले – बढ़े हैं। कैफी आजमी ने उर्दू शायरी की दुनिया में जो नए प्रतिमान खड़े किए, सिनेमा के गीतों को नया अंदाज दिया – वे इसी आजमगढ़ के मेजवां से निकले थे। चंद सिरफिरों के चलते आज आजमगढ़ की एक पूरी पीढ़ी को देशद्रोही और आतंकवादी का तमगा दिया जा रहा है – ऐसे लोगों को जानकर हैरत होगी कि कैफी आजमी ने अपनी जिंदगी के आखिरी साल अपनी माटी – अपनी हवा के बीच मेजवां में ही गुजारे। जबकि देश के सपनीले शहर मुंबई में उनके पास जिंदगी के वे सारे साजोसामान मौजूद थे – जिसकी खोज में आज हर कोई हलकान हुए जा रहा है। और एक बार हासिल होते ही वह अपनी माटी की महक को भूल जाना चाहता है। कैफी उन लोगों में से नहीं थे।
आज हैरी पोटर की लेखिका जेके रॉलिंग की दुनिया में खासी चर्चा है। बच्चों की लेखिका के तौर पर विख्यात रॉलिंग को जानने वालों की कमी नहीं है। लेकिन कितने लोगों को सनीमासीन खान का नाम पता है। बच्चों के लेखक के तौर पर दुनिया भर में विख्यात इस लेखक की कृतियां मलय, पश्तो, अरबी से लेकर तमाम पश्चिमी भाषाओं में हो चुका है। मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाला शायद ही कोई देश हो – जहां खान की किताबों की प्रदर्शनी ना लगी हो।
आजमगढ़ की स्थापना 1665 में एक दबंग जमींदार आजमखान ने की थी। दिलचस्प बात ये है कि यह एक हिंदू जमींदार की मुस्लिम पत्नी का बेटा था। इतिहासकारों के मुताबिक विक्रमजीत गौतम राजपूत था। मेहनगर की मुस्लिम पत्नी से उसके दो बच्चे थे। दूसरे बच्चे अजमत ने किला बनाया। जो आज भी आजमगढ़ में अजमत के किले के तौर पर विख्यात है। हिंदू पिता और मुस्लिम पत्नी की संतान आजमगढ़ में दंगों का कोई गहरा इतिहास नहीं रहा है। दोनों परिवारों का ही संस्कार था कि यहां गंगजमुनी संस्कृति की धारा लगातार बहती रही। आजमगढ़ में राष्ट्रवाद किस कदर हिलोरें ले रहा था – इसकी मिसाल 1857 का संग्राम भी है। आजमगढ़ की धरती पर ही वीर कुंवर सिंह ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। इसी दौर में यहां एक बड़े इस्लामिक विद्वान शिबली नोमानी ने यहां की धरती के जरिए इस्लामिक दुनिया में अमिट छाप छोड़ी। सर सैय्यद अहमद खां के कभी सहयोगी रहे शिबली नोमानी इतिहास, इस्लाम, दर्शन और सूफीवाद के मशहूर मर्मज्ञ थे। उन्होंने मक्का तक हज की यात्रा की और मोहम्मद साहब से जुड़ी चीजों का संग्रह किया। इसे वे भले ही नहीं लिख पाए – लेकिन बाद में उनके उत्तराधिकारी सैय्यद सुलेमान नदवी ने लिखा। जिसे इस्लाम की दुनिया में आज भी खासे आदर के साथ लिया जाता है। शिबली के योगदान को आजमगढ़ ने आज भी शिबली कॉलेज के रूप में शिद्दत से याद रखा है। आजमगढ़ में उच्च शिक्षा के इस अहम केंद्र में ना सिर्फ मुस्लिम – बल्कि हिंदू छात्र भी अपना भविष्य संवारने का काम कर रहे हैं। शिबली की ही देन है कि आजमगढ़ कभी शिया शिक्षा का अहम केंद्र हुआ करता था। यहां दुनिया भर से लोग इस्लाम की शिया तहजीब का अध्ययन करने आते थे। इस धरती ने अमीन अहसान इस्लाही और जफरूल इस्लाम जैसे इस्लाम के जाने-माने विद्वान भी पैदा किए हैं तो इतिहासकारों की पंक्ति में आदर के साथ लिया जाने वाला नाम इश्तियाक अहमद जिल्दी भी यहीं के हैं और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे हैं। इसी धरती के सपूत सम्सुर्रहमान फारूकी को भी भूलना कठिन है।
13 सितंबर के दिल्ली बम धमाकों के बाद आजमगढ़ एक बार फिर पूरी दुनिया की नजर में आ गया है। पिछले कुछ साल से आजमगढ़ की पहचान के प्रतीक बने हैं माफिया सरगना अबू सलेम। जयपुर और अहमदाबाद धमाके के मास्टरमाइंड के तौर पर जब से अबू बशर की गिरफ्तारी हुई है – पहचान की ये धारा और पुख्ता हुई। रही- सही कसर 13 सितंबर के धमाके में मारे गए आतिफ और साजिद के साथ ही सैफ की गिरफ्तारी ने पूरी कर दी है। इसके बाद आजमगढ़ को सिर्फ और सिर्फ आतंकवादियों के गढ़ के तौर पर पहचान दी गई है। यहां के ब्लैक पॉट्री नाम से दुनियाभर में मशहूर उर्दू पुस्तकालय के उल्लेख के बिना तो ये चर्चा अधूरी रहेगी। माना जाता है कि उर्दू अदीब की दुनिया में इस पुस्तकालय को काफी आदर के साथ देखा जाता है।
हिंदी के पहले महाकाव्य रचयिता अयोध्या सिंह उपाध्याय ’हरिऔध’ का नाम तो सभी जानते हैं। लेकिन इसी धरती के श्यामनारायण पांडे थे – जिन्होंने महाराणा प्रताप और अकबर के युद्ध को विषय बनाकर हल्दीघाटी नामक खंडकाव्य लिखा। राणा प्रताप के घोड़े चेतक का जो वर्णन उन्होंने किया है – उसे पढ़कर आज भी रोमांच हो जाता है। आजमगढ़ के मेंहनगर के विसहम में दाऊद इब्राहिम की रिश्तेदारी की जमकर चर्चा हो रही है। हाजी मस्तान की रिश्तेदारी को लेकर भी आजमगढ़ चर्चा में है। लेकिन लोग ये भूल गए हैं कि इसी जिले में हरिहरपुर नाम का एक ब्राह्मणबहुल गांव है – जहां तबला सम्राट गुदई महाराज की ससुराल थी। दूसरे तबला उस्ताद किशन महाराज और ठुमरी की विख्यात गायिका गिरिजा देवी की भी रिश्तेदारी इस गांव में है। आजमगढ़ में कला और संस्कृति की ये धारा ही रही है कि लोग फिल्म और टेलीविजन की दुनिया में भी जमकर नाम और दाम कमा रहे हैं। जीटीवी के मशहूर रियलिटी शो सारेगामापा के प्रोड्यूसर गजेंद्र सिंह और फिल्म निर्देशक राजेश सिंह भी इसी धरती के वासी हैं। राहुल सांकृत्यायन इसी जिले के पंदह के निवासी थे। जिनके दर्शन-दिग्दर्शन का लोहा पूरी दुनिया ने माना।
टाटा की नैनो कार को लेकर उत्सुकता अभी थमी नहीं है। पश्चिम बंगाल के सिंगूर से लेकर उत्तरांचल के पंतनगर तक इस कार की चर्चा है। लेकिन कितने लोगों को पता है कि आजमगढ़ के सत्रह साल के एक बच्चे चंदन ने दो सीटों वाली कार पहले ही बना ली है। जो एक लीटर पेट्रोल में चालीस किलोमीटर तक चल सकती है।
आजमगढ़ की इस गड्डमड्ड होती पहचान पर सबसे बेहतरीन टिप्पणी आतंकवाद से लोहा लेते रहे बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक प्रकाश सिंह की है। प्रकाश सिंह इसी धरती के बेटे हैं। उनका कहना है कि सरायमीर, निजामाबाद, खैराबाद, मुबारकपुर, बिलरियागंज, मोहम्मद खान और अतरौलिया से हजारों बच्चे दिल्ली, मुंबई, अलीगढ़, हैदराबाद और लखनऊ में पढ़ाई के साथ ही रोजी-रोजगार के लिए गए हैं। देश विरोधी ताकतें उन्हें बहका सकती हैं। लेकिन इसका माकूल जवाब इस पूरे इलाके को बदनाम करने की बजाय ऐसे मुकम्मल इंतजाम होने चाहिए – ताकि यहां के बच्चे बहकावे में आकर देशविरोधी ताकतों के हाथों का खिलौना ना बनें।
ये काम आजमगढ़ की मूल पहचान को बिगाड़कर तो नहीं ही किया जाना चाहिए। अन्यथा इससे जो नुकसान होगा – उसकी तासीर दूर और देर तक महसूस की जाती रहेगी।
Wednesday, September 24, 2008
दर्डा जी ये आपको क्या हुआ ......


