Saturday, December 15, 2012

आगत की चिंता



उमेश चतुर्वेदी
लखनऊ से प्रकाशित समकालीन सरोकार में प्रकाशित....आत्मकथ्य वहां प्रकाशित नहीं हुआ है..
आत्मकथ्य:
आगत की राजनीतिक मीमांसा निश्चित तौर पर विगत की नींव पर खड़ी होती है। ऐसे में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि आखिर भावी राजनीतिक पूर्वानुमान ज्यादातर ध्वस्त क्यों हो जाते हैं? चूंकि ज्यादातर राजनीतिक पूर्वानुमानों में ईमानदारी की सुगंध कम होती है, अपने आग्रह और पूर्वाग्रह मीमांसकों के अपने व्यक्तित्व पर हावी हो जाते हैं। बेशक यह मानव स्वभाव है, लिहाजा इससे बचने की उम्मीद पालना भी कई लोगों को बेकार लगता है। लेकिन कालजयी रचनाधर्मिता और पत्रकारिता इस मानव स्वभाव से उपर उठने के बाद ही सामने आती है। भीड़तंत्र को मानवीय आग्रह जितना आकर्षित करते हैं, कालजयी शख्सियतों को वे उतने ही निर्विकार रहने को मजबूर करते हैं। ऐसे ही वक्त में प्रख्यात पत्रकार राजेंद्र माथुर की बातें याद आती हैं। उनका कहना था कि पत्रकार संजय की तरह सिर्फ और सिर्फ दर्शक होता है और उसका काम घटनाओं को रिपोर्ट भर कर देना होता है।

Wednesday, December 12, 2012

सौ नंबर के गुनाह



उमेश चतुर्वेदी
दिल्ली पुलिस का एक नारा है- दिल्ली पुलिस सदा आपके साथ। दिल्ली पुलिस का यह सूक्त वाक्य गली-चौराहों और आए दिन अखबारों में साया होने वाले विज्ञापनों के बावजूद जनता में क्यों नहीं पैठ बना पाया है...इसका अनुभव आखिरकार पिछले दिनों हो ही गया। उसी दिन समझ में आया कि राह चलते घायलों को देखने के बाद मददगार भावों के बावजूद दिल्ली का नागरिक क्यों सौ नंबर पर फोन करने से बचता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के बगल से गुजरते वक्त एक दिन शाम को सड़क पर दूर से ही नजर आई भीड़ ने बता दिया कि वहां कोई अनहोनी हो गई है। नजदीक जाने पर भयावह नजारा था।

Thursday, November 22, 2012

बहुसदस्यीय कैग का करें स्वागत



उमेश चतुर्वेदी
(यह लेख राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित हो चुका है)
लगता है ठीक 1993 की तरह एक बार फिर कांग्रेस सरकार इतिहास दोहराने जा रही है। एक और संवैधानिक संस्था को वह बहुसदस्यीय बनाने की तैयारी में है। पिछली बार वह विपक्ष के दबाव में ऐसा करने को मजबूर हुई थी, संयोगवश उस वक्त के प्रधानमंत्री को भी विपक्ष और मीडिया मौनी बाबा कहता था। आज के भी प्रधानमंत्री को विपक्ष इसी उपाधि से नवाजता है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी नारायण सामी तो यही कह रहे हैं कि अब सरकार भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी कैग के पद को चुनाव आयोग की तरह बहुसदस्यीय बनाने जा रही है। जब 1993 में चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने की जब विपक्ष ने मांग रखी थी तो उस वक्त तब के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन की अति सक्रियता इसकी वजह बनी थी। तब दिलचस्प यह है कि शेषन से विपक्ष नाराज और परेशान था और उस वक्त शेषन से उसे बचाव चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय बनाने में ही नजर आता था। लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। मौजूदा नियंत्रक और महालेखापरीक्षक विनोद राय से विपक्ष को नहीं, सरकार को परेशानी महसूस हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कैग को बहुसदस्यीय बनाने के बाद उनसे जो मौजूदा शिकायतें दूर हो जाएंगी।