यह लेख देखिए और विचार कीजिए
नरसिंह राव की सरकार ने जब सांसद विकास निधि की शुरूआत की थी, तभी जानकारों ने इसकी सफलता पर सवाल उठाए थे। समाजशास्त्रियों और राजनीति के जानकारों के साथ ही पत्रकारों के एक तबके का मानना था कि इससे लूट-खसोट की राजनीति बढ़ेगी। राजनीतिक जीवन में अपनी सांसद निधि का सही तरीके से इस्तेमाल करने का मामला बहुत कम ही मिला है। इन पंक्तियों के लेखक को एक पूर्व सांसद के बारे में जानकारी है कि उन्होंने अपनी सांसद विकास निधि का सही तरीके से इस्तेमाल किया। ये पूर्व सांसद हैं नागेंद्र ओझा। ओझा जी सीपीआई के कार्यकर्ता हैं और बिहार से सांसद थे। विकास निधि को लेकर उनकी बेहतर व्यवस्था ही है कि नजमा हेपतुल्ला और जीएमसी बालयोगी तक को उनकी प्रशंसा करनी पड़ी थी।
ये सब जानते हैं कि सांसद विकास निधि सांसद के हाथ में एक मजबूत हथियार है। इस निधि के जरिए सांसद जहां अपने लोगों को उपकृत करते हैं – वहीं अपने मनमाफिक ठेकेदारों से ही काम कराने के लिए जिला प्रशासन पर दबाव डालते हैं। जिला प्रशासन भी बदले में अपना कमीशन लेकर खुश रहता है। इस पर कभी उंगली नहीं उठती और बात आई-गई हो जाती है। लेकिन अब ऐसे सांसदों के लिए खतरे की घंटी बज उठी है।
महाराष्ट्र से मराठी का एक बड़ा अखबार निकलता है। लोकमत नाम का ये अखबार मराठी का नंबर वन अखबार है। इसके तकरीबन 12 संस्करण हैं। इसके साथ ही उनका लोकमत समाचार नाम से हिंदी में तीन संस्करणों वाला अखबार भी निकलता है। अंग्रेजी में लोकमत टाइम्स अलग से है। लोकमत ग्रुप का मुख्यालय नागपुर में है और इसके मुखिया विजय दर्डा हैं। विजय दर्डा के पिता जवाहर लाल दर्डा कांग्रेस के नेता थे। जाहिर है विजय दर्डा और उनके भाई राजेंद्र दर्डा को राजनीति विरासत में मिली है। राजेंद्र दर्डा जहां महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं – वहीं विजय दर्डा पिछले कई साल से राज्यसभा में कांग्रेस की नुमाइंदगी कर रहे हैं। अरबों रूपए के टर्नओवर वाली कंपनी के मालिक विजय दर्डा ने वह काम कर दिखाया है - जिसके लिए जग हंसाई हो रही है। दर्डा परिवार कर्ज से पार ना पा सके किसानों की आत्महत्याओं वाले जिले यवतमाल का निवासी है। यवतमाल में उनके कई कॉलेज, स्कूल और तमाम दूसरी तरह की संस्थाएं हैं। दर्डा परिवार यवतमाल- वर्धा रोड पर अंग्रेजी माध्यम का एक स्कूल वीना देवी दर्डा इंग्लिश मीडियम स्कूल चलाता है। सांसद निधि से भले ही आम जनता को सहयोग देने का प्रावधान हो- लेकिन अरबपति विजय दर्डा ने अपने ही इस स्कूल को 34 लाख 53 हजार रूपए अवैधानिक तरीके से दे डाले। इतना ही नहीं स्कूल के लिए 76172 स्क्वायर यार्ड जमीन ली गई, वह भी अवैध है। मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के आदेश के बाद यवतमाल के एसपी ने जो रिपोर्ट दी है – उसमें साफ लिखा है कि एसडीओ यवतमाल ने इस जमीन को अवैधानिक तरीके से गैर कृषि कार्यों में इस्तेमाल की अनुमति दी थी। नागपुर हाईकोर्ट ने इस पैसे की वसूली का आदेश दिया है। जिस पर अमल की कार्यवाही केंद्रीय कार्यक्रम कार्यान्वयन एवं सांख्यिकी मंत्रालय ने शुरू कर दी है।
ये मामला सामने नहीं आ पाता, अगर यवतमाल के सामाजिक कार्यकर्ता दिगंबर हरिभान पजगड़े ने नागपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इस याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने इस पर यवतमाल के एसपी और डीएम से रिपोर्ट मांगी। एसपी ने हाईकोर्ट को सौंपी अपनी इस रिपोर्ट में साफ किया कि ना सिर्फ जमीन लेने, बल्कि सांसद विकास निधि के दुरूपयोग की भी बात स्वीकार की। जिस तरह भ्रष्टाचार संस्थागत हो चुका है, उसमें आम सांसद के इस भ्रष्टाचार पर ज्यादा बावेला नहीं मचता। लेकिन विजय दर्डा अरबपति सांसद हैं। उनके पास पैसे की कमी नहीं है। फिर भी वे लूटखसोट और बंदरबांट से नहीं बच पाए और उन्होंने अपने ही घर के स्कूल को अपनी सांसद निधि से पैसे दे दिए। लेकिन अब यह उन्हें महंगा पड़ा है। सांसद विकास निधि के इतिहास में ये पहला मौका है – जब विजय दर्डा से इस रकम की वसूली की जा रही है। कार्यक्रम क्रियान्वयन और सांख्यिकी मंत्रालय के निदेशक अनिल कुमार चौधरी ने महाराष्ट्र के मुख्य सचिव जॉनी जोसेफ को 25 अगस्त 2008 को चिट्ठी लिखकर इस रकम की वसूली के लिए कहा है।
इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका बेहद संदिग्ध रही। एक बड़े मीडिया घराने के मालिक होने के चलते विजय दर्डा से जुड़ी ये खबर कहीं साया नहीं हुई। एक – दो छोटे मराठी अखबारों ने ही इसे प्रकाशित किया। मुंबई से प्रकाशित होने वाले एक बड़े घराने के अखबार की वेबसाइट पर ये खबर करीब आधे घंटे में ही उतर गई। ऑपरेशन दुर्योधन और तहलका को उजागर करने वाले मीडिया का अपने ही वर्ग के खिलाफ कैसा रवैया है, इसका जीता – जागता उदाहरण है विजय दर्डा का ये मामला।
Monday, September 22, 2008
वक्त राजनीति का नहीं !


उमेश चतुर्वेदी
बिहार में कोसी के कहर ने प्रभावित इलाकों के बाशिंदों को गुस्से से भर दिया है। उनका गुस्सा जायज भी है। आखिर जिस सरकार से उन्हें उम्मीद थी, उसके प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। 18 अगस्त को कोसी ने सरकारी घेरे को तोड़कर खुले मैदान में उन्मुक्त राह चुनी, एक- दिन को छोड़ दें तो तब से लगातार लोग भूख और प्यास से जूझ रहे हैं। ऐसे में सरकार पर सवाल तो उठेंगे ही।
लेकिन क्या सचमुच इसके लिए नीतीश कुमार सरकार ही दोषी है। चूंकि बाढ़ उनके ही शासन काल में आई है, कोसी को उनके ही दौर में उन्मुक्त धार चुनने में मदद मिली, इसलिए उन पर सवाल तो उठेंगे ही। जिस जगन्नाथ मिश्र के दौर में कोसी परियोजना शुरू हुई – उन्हें भी अब नीतीश कुमार दोषी दिख रहे हैं। कोसी परियोजना करीब ढाई दशक से चल रही है। इस दौर में सिंचाई विभाग के इंजीनियरों, ठेकेदारों और आईएएस अफसरों के लिए ये परियोजना दुधारू गाय की तरह साबित हुई। पटना से लेकर दिल्ली तक में उनके बंगले बने,उनके बच्चे विदेशों पढ़ते रहे। लेकिन जिनके लिए ये परियोजना शुरू हुई, वे आज सबकुछ गवां चुके हैं। उनके सामने भूख का अंतहीन सिलसिला है।
क्या इस बाढ़ के लिए नीतीश कुमार से पहले राबड़ी देवी और लालू प्रसाद यादव की सरकार जिम्मेदार नहीं है। क्या कोसी परियोजना शुरू करने वाले जगन्नाथ मिश्र और उनके पूर्ववर्ती केदार पांडे की सरकारें इस महाप्रलय के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। ये सवाल कुछ लोगों को अटपटा लग सकता है। लेकिन ये सवाल तब गलत नहीं लगेगा, जब अमेरिकन सोसायटी ऑफ सिविल इंजीनियरिंग की रिपोर्ट पढ़ने को मिलेगी। मार्च 1966 में प्रकाशित इस रिपोर्ट के मुताबिक कोसी नदी के किनारों पर 1938 से 1957 के बीच में प्रति वर्ष लगभग 10 करोड़ क्यूबिक मीटर तलछट जमा हो रहा था। केन्द्रीय जल एवं विद्युत शोध प्रतिष्ठान के वी सी गलगली और रूड़की विश्वविद्यालय के गोहेन और प्रकाश ने कोसी पर बांध बनाए जाने के बाद पेश अपने अध्ययन में भी कहा था कि बैराज बनने के बाद भी गाद और तलछट जमा होने के कारण कोसी का किनारा उपर उठ रहा है। ये रिपोर्टें जब आईं थीं, तब की सरकारें क्या कर रही थीं। जरूरत इस बात की है कि ये सवाल भी गंभीरता से पूछे जायं। वैसे ये भी सच है कि कोसी के तलछट को साफ करने के लिए इस बीच भी कोई कदम नहीं उठाया गया। आखिर ये तलछट बढ़ कैसे रहा है। इसके लिए कोसी परियोजना के जिम्मेदार अफसर रहे हैं। पूरी दुनिया में बांध जब बनाए जाते हैं तो वहां बांध पर पेड़ और घास लगाई जाती है। चीन में तो ऐसा ही हुआ है। ताकि मिट्टी ना कटे और तलछट ना जमे। लेकिन जिन्होंने गरमी के मौसम में कोसी के बांध को देखा है, उन्हें पता है कि वहां कितनी धूल और मिट्टी जमी रहती है। ये सवाल स्थानीय लोगों ने 2005 में हुए एक स्थानीय सम्मेलन में पानी वाले राजेंद्र सिंह और मेधा पाटकर के सामने भी उठाया था। उन्होंने भी माना था कि सरकारी तंत्र ये गलती कर रहा है। लेकिन इस ओर आज तक किसी का ध्यान नहीं गया है। वैसे बीजिंग से ल्हासा तक जाने वाली रेल परियोजना के चलते चीन की भी कुछ नदियों में रेत का बहाव बढ़ा है। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक इसमें अरूण नदी प्रमुख है। कहना ना होगा कि कोसी में उसकी भी धार मिलती है और वहां से हर साल करोड़ों टन बालू कोसी में आ रहा है।
वैसे कोसी में तो हर साल बाढ़ आती है। लेकिन बांध बनाए जाने के बाद 1968 में पहली बड़ी बाढ़ आई थी। उस साल 25 हजार (क्यूमेक्स क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड) जल प्रवाह हुआ था। यह नया रिकार्ड था। वैसे हर साल जल प्रवाह नौ से सोलह हजार क्यूमेक्स तो रहता ही है। जिससे बाढ़ आती ही है और कोसी अंचल के लोग इसके आदी भी रहे हैं। लेकिन ना तो सरकार ने – ना ही स्थानीय लोगों ने सोचा था कि चीन की यांग टिसी क्यांग यानी पीली नदी की तरह कोसी भी अपना रास्ता बदल लेगी। पीली नदी ने 1932 में पीली नदी ने अपनी राह बदल ली थी और इस महाप्रलय में पांच लाख लोग मारे गए। कोसी नदी के जानेमाने विशेषज्ञ शिलिंग फेल्ड काफी समय से कोसी के पूरब की तरह खिसकने की चेतावनी दे रहे थे। लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।
कुरसेला में गंगा में मिलने से पहले कोसी करीब 3600 वर्ग मील इलाके को प्रभावित करती है। इसके पहले करीब 11900 वर्ग मील नेपाल और चीन में 11400 वर्गमील इलाके पर असर डालती है। कोसी के बाढ़ का कहर नेपाल में भी है। लेकिन वह उपरी इलाका है लिहाजा सबसे ज्यादा बुरी हालत भारतीय यानी बिहार के इलाके की ही है।
माना तो ये जाता है कि कोसी की बाढ़ भारत का आंतरिक मामला है। लेकिन ऐसा नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय मामला भी है। कोसी बैराज नेपाल में है और इसके रख-रखाव और मरम्मत भारतीय इंजीनियर करते हैं। इस साल दो बार भारतीय इंजीनियर वहां गए – लेकिन स्थानीय लोगों ने उन्हें धमकाकर भगा दिया। इसमें माओवादियों का ज्यादा हाथ माना जा रहा है। लालू यादव अब खिचड़ी और चोखा रेलवे स्टेशनों पर खिलाकर अपने समर्थन में नारा लगवा रहे हैं। लेकिन इन पंक्तियों के लेखक को जानकारी है कि इसकी जानकारी बिहार सरकार ने प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय को भी दी थी। लेकिन परमाणु करार के जरिए देश को विकसित बनाने का सपना देख रहे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने इस पर ध्यान नहीं दिया और जब 18 अगस्त को कोसी ने बांध से खुद को स्वतंत्र कर लिया तो उसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करना पड़ा। हालांकि ये सवाल भी उठ रहा है कि केंद्र सरकार ने भी ये कदम उठाने में इतनी देर क्यों लगाई। तब लालू यादव ने केंद्र सरकार पर मरम्मत के लिए दबाव क्यों नहीं बनाया।
सबसे हैरतनाक बयान नेपाल की माओवादी सरकार के विदेश मंत्री उपेंद्र यादव का आया। लेकिन भारत अपनी सहिष्णु छवि बनाए रखने के लिए प्रतिक्रियास्वरूप बयान देने से बचता रहा। कहां तक बाढ़ राहत के कार्यों में नेपाल साथ आता, आर्थिक या तकनीकी रूप से सहायता देने की उसकी क्षमता भी नहीं है। लेकिन मानसिक और भावनात्मक सहयोग की उससे उम्मीद की जा सकती है। लेकिन निर्लज्जता पूर्वक उपेंद्र यादव भारत से कोसी बैराज के लिए मुआवजा मांगते नजर आए। ये उस सरकार के मंत्री हैं, जिसे बनवाने में भारतीय वामपंथियों ने भी खास भूमिका निभाई।