Wednesday, November 7, 2012

बिहार में गठबंधन के अंतर्विरोध



उमेश चतुर्वेदी
2010 में भारी बहुमत के बाद पाटलिपुत्र की गद्दी पर नीतीश की वापसी के बाद यह तय हो गया था कि संख्या बल के लिहाज से बेहतर स्थिति में आने के बावजूद गठबंधन में सबकुछ ठीक नहीं चलने वाला है। हालांकि विचारों और पत्रकारिता की अपनी दुनिया में ऐसी चर्चाएं और आशंकाएं करने की परिपाटी नहीं रही है। इसलिए ऐसी चर्चाओं और आशंकाओं को सिरे से नकार दिया जाता है। नीतीश और बीजेपी के बिहार के गठबंधन को लेकर भी जब 2010 में ऐसी कोई आशंका जताने की कोशिश शुरू हुई, उसे राजनीतिक पंडितों ने नकारने में देर नहीं लगाई थी। लेकिन महज दो साल की यात्रा के बाद ही वे आशंकाएं उठने लगी हैं।

Saturday, November 3, 2012

अन्ना को वीके का साथ



उमेश चतुर्वेदी
क्या भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कामयाबी या फिर एक खास स्तर तक चर्चा के लिए व्यवस्था तंत्र का में काम कर चुका बड़ा और नामी नुमाइंदा होना जरूरी है...अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के लिए पहले जो भूमिका व्यवस्था तंत्र से बाहर निकले अरविंद केजरीवाल निभा रहे थे, लगता है अन्ना के साथ उसी जिम्मेदारी को संभालने पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह आ गए हैं। अन्ना के साथ आते ही उन्होंने मौजूदा लोकसभा को भंग करने की जोरदार मांग करके अपनी दमदार मौजूदगी जताने की कोशिश भी कर दी है।

ताकि बनी रहे नजरों की धार



उमेश चतुर्वेदी
अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे की सक्रियता के दौर में जिस तरह रोजाना घपले-घोटाले की खबरें सामने आ रही हैं, राज्यों के लोकायुक्तों की पुलिस मामूली से समझे जाने वाले कर्मचारियों से करोड़ों की संपत्ति बरामद कर रही हैं...ऐसे में लगता तो यही है कि हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं, जहां नैतिक आचरण की कोई अहमियत नहीं रह गई है। ऐसे में अगर भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाले सबसे बड़ी वैधानिक संस्था केंद्रीय सतर्कता आयोग के प्रमुख प्रदीप कुमार नैतिक शिक्षा की वकालत करें तो हमें हैरत नहीं होनी चाहिए।

सोशल मीडिया की लत



उमेश चतुर्वेदी
सूचना तकनीक के मौजूदा हथियारों मसलन मोबाइल फोन, कंप्यूटर, इंटरनेट और सोशल मीडिया के आने के पहले तक चौराहे और चौपाल पर सुबह-शाम लगने वाली गप्प गोष्ठियां रोजाना घरेलू कलह की वजह बनती रही हैं। लेकिन बतरस की लत ही ऐसी थी कि बड़े-बड़े सूरमा तक इसमें डूबने में ही आनंद पाते रहे हैं। कुछ ऐसी ही हालत बदले दौर में बतरस का अड्डा बने सोशल मीडिया का भी है। अब लोग इसमें इतना डूब जाते हैं कि उन्हें दुनिया-जहान की परवाह ही नहीं रहती। इसमें सबसे ज्यादा बाजी मार ली है फेसबुक ने।