माना जा रहा है कि कोसी का पाट चालीस किलोमीटर लंबा हो गया है। खुद सरकार ही मानती है कि मधेपुरा, अररिया, सहरसा, सुपौल, पूर्णिया की करीब चालीस लाख आबादी इससे परेशान हुई है। लेकिन राहत में लगी सेना के जवानों की गिनती देखिए। राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के प्रमुख सचिव आर के सिंह के मुताबिक राहत और बचाव कार्य में आर्मी के 1700 जवान 150 मोटरबोट के साथ जुटे हुए हैं, जबकि नौसेना के सिर्फ 135 जवान 45 नावों के साथ लोगों को बाहर निकालने की कार्रवाई में लगे हुए हैं। इसी तरह नेशनल डिजास्टर रेस्पांस फोर्स के जवान 137 नावों के साथ राज्य पुलिस तंत्र की मदद कर रहे हैं। वैसे सरकार ने पहली सितंबर को ऐलान किया कि आर्मी के 1120 और जवानों को सौ नावों के साथ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में भेजा जा रहा है। जहां तक राज्य मशीनरी का सवाल है तो उनका भगवान ही मालिक है और उन पर भरोसा करना नाकाफी होगा। ये बात ना सिर्फ केंद्र सरकार – बल्कि राज्य सरकार भी जानती है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि चीन और नेपाल के साथ मिलकर इस समस्या का समाधान निकाला जाय। चीन के असर में नेपाल के आने के डर से हम कब तक डरते रहेंगे। हमें चीन से भी ये सवाल उठाना पड़ेगा कि तिब्बत रेल परियोजना के चलते अरूण नदी के जरिए में कोसी में लगातार हो रहे बालू के प्रवाह पर तकनीकी और प्रभावकारी नियंत्रण लगाए। ये वक्त राजनीति का नहीं है। जरूरत जनता को बचाने का है। उन्हें फिर से नीड़ का निर्माण बनाने में मदद देने का है। क्योंकि इसी जनता पर ही टिकी है हमारी राजनीति। जनता ही नहीं रहेगी तो राजनीति किस काम की।
Thursday, September 11, 2008
पूर्वांचल दुर्दशा देखि ना जाई !
उमेश चतुर्वेदी
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने करीब सवा सौ साल पहले अंग्रेजी सरकार के जमाने में देश की दुर्दशा देखकर लिखा था – भारत दुर्दशा देखि न जाई। तब वे काशी में रहते थे। काशी यानी वाराणसी में बैठे भारतेंदु को देश की दुर्दशा देखी नहीं गई। तब उन्होंने कलम उठा ली थी। आज उन्हीं की काशी समेत पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश भारी बारिश की परेशानियों से जूझ रहा है। करीब दो महीने से लगातार जारी बारिश ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारी तबाही मचा रखी है। बीस अगस्त को हुई भारी बारिश ने तो वाराणसी शहर में घुटने-घुटने तक पानी में डूब गया। लोगों का कहना है कि ऐसी बारिश पिछले पचास साल में नहीं हुई।
जब दुनियाभर में हिंदुओं के पवित्र तीर्थ के रूप में विख्यात वाराणसी की ये हालत है तो दूसरे दूसरे जिलों की क्या हालत होगी-इसका अंदाजा लगाना आसान है। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि काशी में जिसकी मौत होती है – उसे स्वर्ग मिलता है। लेकिन भारी बरसात ने शहर को नरक में तब्दील कर दिया है। लेकिन शहर पर किसी का ध्यान नहीं है। न तो सूबे की सरकार का – ना ही केंद्र सरकार। जब जगमोहन केंद्रीय संस्कृति मंत्री थे तो उन्होंने वाराणसी की गलियों को चमकाने और कुछ वैसा ही साफ-सुथरा तीर्थस्थान बनाने की तैयारी की थी – जैसा उन्होंने जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल रहते वैष्णो देवी को बनाया था। दुर्भाग्यवश मायावती के विरोध के चलते उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया गया और काशी को तीन लोकन ते न्यारी बनाने की उनकी तैयारियां धरी की धरी रह गईं।
सवाल सिर्फ वाराणसी की ही बदहाली का नहीं है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में 22 जिले आते हैं। मिर्जापुर, इलाहाबाद,वाराणसी, आजमगढ़ और गोरखपुर कमिश्नरी में बंटे इन जिलों में इस साल इतनी बारिश हुई है कि गांव के गांव तालाब के तौर पर नजर आ रहे हैं। मक्का, ज्वार और उड़द जैसी खरीफ की फसलें पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं। धान से लहलहाने वाले इस पूरे इलाके में कहीं – कहीं ही धान की फसल नजर आ रही है। यही हालत लाखों हेक्टेयर में हो रही गन्ने की खेती का भी है। सब्जियों की तो बात ही मत पूछिए। दिल्ली और मुंबई में सब्जियों की कीमत जब चढ़ने लगती है तो राष्ट्रीय मीडिया की बड़ी-बड़ी सुर्खियां बन जाती है। लेकिन सब्जी के उत्पादन के लिए इस मशहूर इलाके में सब्जियों की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। लिहाजा पूरे इलाके में इनकी कीमत में भारी वृद्धि हुई है। गरीबों की थाली से सब्जियां गायब हो गई हैं। लेकिन इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है।
बारिश को लेकर राज्य प्रशासन कितना सचेत है – इसका उदाहरण है कि कई जिलों में कितनी बारिश हुई – इसका ठीक-ठीक आंकड़ा प्रशासन के पास मौजूद नहीं है। सन 2001 से पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक बड़ा इलाका सूखे की मार झेलता रहा है। अकेले बलिया की ही बात करें तो 2001 में बलिया में करीब 950 मिली बारिश रिकॉर्ड की गई। अगले साल महज 711 मिली ही बारिश हुई। सबसे खराब हालत रही 2005 में – जब सिर्फ 629 मिली ही बारिश हुई। लेकिन इस साल हालात ये हैं कि 18 अगस्त तक ही 1081 मिली बारिश हो चुकी है। शुरू में बारिश की फुहारों ने पूर्वांचल के लोगों को मोहित किया। लेकिन जब 45 दिनों तक हर दिन हो रही बारिश ने लोगों को परेशान कर दिया। शायद ही कोई गांव होगा- जहां दो-एक मकान न गिरे हों। बलिया के सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता पी सी यादव के मुताबिक बारिश ने पचास साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। इसके चलते यहां की नदियां उफान पर हैं। घाघरा और गंगा के किनारे वाले हजारों गांवों का संपर्क कट चुका है। पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में शायद ही कोई नदी होगी- जिसने समंदर का रूप नहीं धारण कर लिया है। बलिया, गाजीपुर और आजमगढ़ जैसे गरीबी और बदहाल जिलों में कई मकान भरभराकर गिर गए और उसमें रहने वाले लोगों की दबकर मौत हो गई। लेकिन उनका कोई पुरसा हाल जानने वाला नहीं हैं।
गरीबी और बदहाली पूर्वांचल की स्थाई पहचान है। दिलचस्प बात ये है कि इसी इलाके से सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी को ज्यादा समर्थन मिला है। बलिया की सभी आठ विधानसभा सीटें बसपा की झोली में गई हैं। आजमगढ़ की भी यही हालत है। लेकिन राज्य सरकार के कान पर अभी तक जूं नहीं रेंगी है। अधिकारियों का कहना है कि सूखा के लिए आपदा का प्रावधान सरकारी आदेश में तो है – लेकिन अतिवृष्टि के लिए कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में राहत के लिए कोई उपाय नहीं किए गए हैं। नही इस ओर प्रशासन का कोई ध्यान है।
सबसे ज्यादा परेशानी की बात ये है कि खरीफ की फसल पूरी तरह चौपट हो जाने के कारण इस बार गरीब और मजदूर तबके के लोगों को खाद्यान्न के संकट का सामना करना पड़ेगा। जिन परिवारों को बाहरी आमदनी का सौभाग्य मयस्सर नहीं है, उनके लिए अगले कुछ महीनों में भोजन का संकट उठ खड़ा होने वाला है। फसलें तबाह होने के चलते खेतिहर मजदूरों के लिए काम भी नहीं रह गया है। रोजाना होने वाली बारिश ने नरेगा के तहत होने वाले कामों पर भी ब्रेक लगा दिया है। ऐसे में मजदूरी करके गुजारा करने वालों के सामने ना सिर्फ रोजी- बल्कि कुछ दिनों में रोटी का भी संकट आने वाला है। लेकिन प्रशासन इस सिलसिले में चौकस नहीं दिख रहा।
जहां तक राज्य सरकार का सवाल है तो उसका ध्यान प्रशासन और लोकहित से ज्यादा अगले साल होने वाले आम चुनावों को लेकर जोड़-घटाव करने में है। ताकि उसकी मुखिया को देश का प्रधानमंत्री बनना आसान हो। सारे जतन और उपाय इसे ही ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं। पूर्वांचल में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी का चुनाव क्षेत्र रायबरेली है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी जिस अमेठी सीट से चुनकर आए हैं-वह भी इसी पूर्वांचल में है। बात-बात में पूर्वांचल की बदहाली का सवाल उठाने वाली कांग्रेस का अतिवृष्टि की ओर ध्यान नहीं है। ऐसे में पूरे इलाके की करीब चार करोड़ जनसंख्या ठगा सा महसूस कर रही है। हताश - निराश इलाके के लोगों को उम्मीद इन राजनेताओं से कहीं ज्यादा आसमानी देवता पर टिक गई है – बारिश रूके तो जिंदगी की रफ्तार आगे बढ़े।
यह लेख अमर उजाला में प्रकाशित हुआ है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने करीब सवा सौ साल पहले अंग्रेजी सरकार के जमाने में देश की दुर्दशा देखकर लिखा था – भारत दुर्दशा देखि न जाई। तब वे काशी में रहते थे। काशी यानी वाराणसी में बैठे भारतेंदु को देश की दुर्दशा देखी नहीं गई। तब उन्होंने कलम उठा ली थी। आज उन्हीं की काशी समेत पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश भारी बारिश की परेशानियों से जूझ रहा है। करीब दो महीने से लगातार जारी बारिश ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारी तबाही मचा रखी है। बीस अगस्त को हुई भारी बारिश ने तो वाराणसी शहर में घुटने-घुटने तक पानी में डूब गया। लोगों का कहना है कि ऐसी बारिश पिछले पचास साल में नहीं हुई।
जब दुनियाभर में हिंदुओं के पवित्र तीर्थ के रूप में विख्यात वाराणसी की ये हालत है तो दूसरे दूसरे जिलों की क्या हालत होगी-इसका अंदाजा लगाना आसान है। हिंदू धर्म में ऐसी मान्यता है कि काशी में जिसकी मौत होती है – उसे स्वर्ग मिलता है। लेकिन भारी बरसात ने शहर को नरक में तब्दील कर दिया है। लेकिन शहर पर किसी का ध्यान नहीं है। न तो सूबे की सरकार का – ना ही केंद्र सरकार। जब जगमोहन केंद्रीय संस्कृति मंत्री थे तो उन्होंने वाराणसी की गलियों को चमकाने और कुछ वैसा ही साफ-सुथरा तीर्थस्थान बनाने की तैयारी की थी – जैसा उन्होंने जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल रहते वैष्णो देवी को बनाया था। दुर्भाग्यवश मायावती के विरोध के चलते उन्हें मंत्रिमंडल से हटा दिया गया और काशी को तीन लोकन ते न्यारी बनाने की उनकी तैयारियां धरी की धरी रह गईं।
सवाल सिर्फ वाराणसी की ही बदहाली का नहीं है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में 22 जिले आते हैं। मिर्जापुर, इलाहाबाद,वाराणसी, आजमगढ़ और गोरखपुर कमिश्नरी में बंटे इन जिलों में इस साल इतनी बारिश हुई है कि गांव के गांव तालाब के तौर पर नजर आ रहे हैं। मक्का, ज्वार और उड़द जैसी खरीफ की फसलें पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं। धान से लहलहाने वाले इस पूरे इलाके में कहीं – कहीं ही धान की फसल नजर आ रही है। यही हालत लाखों हेक्टेयर में हो रही गन्ने की खेती का भी है। सब्जियों की तो बात ही मत पूछिए। दिल्ली और मुंबई में सब्जियों की कीमत जब चढ़ने लगती है तो राष्ट्रीय मीडिया की बड़ी-बड़ी सुर्खियां बन जाती है। लेकिन सब्जी के उत्पादन के लिए इस मशहूर इलाके में सब्जियों की फसल पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। लिहाजा पूरे इलाके में इनकी कीमत में भारी वृद्धि हुई है। गरीबों की थाली से सब्जियां गायब हो गई हैं। लेकिन इसकी कहीं कोई चर्चा नहीं है।
बारिश को लेकर राज्य प्रशासन कितना सचेत है – इसका उदाहरण है कि कई जिलों में कितनी बारिश हुई – इसका ठीक-ठीक आंकड़ा प्रशासन के पास मौजूद नहीं है। सन 2001 से पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक बड़ा इलाका सूखे की मार झेलता रहा है। अकेले बलिया की ही बात करें तो 2001 में बलिया में करीब 950 मिली बारिश रिकॉर्ड की गई। अगले साल महज 711 मिली ही बारिश हुई। सबसे खराब हालत रही 2005 में – जब सिर्फ 629 मिली ही बारिश हुई। लेकिन इस साल हालात ये हैं कि 18 अगस्त तक ही 1081 मिली बारिश हो चुकी है। शुरू में बारिश की फुहारों ने पूर्वांचल के लोगों को मोहित किया। लेकिन जब 45 दिनों तक हर दिन हो रही बारिश ने लोगों को परेशान कर दिया। शायद ही कोई गांव होगा- जहां दो-एक मकान न गिरे हों। बलिया के सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता पी सी यादव के मुताबिक बारिश ने पचास साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। इसके चलते यहां की नदियां उफान पर हैं। घाघरा और गंगा के किनारे वाले हजारों गांवों का संपर्क कट चुका है। पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में शायद ही कोई नदी होगी- जिसने समंदर का रूप नहीं धारण कर लिया है। बलिया, गाजीपुर और आजमगढ़ जैसे गरीबी और बदहाल जिलों में कई मकान भरभराकर गिर गए और उसमें रहने वाले लोगों की दबकर मौत हो गई। लेकिन उनका कोई पुरसा हाल जानने वाला नहीं हैं।