Monday, October 8, 2012

क्या किसान समर्थक होंगे भूमि सुधार



उमेश चतुर्वेदी
भारत में इन दिनों भूमि अधिग्रहणों के खिलाफ कम से कम 1700 आंदोलन हो रहे हैं। निश्चित तौर पर इनमें से सभी आंदोलनों के साध्य और साधन सही नहीं है। यह मानने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि इन आंदोलनों में सबके लक्ष्य भी सही नहीं होंगे। इसके बावजूद अगर पूरे देश में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ इतने आंदोलन चल रहे हैं तो यह मानने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि उदारीकरण के दौर में लगातार आगे बढ़ रही नव आर्थिकी के लिए हो रहे भूमि अधिग्रहण में कहीं न कहीं कोई खोट अवश्य है। इस खोट की तरफ ध्यान दिलाने के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े रहे गांधीवादी कार्यकर्ता और भारतीय एकता परिषद के अध्यक्ष पी वी राजगोपाल पिछले एक साल से लगातार देशव्यापी यात्रा पर हैं। दो अक्टूबर 2011 को शुरू हुई उनकी यात्रा का समापन दिल्ली में इस साल दो अक्टूबर को होना था। इस यात्रा में एक लाख लोगों को दिल्ली पहुंचना था। यात्रा के आखिरी दौर में ग्वालियर से एक लाख लोगों की यात्रा का दिल्ली आना कम बड़ी बात नहीं है। वहां से दिल्ली के लिए कूच भी कर चुके हैं। देशभर के भूमिहीन और मेहनतकश आदिवासी और दूसरे तबके के लोगों की एक लाख की संख्या जुट जाना भी कम बड़ी बात नहीं है। पीवी राजगोपाल अपनी इन्हीं मांगों को लेकर 2007 में 25 हजार लोगों को दिल्ली लाकर उदारीकरण के दौर के भूमि सुधारों पर रोष जता चुके हैं।

तेलंगाना की आग के पीछे का अंधेरा



उमेश चतुर्वेदी
आंध्र में सत्ता के बदलाव को लेकर ना तो बहुत ज्यादा शोरगुल है और ना ही आपाधापी..लेकिन कांग्रेस के अंदरूनी गलियारों में मुख्यमंत्री एन किरण रेड्डी को हटाने की चर्चाएं जारी हैं। इन चर्चाओं के बीच आंध्र प्रदेश की गद्दी पर समाजवाद के पुराने अलंबरदार रहे पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी की ताजपोशी की खुसर-पुसर भी जारी है। कांग्रेस की राजनीति पर पैनी निगाह रखने वालों को पता है कि इसका मतलब मुख्यमंत्री एन किरण रेड्डी की दिल्ली दरबार में हैसियत और प्रभाव कम हो रहा है। इस बीच अगर तेलंगाना को लेकर हिंसक आंदोलन बेशक प्रशासनिक तौर पर किरण रेड्डी के लिए परेशानी का सबब बनकर आया हो, लेकिन यह सच है कि इस बहाने उनकी गद्दी फिलहाल बचती नजर आ रही है। ऐसे हालात में कांग्रेस आलाकमान शायद ही राज्य नेतृत्व को बदलने की गलती कर सकता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर तेलंगाना की आग को भड़काने के लिए गांधी जयंती के आसपास का ही वक्त क्यों चुना गया।

Sunday, September 30, 2012

उमा बनाम ममता



उमेश चतुर्वेदी
डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी और खुदरा में विदेशी निवेश के खिलाफ ममता बनर्जी की मोर्चे बंदी ने उन्हें कम से कम विपक्ष की राजनीति करने वालों का नायक जरूर बना दिया है। लेकिन विपक्ष में एक ऐसी भी शख्सीयत है, जिसे आम आदमी के साथ खड़ी नजर आ रहीं ममता बनर्जी से नाराज है। भारतीय जनता पार्टी की नेता उमा भारती की गंगा समग्र यात्रा में ममता बनर्जी की सरकार ने सहयोग देने से इनकार कर दिया है। इसे लेकर दोनों के बीच टकराव बढ़ गया है। गंगा बचाने को लेकर उमा भारती ने 21 सितंबर से गंगोत्री से गंगा समग्र यात्रा शुरू कर दी है।