गरीबी और बदहाली पूर्वांचल की स्थाई पहचान है। दिलचस्प बात ये है कि इसी इलाके से सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी को ज्यादा समर्थन मिला है। बलिया की सभी आठ विधानसभा सीटें बसपा की झोली में गई हैं। आजमगढ़ की भी यही हालत है। लेकिन राज्य सरकार के कान पर अभी तक जूं नहीं रेंगी है। अधिकारियों का कहना है कि सूखा के लिए आपदा का प्रावधान सरकारी आदेश में तो है – लेकिन अतिवृष्टि के लिए कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में राहत के लिए कोई उपाय नहीं किए गए हैं। नही इस ओर प्रशासन का कोई ध्यान है।
सबसे ज्यादा परेशानी की बात ये है कि खरीफ की फसल पूरी तरह चौपट हो जाने के कारण इस बार गरीब और मजदूर तबके के लोगों को खाद्यान्न के संकट का सामना करना पड़ेगा। जिन परिवारों को बाहरी आमदनी का सौभाग्य मयस्सर नहीं है, उनके लिए अगले कुछ महीनों में भोजन का संकट उठ खड़ा होने वाला है। फसलें तबाह होने के चलते खेतिहर मजदूरों के लिए काम भी नहीं रह गया है। रोजाना होने वाली बारिश ने नरेगा के तहत होने वाले कामों पर भी ब्रेक लगा दिया है। ऐसे में मजदूरी करके गुजारा करने वालों के सामने ना सिर्फ रोजी- बल्कि कुछ दिनों में रोटी का भी संकट आने वाला है। लेकिन प्रशासन इस सिलसिले में चौकस नहीं दिख रहा।
जहां तक राज्य सरकार का सवाल है तो उसका ध्यान प्रशासन और लोकहित से ज्यादा अगले साल होने वाले आम चुनावों को लेकर जोड़-घटाव करने में है। ताकि उसकी मुखिया को देश का प्रधानमंत्री बनना आसान हो। सारे जतन और उपाय इसे ही ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं। पूर्वांचल में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी का चुनाव क्षेत्र रायबरेली है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भी जिस अमेठी सीट से चुनकर आए हैं-वह भी इसी पूर्वांचल में है। बात-बात में पूर्वांचल की बदहाली का सवाल उठाने वाली कांग्रेस का अतिवृष्टि की ओर ध्यान नहीं है। ऐसे में पूरे इलाके की करीब चार करोड़ जनसंख्या ठगा सा महसूस कर रही है। हताश - निराश इलाके के लोगों को उम्मीद इन राजनेताओं से कहीं ज्यादा आसमानी देवता पर टिक गई है – बारिश रूके तो जिंदगी की रफ्तार आगे बढ़े।
यह लेख अमर उजाला में प्रकाशित हुआ है।
Wednesday, September 3, 2008
छद्म धर्मनिरपेक्षता से भी तो बचिए .....
यह लेख प्रख्यात पत्रकार उदयन शर्मा की स्मृति में गठित उदयन शर्मा फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से प्रकाशित किताब सांप्रदायिकता की चुनौती में प्रकाशित हुआ है।
उमेश चतुर्वेदी
इस लेख को शुरू करने से पहले अपने साथ घटी एक घटना का जिक्र करना जरूरी समझता हूं। शायद सन 2000 की घटना है। तब मैं दैनिक भास्कर के राजनीतिक ब्यूरो में कार्यरत था। हमारा दफ्तर दिल्ली के आईएनएस बिल्डिंग में था। एक शाम बिल्डिंग के बाहर चाय की दुकान पर अपने कुछ सहकर्मी दोस्तों के साथ चाय पी रहा था- तभी एक पत्रकार मित्र वहां नमूदार हुए। आते ही उन्होंने पूछा – क्या आप कभी आपने खाकी निक्कर पहनी है। स्कूली पढ़ाई के दिनों में पीटी की कक्षा में खाकी निक्कर पहनना जरूरी था। जाहिर है – मित्र के सवाल का जवाब मैंने हां में ही दिया। मेरे वे मित्र तब एक न्यूज चैनल की बंदी के खिलाफ सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे। वामपंथी रूझान वाले मेरे मित्र उन दिनों पूरे तेवर में हुआ करते थे। लिहाजा मेरी आत्मस्वीकृति ने उन्हें दिल्ली के पत्रकारीय हलकों में मुझे सांप्रदायिक और आरएसएस का कार्यकर्ता बताने का मौका मिल गया। इसका उन्होंने जमकर प्रचार भी किया। ये तो मुझे बाद में पता चला कि उनका आशय खाकी निक्कर के बहाने मेरे आरएसएस से संबंधों की जानकारी पाना था। इसकी जानकारी तब हुई, जब उनके और मेरे दो –एक परिचितों ने हर मुलाकात में पूछा कि क्या मैं आरएसएस का कार्यकर्ता रहा हूं। मैं हर किसी को सफाई देता फिरता रहा। लेकिन सवाल थे कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इसके बाद जब कोई मुझसे पूछता कि क्या आप आरएसएस की शाखा में जाते थे तो मेरा जवाब आक्रामक होता – आपको कोई एतराज है। कहना न होगा – मुझे आरएसएस का कार्यकर्ता बताने वाले वे क्रांतिकारी पत्रकार मित्र एक प्रमुख चैनल में काम करते हैं और अब उनका वामपंथी रूझान ठंडा पड़ गया है। इन दिनों उन्हें भूत-प्रेत से लेकर चुड़ैंलें नचाने का एक्सपर्ट माना जाता है।
ये एक घटना गवाह है कि कैसे प्रगतिशीलता का दावा करने वाले लोगों ने छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपने विरोधी लोगों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यकर्ता घोषित करने में देर नहीं लगाई। इसका असर ये हुआ कि प्रगतिशीलता का दावा करने वालों के इसी रवैये ने लोगों को आरएसएस के नजदीक जाने में अहम भूमिका निभाई। कई बार तो खुद मुझे भी लगता था कि मैं क्यों ना आरएसएस का कार्यकर्ता बन गया। अगर इस हिसाब से देखा जाय तो स्वतंत्र भारत में इतिहास की धारा बदलने वाले जयप्रकाश नारायण और समाजवादी सपनों के चितेरे रहे जवाहरलाल नेहरू को भी संघ का कार्यकर्ता ठहराया जा सकता है। जिन्होंने अजीत भट्टाचार्जी की लिखी जेपी की जीवनी पढ़ी है – उन्हें पता है कि जेपी ऐसी प्रगतिशीलता के घोर विरोधी थे। उनका ये विरोध ही था कि उन्होंने 1974 के आंदोलन में वामपंथी दलों का साथ लेने की कोई मंजूरी नहीं दी। जवाहरलाल नेहरू ने भी पचास के दशक में एक बार गणतंत्र दिवस की परेड में आरएसएस को भी हिस्सा लेने के लिए बुलाया था। उनकी कैबिनेट में संघ की विचारधारा वाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी शामिल थे।
दरअसल नब्बे के बाद जिस तरह मंडल और कमंडल के आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदली, तब से खासतौर पर बौद्धिक वर्ग में लोगों की पहचान का एक ही पैमाना रहा गया – खाकी निक्कर। अगर आपने गाहे-बगाहे छद्म धर्मनिरपेक्षता की खिंचाई कर दी तो समझो - आप आरएसएस के आदमी हो गए। ये कुछ ऐसा ही है – जैसे सत्तर और अस्सी के दशक में अमेरिका की बात करने वाला हर शख्स सीआईए का आदमी माना जाता था। लेकिन आज हालत बदल गए हैं। आज व्यक्ति चाहे प्रगतिशील हो या फिर संघी-सबका सपना अमेरिका की धरती पर पांव रखने की है। कुछ यही हाल आज की धर्मनिरपेक्षता का भी है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले लोग भी जाति और धर्म की संकीर्णता से बाहर नहीं हैं। अगर रसूखदार पद पर हैं तो नौकरी देने- दिलाने, दमदार नेता हैं तो जाति और धर्म के आधार पर चुनाव का टिकट देने-दिलाने में वे भी जाति और धर्म का लिहाज करना अपना परमपुनीत कर्तव्य समझते हैं। लेकिन जब भी सामने माइक आया, लिखने – छपने का मंच मिला, वे धर्मनिरपेक्ष हो जाते हैं। जिस तरह साठ और सत्तर के दशक में वामपंथी और समाजवादी होना एक बौद्धिक शगल और फैशन बन गया था – कुछ यही हालत आज धर्मनिरपेक्षता को लेकर हो गई है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करिए और तमाम तरह की सुविधाएं भोगने का एकाधिकार पा जाइए। इसके लिए आपको सिर्फ मंचों – गोष्ठियों में अपनी सेक्युलर छवि का डंका बजानेभर की जरूरत है। भले ही हकीकत में आपका चेहरा कुछ और ही क्यों ना हो। एक दौर था – जब हकीकत में भी दक्षिणपंथी होने वाले लोग भी इस फैशन के सामने अपनी खाकी निक्कर का जिक्र करने से डरते थे। लेकिन भेड़िया आया की तर्ज पर धर्मनिरपेक्षता का अब जितना गान हो चुका है, उससे यह शब्द अपना अर्थबोध और भरोसा खोता जा रहा है। इसका असर है कि अब हकीकत के दक्षिणपंथियों को भी अब अपने आरएसएस से जुड़ाव को स्वीकार करने में हिचक नहीं रही।
संचार क्रांति के दौर में ऐसे लोग अब भी इसी भ्रम में जी रहे हैं कि जनता को वे जैसा समझाएंगे, वह उसी तरह मानती-समझती रहेगी। वे भूल जाते हैं कि पब्लिक अब सबकुछ समझती है। उसे पता है कि धर्मनिरपेक्षता का दम भरने वाले लोग भी अपनी जिंदगी में कितने धर्मनिरपेक्ष हैं। उसे हकीकत का भान है। इसीलिए आज धर्मनिरपेक्षता का दावा लोगों को लुभा नहीं पा रहा है। राजनीति में इसका असर दिख भी रहा है। नरेंद्र मोदी को कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने कठघरे में खड़ा करने की कम कोशिशें नहीं कीं। कर्नाटक में बीजेपी को सांप्रदायिक बताने का कोई मौका लोगों ने नहीं छोड़ा। लेकिन जनता इन सांप्रदायिक नरेंद्र मोदी और बीएस येदुरप्पा को ही चुना।
दरअसल धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले लोग इसका इतना गान कर चुके हैं कि उन पर जनता का भरोसा टूटता जा रहा है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली ताकतों को देखिए। उन्हें आम जनता से ज्यादा अपने परिवार की चिंता कहीं ज्यादा है। मुलायम सिंह के घर में ही अब सबसे ज्यादा सांसद और विधायक होते हैं। धर्मनिरपेक्ष ओमप्रकाश चौटाला धर्मनिरपेक्षता के नाम पर परिवारवाद का ही विस्तार करते रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे एचडी देवेगौड़ा ने पिछले दिनों कर्नाटक में परिवारवाद का जो निर्लज्ज प्रदर्शन किया – वह लोगों के जेहन में अब भी ताजा है। इसका हश्र उन्हें कर्नाटक विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी की हार के तौर पर देखना पड़ा है। इस कड़ी में नया नाम मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व स्पीकर पीए संगमा हैं। उनका बेटा राज्य का उपमुख्यमंत्री है और बेटी नई सांसद। खुद तो विधायक हैं हीं। ये सभी लोग धर्मनिरपेक्ष हैं।
तो क्या ये मान लिया जाय कि धर्मनिरपेक्षता को सांप्रदायिक विरोध के नाम पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा देने का ठेका मिल जाता है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले नेता भले ही ये मानते रहे हों- लेकिन ये भी सच है कि इन ताकतों के इसी व्यवहार ने अब जनता की नजर में इनकी वकत घटा दी है। ऐसे में जनता को धर्मनिरपेक्षता को सांप्रदायिक विरोध के नाम पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा देने का ठेका मिल जाता है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले नेता भले ही ये मानते रहे हों- लेकिन ये भी सच है कि इन ताकतों के इसी व्यवहार ने अब जनता की नजर में इनकी वकत घटा दी है। ऐसे में जनता को अब भारतीय जनता पार्टी में भी दम नजर आने लगा है। भाजपा के उभार में लोगों को जबरिया सांप्रदायिक ठहराने और अपनी ढोल खुद ही ऊंची आवाज में बजाने वाले लोगों का जोरदार हाथ है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सेक्युलर होने का दावा करने वाले लोग इस तथ्य को स्वीकार कर पाते हैं या नहीं।
उमेश चतुर्वेदी
इस लेख को शुरू करने से पहले अपने साथ घटी एक घटना का जिक्र करना जरूरी समझता हूं। शायद सन 2000 की घटना है। तब मैं दैनिक भास्कर के राजनीतिक ब्यूरो में कार्यरत था। हमारा दफ्तर दिल्ली के आईएनएस बिल्डिंग में था। एक शाम बिल्डिंग के बाहर चाय की दुकान पर अपने कुछ सहकर्मी दोस्तों के साथ चाय पी रहा था- तभी एक पत्रकार मित्र वहां नमूदार हुए। आते ही उन्होंने पूछा – क्या आप कभी आपने खाकी निक्कर पहनी है। स्कूली पढ़ाई के दिनों में पीटी की कक्षा में खाकी निक्कर पहनना जरूरी था। जाहिर है – मित्र के सवाल का जवाब मैंने हां में ही दिया। मेरे वे मित्र तब एक न्यूज चैनल की बंदी के खिलाफ सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे। वामपंथी रूझान वाले मेरे मित्र उन दिनों पूरे तेवर में हुआ करते थे। लिहाजा मेरी आत्मस्वीकृति ने उन्हें दिल्ली के पत्रकारीय हलकों में मुझे सांप्रदायिक और आरएसएस का कार्यकर्ता बताने का मौका मिल गया। इसका उन्होंने जमकर प्रचार भी किया। ये तो मुझे बाद में पता चला कि उनका आशय खाकी निक्कर के बहाने मेरे आरएसएस से संबंधों की जानकारी पाना था। इसकी जानकारी तब हुई, जब उनके और मेरे दो –एक परिचितों ने हर मुलाकात में पूछा कि क्या मैं आरएसएस का कार्यकर्ता रहा हूं। मैं हर किसी को सफाई देता फिरता रहा। लेकिन सवाल थे कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इसके बाद जब कोई मुझसे पूछता कि क्या आप आरएसएस की शाखा में जाते थे तो मेरा जवाब आक्रामक होता – आपको कोई एतराज है। कहना न होगा – मुझे आरएसएस का कार्यकर्ता बताने वाले वे क्रांतिकारी पत्रकार मित्र एक प्रमुख चैनल में काम करते हैं और अब उनका वामपंथी रूझान ठंडा पड़ गया है। इन दिनों उन्हें भूत-प्रेत से लेकर चुड़ैंलें नचाने का एक्सपर्ट माना जाता है।