Tuesday, September 25, 2012

किस समाज की बात करता है जेएनयू



उमेश चतुर्वेदी
सभ्य समाज में खासकर उच्च शिक्षा के संस्थानों में ऐसे मूल्यों की उम्मीद की जाती है, जो अपने समाज को नई रोशनी दिखाते हुए बंद समाज के लिए प्रगति की राह खोल सके। ऐसा तभी हो सकता है, जब शैक्षिक संस्थान समाज सापेक्ष विचार रखे। लेकिन क्या दिल्ली के सर्वाधिक सुविधा और स्वायत्तता संपन्न जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय इन कसौटियों पर कसा  जा सकता है। निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में ही दिया जा सकता है। प्रगतिशीलता की एक निशानी समाज सापेक्ष विचारों को बढ़ावा देने के साथ ही असहिष्णुता की भावना को भी बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए। लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का छात्र समुदाय इसके ठीक उलट व्यवहार करता नजर आता है।(दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित...)

Tuesday, September 18, 2012

चिंता से परे है हिंदी का मामला
राजकिशोर
हिंदी का रुतबा घट रहा है क्योंकि जो दुनिया को समझने और अपने को व्यक्त करने के लिए हिंदी बोलते या लिखते हैं, उनका रुतबा कम हो रहा है। पचास साल बाद हिंदी सिर्फ आर्थिक दृष्टि से अविकसित लोगों की भाषा रह जाएगी। वे कौन होंगे जो अविकसित रह जाएंगे? वही, जिनकी कीमत पर व्यवस्था एक छोटे-से वर्ग का श्रृंगार करती आई है
कुछ हैं, जो खुश हैं कि हिंदी आगे बढ़ रही है। हिंदी के अखबार बढ़ रहे हैं। कई ऐसे शहर हैं, जहां से हिंदी के चार-पांच अखबार निकलते हैं और वे सभी कमोबेश बिक जाते हैं।

Monday, September 10, 2012

राजनीति का खेल और पदोन्नति में आरक्षण

उमेश चतुर्वेदी

अपने समाज को लोकतांत्रिक बताते नहीं अघाते...लेकिन हकीकत तो यह है कि अब भी सिर्फ अपनी राजनीतिक व्यवस्था ही लोकतांत्रिक ढांचे को अख्तियार कर पाई है। कुछ मसलों में अब भी वह लोकतांत्रिक धारा को अपनाने की प्रक्रिया में भी है। लेकिन अपना समाज और समाज में विमर्श की आधारभूमि अब भी लोकतांत्रिक नहीं हो पाई है। इसलिए कई बार आरक्षण जैसे मसले को लेकर जो विमर्श है, उसमें लोकतांत्रिक उदारता गायब है। इसलिए यहां जब भी कोई आरक्षण के मौजूदा ढांचे और उससे होने वाले फायदे-नुकसान पर सवाल उठाता है, वैसे ही उसे प्रतिगामी या रूढ़िवादी ठहरा दिया जाता है। यही वजह है कि ऐसे मसलों पर आमतौर पर वैसी खुली वैचारिकता नहीं दिख पाती, जिसकी उम्मीद की जाती है।

Friday, September 7, 2012

सिर्फ इतराने का ही मौका नहीं दे रही है क्रिसिल की रिपोर्ट



उमेश चतुर्वेदी
उदारीकरण के दौर में बदहाली और अनदेखी के प्रतीक रहे भारतीय गांव अचानक ही महत्वपूर्ण होते नजर आ रहे हैं। आर्थिक मामलों की शोध और पड़ताल करके साख तय करने वाली संस्था क्रिसिल की रिपोर्ट के चलते गांवों को लेकर आर्थिक उदारीकरण के पैरोकारों का नजरिया बदलता दिख रहा है। क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक उपभोग और खर्च के मामले में भारतीय गांवों ने भारतीय शहरों को पछाड़ दिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक गांवों का खर्च शहरों की तुलना में करीब 19 फीसदी ज्यादा हो गया है। उपभोग और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र रहे