ये एक घटना गवाह है कि कैसे प्रगतिशीलता का दावा करने वाले लोगों ने छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपने विरोधी लोगों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यकर्ता घोषित करने में देर नहीं लगाई। इसका असर ये हुआ कि प्रगतिशीलता का दावा करने वालों के इसी रवैये ने लोगों को आरएसएस के नजदीक जाने में अहम भूमिका निभाई। कई बार तो खुद मुझे भी लगता था कि मैं क्यों ना आरएसएस का कार्यकर्ता बन गया। अगर इस हिसाब से देखा जाय तो स्वतंत्र भारत में इतिहास की धारा बदलने वाले जयप्रकाश नारायण और समाजवादी सपनों के चितेरे रहे जवाहरलाल नेहरू को भी संघ का कार्यकर्ता ठहराया जा सकता है। जिन्होंने अजीत भट्टाचार्जी की लिखी जेपी की जीवनी पढ़ी है – उन्हें पता है कि जेपी ऐसी प्रगतिशीलता के घोर विरोधी थे। उनका ये विरोध ही था कि उन्होंने 1974 के आंदोलन में वामपंथी दलों का साथ लेने की कोई मंजूरी नहीं दी। जवाहरलाल नेहरू ने भी पचास के दशक में एक बार गणतंत्र दिवस की परेड में आरएसएस को भी हिस्सा लेने के लिए बुलाया था। उनकी कैबिनेट में संघ की विचारधारा वाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी शामिल थे।
दरअसल नब्बे के बाद जिस तरह मंडल और कमंडल के आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदली, तब से खासतौर पर बौद्धिक वर्ग में लोगों की पहचान का एक ही पैमाना रहा गया – खाकी निक्कर। अगर आपने गाहे-बगाहे छद्म धर्मनिरपेक्षता की खिंचाई कर दी तो समझो - आप आरएसएस के आदमी हो गए। ये कुछ ऐसा ही है – जैसे सत्तर और अस्सी के दशक में अमेरिका की बात करने वाला हर शख्स सीआईए का आदमी माना जाता था। लेकिन आज हालत बदल गए हैं। आज व्यक्ति चाहे प्रगतिशील हो या फिर संघी-सबका सपना अमेरिका की धरती पर पांव रखने की है। कुछ यही हाल आज की धर्मनिरपेक्षता का भी है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले लोग भी जाति और धर्म की संकीर्णता से बाहर नहीं हैं। अगर रसूखदार पद पर हैं तो नौकरी देने- दिलाने, दमदार नेता हैं तो जाति और धर्म के आधार पर चुनाव का टिकट देने-दिलाने में वे भी जाति और धर्म का लिहाज करना अपना परमपुनीत कर्तव्य समझते हैं। लेकिन जब भी सामने माइक आया, लिखने – छपने का मंच मिला, वे धर्मनिरपेक्ष हो जाते हैं। जिस तरह साठ और सत्तर के दशक में वामपंथी और समाजवादी होना एक बौद्धिक शगल और फैशन बन गया था – कुछ यही हालत आज धर्मनिरपेक्षता को लेकर हो गई है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करिए और तमाम तरह की सुविधाएं भोगने का एकाधिकार पा जाइए। इसके लिए आपको सिर्फ मंचों – गोष्ठियों में अपनी सेक्युलर छवि का डंका बजानेभर की जरूरत है। भले ही हकीकत में आपका चेहरा कुछ और ही क्यों ना हो। एक दौर था – जब हकीकत में भी दक्षिणपंथी होने वाले लोग भी इस फैशन के सामने अपनी खाकी निक्कर का जिक्र करने से डरते थे। लेकिन भेड़िया आया की तर्ज पर धर्मनिरपेक्षता का अब जितना गान हो चुका है, उससे यह शब्द अपना अर्थबोध और भरोसा खोता जा रहा है। इसका असर है कि अब हकीकत के दक्षिणपंथियों को भी अब अपने आरएसएस से जुड़ाव को स्वीकार करने में हिचक नहीं रही।
संचार क्रांति के दौर में ऐसे लोग अब भी इसी भ्रम में जी रहे हैं कि जनता को वे जैसा समझाएंगे, वह उसी तरह मानती-समझती रहेगी। वे भूल जाते हैं कि पब्लिक अब सबकुछ समझती है। उसे पता है कि धर्मनिरपेक्षता का दम भरने वाले लोग भी अपनी जिंदगी में कितने धर्मनिरपेक्ष हैं। उसे हकीकत का भान है। इसीलिए आज धर्मनिरपेक्षता का दावा लोगों को लुभा नहीं पा रहा है। राजनीति में इसका असर दिख भी रहा है। नरेंद्र मोदी को कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने कठघरे में खड़ा करने की कम कोशिशें नहीं कीं। कर्नाटक में बीजेपी को सांप्रदायिक बताने का कोई मौका लोगों ने नहीं छोड़ा। लेकिन जनता इन सांप्रदायिक नरेंद्र मोदी और बीएस येदुरप्पा को ही चुना।
दरअसल धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले लोग इसका इतना गान कर चुके हैं कि उन पर जनता का भरोसा टूटता जा रहा है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली ताकतों को देखिए। उन्हें आम जनता से ज्यादा अपने परिवार की चिंता कहीं ज्यादा है। मुलायम सिंह के घर में ही अब सबसे ज्यादा सांसद और विधायक होते हैं। धर्मनिरपेक्ष ओमप्रकाश चौटाला धर्मनिरपेक्षता के नाम पर परिवारवाद का ही विस्तार करते रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे एचडी देवेगौड़ा ने पिछले दिनों कर्नाटक में परिवारवाद का जो निर्लज्ज प्रदर्शन किया – वह लोगों के जेहन में अब भी ताजा है। इसका हश्र उन्हें कर्नाटक विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी की हार के तौर पर देखना पड़ा है। इस कड़ी में नया नाम मेघालय के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व स्पीकर पीए संगमा हैं। उनका बेटा राज्य का उपमुख्यमंत्री है और बेटी नई सांसद। खुद तो विधायक हैं हीं। ये सभी लोग धर्मनिरपेक्ष हैं।
तो क्या ये मान लिया जाय कि धर्मनिरपेक्षता को सांप्रदायिक विरोध के नाम पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा देने का ठेका मिल जाता है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले नेता भले ही ये मानते रहे हों- लेकिन ये भी सच है कि इन ताकतों के इसी व्यवहार ने अब जनता की नजर में इनकी वकत घटा दी है। ऐसे में जनता को धर्मनिरपेक्षता को सांप्रदायिक विरोध के नाम पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा देने का ठेका मिल जाता है। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाले नेता भले ही ये मानते रहे हों- लेकिन ये भी सच है कि इन ताकतों के इसी व्यवहार ने अब जनता की नजर में इनकी वकत घटा दी है। ऐसे में जनता को अब भारतीय जनता पार्टी में भी दम नजर आने लगा है। भाजपा के उभार में लोगों को जबरिया सांप्रदायिक ठहराने और अपनी ढोल खुद ही ऊंची आवाज में बजाने वाले लोगों का जोरदार हाथ है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सेक्युलर होने का दावा करने वाले लोग इस तथ्य को स्वीकार कर पाते हैं या नहीं।
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