Wednesday, September 5, 2012

Thursday, August 30, 2012

मोदी का गुणगान ना होने के मायने


यह लेख अमर उजाला कॉपैक्ट में प्रकाशित हो चुका है।  

उमेश चतुर्वेदी
गुजरात में विधानसभा चुनावों की आहट के बीच दिल्ली में बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन हो और उसमें मोदी का नाम आदर्श और मानदंड के तौर पर पार्टी आलाकमान पेश ना करे तो हैरत होनी ही चाहिए। क्योंकि अब तक ऐसे सम्मेलनों में उन्हें ऐसा ही अटेंशन मिलता रहा है। लेकिन इस बार ना तो बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने गुजरात को मॉडल राज्य और वहां के शासन से सीखने की दूसरे मुख्यमंत्रियों को नसीहत दी और ना ही दूसरे नेताओं ने। आडवाणी तो वैसे भी पहले से ही मोदी से नाराज बताए जा रहे हैं।

Monday, August 27, 2012

ये टिप्पणी कहीं के लिखी गई थी..अब ब्लॉग पर साया की जा रही है
 मोर्चा संभालें महिलाएं
उमेश चतुर्वेदी
जिंदगी के तमाम मोर्चों पर बदलते पैमानों के बावजूद अब भी महिलाओं को लेकर भारतीय समाज पारंपरिक ढंग से ही सोचता रहा है। उसकी नजर में महिलाएं सुंदरता और कोमलता का ही प्रतीक हैं। हालांकि पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों में तैनात महिलाएं अपने जज्बे और बहादुरी के साथ ही कर्त्तव्यपरायणता की सफल परीक्षा देती रही हैं। इस वजह से महिलाओं की सेना में तैनाती तो की जाने लगी, लेकिन शायद पारंपरिक आग्रहों का ही असर रहा है कि दुश्मन के खिलाफ मोर्चे पर तैनाती को लेकर भारतीय सेना अब तक तैयार नहीं हो पाई है।
ये टिप्पणी कहीं के लिखी गई थी..अब ब्लॉग पर साया की जा रही हैं


मतभेदों की भेंट ना चढ़ें लक्ष्य
उमेश चतुर्वेदी
बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के घेराव के मसले पर टीम अन्ना में मतभेद कोई पहली खबर नहीं है। इसके पहले भी कई मसलों पर टीम के बीच मतभेद रहे हैं। दरअसल टीम अन्ना उस तरह के वैचारिक निष्ठा के तौर पर बनी या विकसित नहीं हुई है, जैसे कोई राजनीतिक या सामाजिक संगठन खड़ा होता है। जिसे टीम अन्ना आजकल कहा जा रहा है, दरअसल वह ऐसे लोगों का समूह है, जो देश से भ्रष्टाचार का समूल नाश चाहते हैं। इसमें शामिल प्रमुख लोगों की अपनी अलग-अलग पृष्ठभूमि और सामाजिक-राजनीतिक विचारधाराएं हैं। कोई अतिवामपंथी पृष्ठभूमि का है तो किसी का वैचारिक विकास राष्ट्रवाद के तहत हुआ है।

Monday, August 20, 2012


मोदी का गुणगान ना होने के मायने
उमेश चतुर्वेदी
यह अकारण नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में इस बार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को वैसी तरजीह नहीं मिली, जैसी मिलती रही है। अपनी नाराजगी से पहले तक ऐसे सम्मेलनों में मोदी से सीख लेने की सलाह लालकृष्ण आडवाणी देते रहते थे। बाद के दौर में पार्टी आलाकमान गुजरात के शासन मॉडल को अपनाने की सलाह अपने दूसरे मुख्यमंत्रियों को देता रहा। इससे रमण सिंह और शिवराज सिंह चौहान जैसे मुख्यमंत्रियों की निराशा की खबरें सामने आती रही थीं। पार्टी में भावी अगुआई को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हरी झंडी के बावजूद नरेंद्र मोदी को अब तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन स्वीकार करता नजर आ रहा है। बीजेपी में भी उनकी अगुआई को लेकर अंदरूनी गुटबाजी बढ़ी ही है।

Friday, July 27, 2012

एक टिप्पणी लिखी थी कहीं के लिए ...प्रकाशित नहीं हो पाई... आपकी सेवामें हाजिर है
किसकी नाकामी है बोडोलैंड में हिंसा

असम के बोडो इलाके के तीन जिले इन दिनों जल रहे हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक इस हिंसा में पैंतीस लोगों की मौत हो चुकी है। केंद्रीय गृहमंत्रालय की चेतावनी और असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई के दावों के बावजूद हिंसा पर अब तक काबू नहीं पाया जा सका है। ऐसे मसलों में अब तक जैसा होता रहा है, वैसा इस बार भी हो रहा है। हिंसा पर काबू रख पाने में नाकाम साबित हुए तरूण गोगोई इस हिंसा के पीछे राजनीतिक साजिश की आशंका जता रहे हैं। ऐसा करके दरअसल वे हिंसा की असल वजह और अपनी अक्षमता को ही झुठलाने की कोशिश कर रहे हैं। इस हिंसा की आशंका तभी से थी, जब से स्वायत्त बोडो क्षेत्रीय परिषद यानी बीटीसी बनी है। अलग बोडोलैंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन चला रहे नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड और इसके विरोधी दोनों संगठनों गैर बोडो सुरक्षा मंच और अखिल बोडोलैंड मुस्लिम छात्रसंघ के बीच खींचतान काफी पुरानी है। बोडोलैंड विरोधी खेमों के दोनों संगठनों के ज्यादातर कार्यकर्ता मुस्लिम हैं और वे खुलकर इसका विरोध कर रहे हैं। बोडोलैंड समर्थक लोग मानते हैं कि दोनों संगठनों के पीछे कांग्रेस का ही अघोषित और परोक्ष हाथ रहा है। बोडोलैंड समर्थक और विरोधियों के बीच खींचतान इन दिनों ज्यादा बढ़ गयी है। अगर राज्य सरकार यह कहती है कि उसे इस खींचतान और इससे उपजे तनाव की जानकारी नहीं थी तो वह गलत बोल रही है। दरअसल इन दिनों बोडोलैंड समर्थक और विरोधियों ने अपनी-अपनी मांगों को लेकर धरना-प्रदर्शन तेज कर दिया था। जाहिर है कि इन प्रदर्शनों और उससे उपजे तनाव को खत्म कराने की जिम्मेदारी बोडो समुदाय की ही थी। लेकिन सरकार ऐसा करने में नाकाम रही। इस तनाव को और बढ़ावा मिला बोडोलैंड विरोधियों की तरफ से उठी उस मांग के बाद, जिसमें उन गांवों को बोडो इलाकों से अलग रखने की मांग की गई, जहां की आधी से ज्यादा आबादी गैर बोडो समुदाय की है। इस मांग के पीछ सबसे बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि बोडो क्षेत्रीय परिषद यानी बीटीसी बनने के बाद बोडो इलाके में कानून-व्यवस्था की हालत खराब हो चुकी है। बहरहाल इस मांग ने दोनों तरह के संगठनों के बीच तनाव को इस कदर बढ़ा दिया कि दोनों तरह के संगठनों के कार्यकर्ता एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। इसे मौका मिला 16 जुलाई को कोकराझार में हुई अखिल बोडोलैंड मुस्लिम छात्रसंघ के दो कार्यकर्ताओं की हत्या से। इस हत्या के बाद भी सरकार चेत गई होगी तो बोडो इलाके में हो रही हत्याओं को रोका जा सकता था और लाखों लोगों को शरणार्थी की तरह रहने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि राज्य सरकार बोडो और गैर बोडो लोगों के बीच भरोसा बहाली की कोशिशों के साथ ही हिंसाचारियों के खिलाफ कठोर कदम उठाए। अन्यथा दोनों समुदायों के बीच जारी यह विवाद नासूर बन सकता है।

सुबह सवेरे में